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पश्चिम बंगाल में अब ‘बदला’ नहीं ‘बदलाव’ की राजनीति

पश्चिम बंगाल में अब ‘बदला’ नहीं ‘बदलाव’ की राजनीति

by हिंदी विवेक
in राजनीति, विशेष
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पश्चिम बंगाल में स्वाधीनता के पश्चात पहली बार है जब भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड और ऐतिहासिक बहुत मिला है। भाजपा ने बंगाल में दो शतक का आंकड़ा पार कर कर एक नई लकीर खींच दी है। पश्चिम बंगाल में भाजपा को जहां साल 2016 में 3 और 2021 में 77 सीटें मिलीं। वहां 4 मई 2026 को घोषित हुए चुनाव परिणाम में भाजपा ने 206 सीटों के साथ नया अध्याय लिख दिया है।

पश्चिम बंगाल में स्वाधीनता के पश्चात पहली बार है जब भारतीय जनता पार्टी को प्रचंड और ऐतिहासिक बहुत मिला है। भाजपा ने बंगाल में दो शतक का आंकड़ा पार कर कर एक नई लकीर खींच दी है। पश्चिम बंगाल में भाजपा को जहां साल 2016 में 3 और 2021 में 77 सीटें मिलीं। वहां 4 मई 2026 को घोषित हुए चुनाव परिणाम में भाजपा ने 206 सीटों के साथ नया अध्याय लिख दिया है। अंततः भाजपा के लिए कभी असंभव माने जाने वाले पश्चिम बंगाल में भगवा लहरा गया है। भाजपा ने ममता बनर्जी के अभेद्य किले को भेदकर वहां अपना विजय का परचम लहरा दिया है। बीजेपी की ये जीत कई मायनों में विशेष है। पश्चिम बंगाल के चुनाव में जिसने भी वहां के जनमानस को देखा, वहां के लोगों के मनोभावों, मुखरता और मौन को देखा। उन्हें ये परिणाम अप्रत्याशित नहीं लगे। क्योंकि 2026 के चुनाव में बंगभूमि में परिवर्तन की लहर सुस्पष्ट दिखाई दे रही थी। हालांकि जिनकी आंखों में वामपंथी, कांग्रेसी और समाजवादी चश्मा लगा था। वो बारंबार ये कह रहे थे कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सरकार नहीं बनेगी।

लेकिन वो भूल गए कि ये वही बंगाल है जहां पूज्य रामकृष्ण परमहंस और उनके शिष्य स्वामी विवेकानन्द हुए। संन्यासी क्रांति हुई। महर्षि अरविन्द हुए। बंकिम बाबू ने वंदेमातरम् की राष्ट्रीय चेतना का जयघोष किया। गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रगान लिखा। स्वदेशी और स्व का गौरवबोध जगाया।वो बंगाल जहां संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार क्रांतिकारियों की अनुशीलन समिति से जुड़े और यहीं उनका नाम ‘कोकेन’ पड़ा। बंगाल जहां नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जैसे क्रांतिवीर हुए। यही वो भूमि है जहां जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे बलिदानी हुए। वो श्यामा प्रसाद मुखर्जी जिन्होंने देश की एकता और अखंडता के लिए स्वाधीन भारत की नेहरू कैबिनेट से त्यागपत्र दे दिया। “एक देश में दो विधान, दो निशान, दो प्रधान नहीं चलेंगे” — इस उद्घोष के साथ जम्मू-कश्मीर की मुक्ति का पथ प्रशस्त किया। सत्ता का मोह नहीं किया बल्कि भारतभूमि की अखंडता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उन्हीं श्यामा प्रसाद मुखर्जी की भाजपा ने 2026 में बंगभूमि में नव परिवर्तन का इतिहास रच दिया। ऐसे में पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के गहरे अर्थ हैं। ये कोई सामान्य चुनावी जीत नहीं है।

