अभी हम 2 लाख लोग यहाँ बैठे हैं। पूरे देश की 750 जनजातियों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अभी अंधेरा है, मंच से दिख नहीं रहा है कि हम कितने हैं, इसलिए अपनी आवाज से बताइए…
भगवान बिरसा मुंडा की… जय!
भगवान बिरसा मुंडा की… जय!
हमारे इस समापन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित आदरणीय अमित भाई शाह जी, सम्मानित मंच तथा देश भर के कोने-कोने— अंडमान, नागालैंड, तमिलनाडु, लेह-लद्दाख, गुजरात और मध्य भारत से आए हुए हम जनजाति समाज के 2 लाख लोग एक साथ दिल्ली में हैं और यह एक ऐतिहासिक क्षण है। हज़ारों वर्षों के इतिहास में कभी भी भारत के जनजाति समाज ने इस तरह दिल्ली कूच नहीं की। दिल्ली की रक्षा के लिए हमने जरूर हमेशा काम किया है।
लेकिन अपनी बात, अपनी भावनाओं को बताने के लिए आज हम सब यहाँ उपस्थित हुए हैं। अगर इतिहास में हम देखते हैं, जनजाति समाज की मान्यता, जनजाति समाज की भारत को देन… इसके बारे में जब हम सोचते हैं, तो प्राचीन समय से लेकर धर्म की शिक्षा लेने हमारे ऋषि-मुनि जंगलों में गए।
राज्य कैसे करना, समाज व्यवस्था कैसे चलाना, इसको समझने के लिए अगर कोई राजा, मंत्री या नगरीय समाज के लोग गए, तो वे हमारे जनजाति समाज के पास जंगलों में सीखने गए और वहाँ से सीखकर ही भारत की महान संस्कृति बनी है।
हमारा समाज… हम जंगलों में रहते रहे। प्रकृति के साथ कैसे रहना, सबने मिल-जुलकर कैसे रहना, एक कुटुम्ब की तरह कैसे जीना और प्रकृति का नाश किए बगैर उसका संवर्धन करते हुए हम कैसे आगे बढ़ सकते हैं— यह सारा विचार व्यवहार में लाकर हम जनजाति समाज के लोग अभी भी जी रहे हैं।
प्राचीन काल में ऋषि-मुनि, राजा-महाराजा सब इस बात को समझते थे और इसलिए हमारे जनजाति समाजों की व्यवस्था को पूर्ण सम्मान देते हुए कभी भी उन्होंने हमारे आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया।
बीच में मुगल भी आए, मुगलों ने भी जनजाति समाज के साथ सीधे लड़ने का साहस नहीं किया। हमारे जनजाति समाज ने मुगलों से लड़ने वाले देश के सभी देशभक्त राजाओं का साथ दिया।
उसके बाद आए अंग्रेज। अंग्रेजों ने हमें एक नया शब्द दे दिया— ‘ट्राइब’ और उन्होंने देखा कि इस समाज से सीधे लड़कर जीतना मुश्किल है, तब उन्होंने एक बड़ा षड्यंत्र रचा। कानून बनाकर हम जनजाति समाज को ‘क्रिमिनल’ घोषित कर दिया। ‘क्रिमिनियल ट्राइब्स एक्ट’ लागू करके हमें बदनाम और अपमानित किया गया।
उन्होंने देखा कि यह समाज जंगलों की रक्षा करता है, इसकी पूरी जीवन रचना जंगल पर आधारित है, इसलिए ये कभी गुलाम नहीं बन सकते क्योंकि जंगल में इनके लिए हर चीज उपलब्ध है। तो उन्होंने हमें वनों से बेदखल करने के लिए ‘फॉरेस्ट एक्ट’ (वन कानून) लेकर आए और हमारे जंगल हमसे छीन लिए। हमारे जनजाति समाज के साथ कई तरह के घोर जुल्म किए गए।
लेकिन भारत की इन जनजातियों में से प्रत्येक ने अंग्रेजों का घोर विरोध किया। भारत को आज़ाद कराने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। मानगढ़ का महान नरसंहार हो, भगवान बिरसा मुंडा का उलगुलान हो, टंट्या भील (टंट्या मामा) का संघर्ष हो या संथाल विद्रोह हो… इतिहास में ऐसे लाखों उदाहरण हैं कि जनजाति समाज ने लड़ना और मरना स्वीकार किया, मगर अंग्रेजों की गुलामी कभी स्वीकार नहीं की।
इसके बावजूद अंग्रेजों ने पूरे देश और दुनिया में ऐसा नैरेटिव (माहौल) बना दिया कि ये लोग तो आदिमानव हैं, इन्हें सभ्यता और धर्म हम सिखाएंगे, क्योंकि ये असभ्य और गँवार लोग हैं और दुर्भाग्य से देश की आज़ादी के बाद भी हमारे देश का जो पढ़ा-लिखा समाज था, वो भी हमें काफी समय तक अंग्रेजों के चश्मे और उनकी नजर से ही देखता रहा।
तो आज हम सब यहाँ लाल किले के मैदान में अपनी वही भावनाएँ प्रकट करने उपस्थित हुए हैं। जो भी ताकतें हमसे यह कहती हैं कि हमारा कोई धर्म नहीं है, हमारी कोई संस्कृति नहीं है, तो वह हमारे पूरे जनजाति समाज का घोर अपमान है क्योंकि हम जनजाति समाज के लोग ही इस देश की सनातनी संस्कृति का मूल हैं, इसकी जड़ हैं।
हमें हमारी रूढ़ि, हमारी गौरवशाली परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करते हुए मजबूती से आगे बढ़ना है। आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी यही परंपराएँ जीवन को सही दिशा देने का काम करेंगी।
भगवान बिरसा मुंडा की… जय!
भारत माता की… जय!”
