जनजाति समागम दिल्ली में जब मेघालय से आये हमारे वनवासी बंधु ‘जय श्रीराम’ के नारे के साथ आयोजन में सम्मिलित हुए तो यह दृश्य देखकर मन को संतोष हुआ, अन्यथा पुनेना, कोयी और गोंडी समेत 83 धर्मों की अलग पहचान और मान्यता के लिए जो खेला मिशनरियों, वामियों और लालची राजनेताओं द्वारा खेला जा रहा था जोकि अत्यंत विस्फोटक रूप लेने वाला था, लेकिन आज के सम्मेलन के बाद स्थितियां देश के अनुकूल हुई हैं।
आज के सम्मेलन से यूनिवर्सिटी नक्सलवादियों के गिरोह में खलबली मच गई है। उन समूहों में हलचल है जो वर्षों से ‘ट्राइब इज़ नॉट हिन्दू’ का नैरेटिव गढ़ रहे थे।
‘जनजाति हिन्दू नहीं है’ पर काम दिल्ली अलीगढ़, बनारस इत्यादि जगहों पर बैठे नक्सली टीचर्स बखूबी अंजाम दे रहे थे। आदिवासियों के आंकड़े इकट्ठा करना, उनका व्यवहार, रीति रिवाज परंपराओं का अध्ययन सरकारी फंड पर कर ये उसका दुरुपयोग आदिवासियों को उकसाने और हिंदू समाज के प्रति जहर भरने में दिन रात लगे हुए थे और हैं।

भोली सरकार उनके इस काम को शैक्षिक उन्नयन का दर्जा देती है और उन्हें प्रोमोट करती रहती है। आदिवासी क्षेत्रों के छोटे-छोटे समूह जहाँ विश्व विद्यालय के नक्सली शिक्षक अपने कार्यकाल का तीन चौथाई हिस्सा बिताते हैं और वहीं के लोगों खास तौर से लड़कियों को किसी तरह शोध करवा कर विश्वविद्यालय में भर्ती करवा लेते हैं, फिर उसके माध्यम से लेख, शोध पत्र लिख लिख एक अकादमिक माहौल तैयार करते हैं। साथ ही उन्हें शिक्षा के नाम पर सरकार और प्रशासन में बैठे लोगों का भरपूर सहयोग मिलता है।
वामियों का पाखण्ड ही उनकी प्रगतिशीलता है। एक तरफ वह राष्ट्र/धर्म को अफीम कहेंगे, दूसरी तरफ वह धार्मिक पहचान को पुख्ता करने के लिए आदिवासियों में प्रॉक्सी स्थानीय राष्ट्रवाद का विष घोलते हैं। आप वायर, प्रिंट, फारवर्ड ब्लॉक समेत हज़ारों न्यूज़ वेब साइट्स को उठा कर देखिए कितने महीन और उन्मुक्त रूप से यह कार्य हो रहा है।
एक बात समझ लीजिए, इनके लिए सत्ता महत्वपूर्ण नहीं है। सत्ता में कोई भी बैठा हो ये जानते हैं कि इन्हें संरचना बदलनी है और वह काम ये बड़े शांत चित्त से लगातार कर रहे हैं। लोकतांत्रिक संरचना जहां एक एक वोट का महत्व है तो ये उसकी आड़ में धार्मिक पहचान अलग करने का मुद्दा लेकर आदिवासियों के बीच में हैं। इसी मुद्दे पर वोट करने को कहते हैं। ये जानते हैं कि आज दो, कल चार, परसों सौ लोग तैयार होंगे, इसके लिए पर महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिदिन ऐसा सोचने वालों की संख्या बढ़ती रहे।
स्थानीय प्रतीकों, आदिवासी पहचान, टोटम, प्रकृति पूजा को एन्टी ब्राह्मनिकल घोषित कर हिन्दू बनाम आदिवासी मुद्दा बन चुका है। एक बात समझ लीजिए और कि किसान आंदोलन हो या सीएए का आंदोलन या कॉकरोच पार्टी, सब के तार एक ही जगह से जुड़े हैं और सब का मालिक भी एक ही है। अब यह षड्यंत्र अब ओपन हो चुका है, यूनिवर्सिटी नक्सली पहचाने जा रहे हैं, तथाकथित बौद्धिकता के मास्क उतर चुके हैं, भगवान बिरसा के पुत्र भारत माता के लिए पुनः खड़े हो गए हैं।
जनजाति की संस्कृति, भाषा, भूषा को सम्मान देते हुए, उसके महत्व को राष्ट्रीय पटल पर लाते हुए उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा में जोड़ने का आयोजन आने वाले दिनों में देश की एकता और अखंडता का आधार उबनेगा।
– अनिल डागा