ये जीत केवल ममता बनर्जी की दमनकारी सत्ता की हार नहीं है।बल्कि ये जीत संगठित राजनीतिक अपराध, तुष्टिकरण, माफिया और कट मनी के पूरे सिंडिकेट और माड्यूल पर जनता का प्रहार है। ये विजय — ‘त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी’ की जीत है। बंगाल में भाजपा की ये विजय उन असंख्य बलिदानों की विजय है ,जिन्होंने अपना जीवन बंगभूमि के ‘स्व’ के लिए अर्पित कर दिया।ये जीत हिंदुत्व की है।ये जीत राष्ट्रीयता की जीत है। भाजपा की जीत हिंदू समाज की संगठित शक्ति की जीत है। ये विजय वंदेमातरम् की जागृत चेतना का शंखनाद है। ये जीत इस बात का प्रमाण है कि अन्याय, अत्याचार, हिंसा , रक्तपात, आतंक का अंत सुनिश्चित है। भाजपा की ये जीत श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे उन सैकड़ों बलिदानियों की जीत है जिन्होंने राष्ट्रीयता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। कई पीढ़ियां जिस संकल्प में खप गईं। वो अब साकार हो चुका है। क्योंकि वहां का समाज संगठित हुआ। बच्चा-बच्चा राष्ट्रीय अस्मिता का ध्वजवाहक बना। उसका परिणाम भाजपा की प्रचंड जीत हुई‌।

लेकिन ये जीत केवल पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की ही कहानी बयां नहीं कर रही है बल्कि नए समीकरणों की ओर संकेत कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जीत के बाद 4 मई 2026 को बीजेपी मुख्यालय नई दिल्ली में अपने संबोधन के दौरान जनादेश के लिए न सिर्फ़ आभार जताया। बल्कि उन्होंने सुस्पष्ट कहा कि— “ ये जीत भारत के लोकतंत्र और संविधान की जीत है। चुनाव में हार-जीत अलग बात है। लेकिन बदला नहीं बल्कि बदलाव की बात होनी चाहिए।भय नहीं भविष्य की बात होनी चाहिए।”

इतना ही नहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सभी राजनीतिक दलों से आह्वान किया कि— “हिंसा के अंतहीन चक्र को हमेशा के लिए ख़त्म करें।बंगाल की सेवा के लिए काम करें।विवाद नहीं विकास, विभाजन नहीं विश्वास चाहिए।”
वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बंगाल के विकास, सुशासन, विकसित भारत के संकल्प को दुहराया। साथ ही ये चेतावनी भी दी कि दोषियों को सज़ा ज़रूर मिलेगी। स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा के लिए सत्ता नहीं बल्कि उसकी नीति महत्वपूर्ण है।इसके संकेत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दे दिए हैं। यानी पश्चिम बंगाल में वर्षों के कम्युनिस्ट आतंक, ममता बनर्जी की क्रूरता से त्रस्त जनता अब परिवर्तन की नई दिशा की ओर बढ़ चली है।

वैसे बंगाल के आकाश से अंधेरा छटा और कमल खिला लेकिन भाजपा की ये जीत इतनी आसान नहीं थी। भाजपा ने साल 2021 के विधानसभा चुनाव की हार से कई सबक लिए। माइक्रो लेवल से लेकर BROAD PERSPECTIVE में प्लानिंग की।बूथ से लेकर वोटर्स तक डायरेक्ट कनेक्ट किया। स्थानीय मुद्दों और नैरेटिव पर अपनी पकड़ मजबूत की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे और मोदी की गारंटी को बीजेपी ने ब्रांड इमेज बनाया। सुशासन की नीति और स्पष्टता ने बीजेपी की चुनावी ज़मीन को बेहद मजबूत कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके समवैचारिक संगठनों की वर्षों से राष्ट्रीय अस्मिता को लेकर की जा रही अपील ने लोगों को संगठित किया। इसका ये परिणाम हुआ कि पश्चिम बंगाल का जनमानस जो ममता बनर्जी के क्षेत्रवाद के विभाजनकारी प्रोपेगैंडा का शिकार हो जाता था। बंगाल के उस समाज ने समझा कि उनके आदर्श राष्ट्रीय संस्कृति में निहित हैं‌।उस संस्कृति में निहित हैं जिसके आभूषण बंगाल की भाषा-बोली, पहनावे, खान-पान और परंपराएं हैं।
जहां कोई विभाजन नहीं है बल्कि सहकार है। समरसता और समन्वय के साथ जीवन का सौंदर्यबोध है।

वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में वर्षों से चली आ रही राजनीतिक हिंसा, सत्ता के संरक्षण में जारी रहे रक्तपात, गुंडागर्दी, दुराचार से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। ऐसे में भाजपा में जनता को अपना हित दिखा।भाजपा की जीत के कुछ महत्वपूर्ण फैक्टर्स की बात करें तो – बीजेपी ने खुद को हिंदुत्व और बंगाली अस्मिता का स्टेक होल्डर और रक्षक बताया। इसके चलते पश्चिम बंगाल में ‘हिन्दू पहचान’ प्रमुख पहचान बनकर उभरी‌। बंगाल के समाज ने इस बात को प्रमुखता दी कि— “हमारी अलग-अलग जितनी भी पहचाने हैं। उन सबमें सबसे बड़ी पहचान हिन्दू होने की पहचान है। इसी पर आक्रमण हो रहा है।” ऐसे में हिन्दू और हिन्दुत्व के बोध ने बंगाल की अन्तश्चेतना में नया सांस्कृतिक जागरण किया। इसके चलते लोग मुखर हुए।

वहीं पूरे चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी , केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह, सुवेंदु अधिकारी की आक्रामक शैली को लोगों ने दिल में जगह दी। अमित शाह के —’ 5 मई को टीएमसी के गुंडों को उल्टा लटकाकर- सीधा कर दूंगा’— इस बयान को जनता ने हाथों हाथ लिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पीपुल कनेक्ट के हर सांकेतिक प्रतीक को लोगों ने अपने से जोड़ा। चाहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का झालमुड़ी खाने वाला प्रकरण हो। याकि जनसभा के दौरान ख़ुद मोबाइल निकालकर —उसकी वीडियोग्राफी करनी हो। याकि टीएमसी और ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ आक्रामक बयान देना हो। ‘4 मई दीदी गई’ के नारे हों। इन सबने जनता को भाजपा के पक्ष में किया।

पश्चिम बंगाल के कोने-कोने से ऐसे ऐसे दृश्य देखने को मिले जो किसी को भी भावुक कर दें। कहीं चिलचिलाती धूप में माता-पिता के साथ छोटे-छोटे बच्चे नज़र आए। वहीं बुजुर्ग महिलाएं प्रधानमंत्री के फोटो/ पोस्टर बैनर की आरती उतारती और टीका लगाती नज़र आईं। बुजुर्ग महिलाएं — प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो दीवारों में चिपकाती दिखीं। लोग प्रधानमंत्री मोदी को किसी बड़े उद्धारक के तौर पर देख रहे थे। यहीं से पूरी बिसात बीजेपी के पाले में चली गई। अब पश्चिम बंगाल में भाजपा नहीं बल्कि जनता— भाजपा की ओर से चुनावी मैदान में उतरने लगी। ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण के ख़िलाफ़ लोगों का आक्रोश फूटा।
महिला सुरक्षा के मुद्दे, आर जी कर मेडिकल कॉलेज, संदेशखाली जैसे मुद्दों को बीजेपी ने चुनाव के केंद्र में ला दिया‌। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमित शाह से लेकर हर बीजेपी नेता ने महिला सुरक्षा, हिन्दू हित और डेमोग्राफी बदलाव के मुद्दे को जनता तक ले गए।SIR, केंद्रीय सुरक्षाबलों की तैनाती ने फर्जी वोटिंग पर लगाम लगाई। भयमुक्त मतदान के चलते भाजपा को सीधा फायदा मिला। वहीं महिलाओं और युवाओं को हर महीने 3 हजार रु देने के वादों ने भी भाजपा को बढ़त दिलाई।

