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संत तो बहुत दूर की बात, मनुष्य भी नहीं था जेवियर जल्लाद, हत्यारा और नरपिशाच जेवियर बना संत, वाह रे भारत!
गोआ का इतिहास सिर्फ़ समुद्र और मसालों की कहानी नहीं है, बल्कि रक्त और राख से लिखी गई एक काली गाथा है। फ्रांसिस जेवियर नामक हत्यारा, लुटेरा 1542 में गोआ आया था, ईसाई प्रचारक के रूप में। उसके पहले वास्को ड गामा जैसे लुटेरे भारत की धरती पर आ चुके थे, लेकिन जल्लाद जेवियर का मिशन केवल “प्रचार” नहीं था, बल्कि धर्मांतरण की मशीनरी खड़ी करना था।
1545 में उसने पुर्तगाली राजा को पत्र लिखकर माँग की कि गोआ में इनक्विज़िशन यानी धर्म न्यायाधिकरण स्थापित किया जाए। हरेक अब्राहमिक मजहब की तरह ईसाई पादरी भी मानता था कि बाकी पूरी दुनिया म्लेच्छ है, असभ्य है और हत्या के लायक है जब तक वह ईसाई न बन जाए। 1552 में उसकी मौत हो गई, लेकिन उसके पत्रों ने आने वाले 200 सालों तक हिंदुओं के जीवन को नर्क बना दिया।

जेवियर की मौत के बाद भी उसका ज़हर खत्म नहीं हुआ। 1545 में लिखे गए उसके पत्रों का असर यह हुआ कि 1557 में पुर्तगाली दरबार ने दो पादरियों, अलेइक्सो डियाज़ फाल्काओ और फ्रांसिस्को मारकेज़, को गोआ भेजा। ये दोनों ही इनक्विज़िशन के पहले औपचारिक न्यायाधीश बने। इतिहासकार जे.सी. बैरेटो मिरांडा ने लिखा है कि इनकी क्रूरता यूरोप में ईसाइयों की मचायी गयी क्रूरता और हत्याओं से भी अधिक थी, “इनका हर शब्द मौत का फरमान था और उनके इशारे पर एशिया की जनता आतंक में काँप उठती थी।” (आज जब डोनाल्ड ट्रंप भारत और चीन जैसे एशिया के देशों को नर्क बताता है, तो उसके पीछे यही जेवियरी सोच है।)
इन दोनों ने हिंदुओं पर प्रतिबंधों को और कठोर बनाया। मंदिरों का विध्वंस तेज़ हुआ, ब्राह्मणों को निर्वासित किया गया और स्थानीय भाषा व संस्कृति को अपराध घोषित कर दिया गया। फाल्काओ और मारकेज़ ने इनक्विज़िशन को व्यवस्थित रूप से लागू किया। इन दोनों हत्यारों ने यातना गृह बनाए, कबूलनामे जबरन लिखवाए और धर्मांतरण को कानूनी आदेश का रूप दिया।
यही वह दौर था जब गोवा में हाथकाटरो खंभ जैसे प्रतीक और यूरोप से आयातित यातना उपकरणों का इस्तेमाल आम हो गया। स्तन नोंचने वाले हथियार, अंग-भंग करने वाली यातनाएँ और सार्वजनिक दंड, यह सब कुछ उस ईश्वर के पुत्र के “धर्म की रक्षा” के नाम पर वैध कर दिया गया, जिसको मानने वाले दरअसल करुणा और ममता का पाठ करते थे, लेकिन वास्तविक तौर पर बेहद खूँखार, जल्लाद और हत्यारे थे।
इस तरह जेवियर के बाद आए ये दो पादरी ही असल में गोवा इनक्विज़िशन के संस्थापक जल्लाद थे, जिन्होंने पुर्तगाली शासन को सांस्कृतिक संहार की दिशा में धकेला।
इनक्विज़िशन का मतलब था, ईसाई रिलिजन की “शुद्धता” बनाए रखने के नाम पर विधर्मियों को पकड़ना, यातना देना और धर्मांतरण करना। गोवा में यह 1560 से 1812 तक चला। मंदिर तोड़े गए, विवाह संस्कार अपराध बने, भाषा और संगीत पर प्रतिबंध लगा और यहाँ तक कि तुलसी की पूजा तक अपराध घोषित कर दी गई।

गोवा के पुराने न्यायिक स्तंभ को लोग आज भी हाथकाटरो खंभ कहते हैं। यह प्रतीक है उस दौर का जब न्याय का मतलब था— हाथ काटना, संपत्ति छीनना और धर्म बदलवाना। इसी तरह यूरोप से आयातित यातना उपकरणों में “Breast Ripper” या “Iron Spider” जैसे हथियार थे, जिनसे महिलाओं के स्तन फाड़े जाते थे। यह सब “धर्म रक्षा” के नाम पर होता था।
पुर्तगाली शासन में हिंदुओं पर प्रतिबंधों की सूची लंबी थी— तुलसी पूजा अपराध, दीप जलाना अपराध, विवाह संस्कार अपराध। ब्राह्मणों को निर्वासित किया गया, संपत्ति जब्त की गई। त्योहारों को मनाना तक अपराध था।
यह सब केवल शासन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक संहार था। गोवा इनक्विज़िशन ने यह साबित कर दिया कि धर्म के नाम पर सत्ता जब क्रूरता का औज़ार बन जाए, तो तुलसी का पौधा भी अपराध हो जाता है।
आज के दौर में जेवियर को संत कहना अपराध है, सेंट वह भले हो सकता है। सेंट और संत— इन दोनों शब्दों को अक्सर गड्डमड्ड कर दिया जाता है, जबकि दोनों का अर्थ और प्रक्रिया बिल्कुल अलग है। “सेंट” चर्च की नौकरशाही की उपाधि है, जो बाकायदा कैननाइजेशन नामक प्रक्रिया से दी जाती है। यह किसी व्यक्ति को “धर्म प्रचार में योगदान” या “चमत्कार” के आधार पर दी जाने वाली संस्थागत मान्यता है। इसके विपरीत “संत” भारतीय परंपरा का आत्मिक दर्जा है, जो किसी साधक की तपस्या, त्याग और आध्यात्मिक ऊँचाई से जुड़ा होता है।
फ्रांसिस जेवियर को चर्च ने बाद में “सेंट” की उपाधि दी, लेकिन वह भारतीय परंपरा के अर्थ में कभी संत नहीं था। उसका जीवन और पत्र इस बात का प्रमाण हैं कि उसका उद्देश्य आत्मिक उत्थान नहीं, बल्कि धर्मांतरण और इनक्विज़िशन की नींव डालना था। इसलिए उसे “संत” कहना न केवल भाषाई भूल है, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय भी है।
जेवियर एक हत्यारा, लुटेरा, नरसंहार का प्रणेता, क्रूर, कामी, घटिया और बेहद घटिया आदमी था। इति सिद्धम्।
📚 संदर्भ
A.K. Priolkar, The Goa Inquisition (Bombay University, 1961)
Aseem Gupta, The Portuguese Inquisition in Goa (2020)
Daniel Diehl & Mark Donnelly, The Big Book of Pain: Torture & Punishment Through History (2008)
Crux Asia Report, “Pelourinho Novo controversy” (2026)
INSIGHT UK, “Goa Inquisition: History of Hindu Persecution & Cultural Loss” (2026)
– स्वामी व्यालोक