मुस्लिम तुष्टिकरण के आकंठ तक डूबी ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं के साथ कुठाराघात किया‌ । हिन्दू त्योहारों पर प्रतिबंध, मुस्लिमों को खैरात पर खैरात। हिन्दुओं के ख़िलाफ़ होने वाली सुनियोजित हिंसा पर ममता बनर्जी के मौन ने— वहां के समाज को उद्वेलित किया। पश्चिम बंगाल में अवैध बांग्लादेशियों, रोहिंग्याओं की घुसपैठ को ममता बनर्जी के मौन समर्थन ने ख़ूब तूल दिया। इससे बंगाल के लोगों के मन में भय का वातावरण बना। चहुंओर हिंसा, रक्तपात, गुंडागर्दी, गौ हत्या, गौ-तस्करी, माफियाओं के बढ़ते हौसलों ने ममता के शासन के अंत की पटकथा लिख दी। बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से वहां हिन्दुओं के ख़िलाफ़ हुई सुनियोजित हिंसा और हर समय ममता बनर्जी का मौन रहना। मुस्लिमों की वकील बनकर सामने आना। ये सब पश्चिम बंगाल की जनता ने देखा। वो उससे सीधे प्रभावित हुए। फिर अपना धैर्य बनाए रखा और मतदान के दिन बदला ले लिया।

बांग्लादेश की सीमा से लगे जिलों की डेमोग्राफी में हुए अप्रत्याशित परिवर्तन ने लोगों को झकझोर कर रख दिया।मुर्शिदाबाद हिंसा के साथ ही मुस्लिम बहुल इलाकों में हिंदुओं के साथ हुई हिंसा में भी ममता का चुप रहना। कट्टरपंथी मुस्लिम नेताओं की बढ़ती अराजकता ने ममता के प्रति लोगों की सहानुभूति ख़त्म कर दी‌। वहीं चुनाव के पूर्व मालदा में सुप्रीम कोर्ट की ओर से SIR के काम में लगे न्यायिक अधिकारियों को 9 घंटे तक बंधक बनाने की घटना ने पूरे देश का अपनी ओर ध्यान खींचा। देर रात को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद सेना ने जब रेस्क्यू किया तब जाकर न्यायिक अधिकारियों की जान बची। इन सारे घटनाक्रमों को पश्चिम बंगाल समेत देश की जनता देख रही थी ‌

साथ ही जब ममता बनर्जी ने लोगों को खान-पान के नाम पर डराना शुरू किया। ये कहना शुरू किया कि — ‘अगर बीजेपी आ गई तो मछली नहीं खाने देगी’ और मां-माटी-मानुष के नैरेटिव को चलाया। भाजपा ने इन सभी नैरेटिव को बड़ी ही चतुराई से ममता के ख़िलाफ़ चुनावी हथियार में बदल दिया। आचार संहिता लगने के कई महीनों से देशभर से भाजपा के दिग्गज नेता, कार्यकर्ता, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद, विधायक ज़मीन पर काम करते दिखे। बूथ-बूथ पर तैनाती और लोगों से सीधे जुड़े। वहीं सुवेंदु अधिकारी को पश्चिम बंगाल बीजेपी के मुख्य चेहरे के तौर पर रखा। सुवेंदु अधिकारी की आक्रामकता और अथक परिश्रम ने ममता बनर्जी के ‘बांग्ला’ – बंगाली अस्मिता के सियासी टूल को विफल कर दिया।सुवेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी के हर स्थानीय नैरेटिव को ध्वस्त कर दिया। ममता के आख़िरी सहारा— टीएमसी के गुंडों को केंद्रीय सुरक्षा बलों ने नियंत्रित किया। फलस्वरूप लोग घर से बाहर निकले। भयमुक्त होकर व्यापक स्तर पर मतदान किया। हिंदुत्व, मोदी की गारंटी पर आंख मूंदकर भरोसा जताया । परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल में ऐतिहासिक 93% मतदान हुआ और बंगाल में कमल खिला। भाजपा की इस प्रचंड और ऐतिहासिक विजय ने एक बार फिर से मोदी मैजिक पर मुहर लगा दी है। यानी मोदी है तो मुमकिन है। पश्चिम बंगाल की राजनीति में ये परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। बल्कि ये वहां के जनमानस के परिवर्तन का प्रतिबिम्ब है। जो ये बता रहा है कि जनता अब —अस्थिरता , अराजकता, हिंसा नहीं बल्कि स्थिरता, शांति, सुशासन, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राष्ट्रीय अस्मिता को सर्वोपरि बना रही है। राष्ट्रहित सर्वोपरि की यही भावना ‘वंदेमातरम्’ की शक्ति-चेतना को प्रकट कर रही है। बंगभूमि ने एक बार पुनः सिद्ध किया है की राष्ट्र की जय चेतना का गीत वंदेमातरम् है।

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

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