लोकतंत्र केवल सत्ता से नहीं चलता, वह जनपक्षीय प्रतिरोध से ऊर्जा पाता है, जीवंत रहता है। सदन में बैठा विपक्ष केवल सीटों की संख्या नहीं होता, जनता की बेचैनी, असहमति और संघर्ष की सामूहिक आवाज होता है। लेकिन भारतीय राजनीति का वर्तमान दृश्य एक गहरे विरोधाभास से भरा हुआ है। आज विपक्ष मौजूद तो है, किंतु प्रतिरोध अनुपस्थित है। चेहरे हैं, लेकिन चरित्र नहीं। शोर है, लेकिन संघर्ष नहीं।
स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि भाजपा जैसी विशाल संगठनात्मक और वैचारिक शक्ति का मुकाबला करने के बजाय विपक्ष अब प्रतीकों, वायरल चेहरों और तथाकथित ‘कॉकरोच राजनीति’ के पीछे लामबंद होने को विवश दिखाई देता है।
विडंबना देखिए कि सपा सुप्रीमो ने अपने ही सोशल मीडिया के X अकाउंट पर ‘BJP बनाम CJP’ लिखकर भारतीय जनता पार्टी के मुकाबले ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को खड़ा कर दिया, जबकि अपनी समाजवादी पार्टी को स्वयं ही मुख्य मुकाबले से बाहर मान लिया। यह उनके क्षीण होते आत्मविश्वास और वैचारिक दिशाहीनता का सार्वजनिक प्रदर्शन है।

यह उस मानसिक पराजय का प्रतीक है, जिसमें विपक्ष स्वयं मान चुका है कि वह अब वैचारिक संघर्ष का केंद्र नहीं रहा। जिस दल ने कभी स्वयं को भाजपा के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत किया, वही आज अपनी भूमिका किसी दर्शक की तरह निर्धारित करता दिखाई देता है। यह आत्मविश्वास का नहीं, आत्मसमर्पण का मनोविज्ञान है।
यह वही राजनीतिक परंपरा है, जो कभी लोहिया के वैचारिक संघर्ष, जयप्रकाश के जनांदोलन और सड़क आधारित समाजवादी राजनीति के लिए जानी जाती थी। लेकिन आज उसी परंपरा का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्रतीकों और क्षणिक उत्तेजनाओं में सिमटता दिखाई देता है।
समाजवादी राजनीति कभी धरातलीय संघर्ष का दावा करती थी। लेकिन आज उसका बड़ा हिस्सा स्टूडियो आधारित प्रतिक्रियावाद में बदलता दिखाई देता है। गांव, किसान, छात्र और सड़क की राजनीति की जगह अब ट्रेंड, ट्रोल और तात्कालिक डिजिटल उत्तेजना ने ले ली है।
लेकिन आज का सैफई ब्रांड समाजवाद वातानुकूलित कक्षों, सोशल मीडिया ट्रेंड और डिजिटल प्रतीकों तक सिमटता दिखाई देता है। यह ‘डिज़ाइनर समाजवाद’ है। इसमें पसीना नहीं, प्रेजेंटेशन है। इसमें वैचारिक तप नहीं, दृश्यात्मक अभिनय है। जबकि लोकतंत्र की लड़ाइयां स्क्रीन पर नहीं, सड़कों पर जीती जाती हैं। जनादेश ट्वीट से नहीं, तप से बनता है। राजनीतिक आंदोलन ‘रील’ से नहीं, जोखिम से खड़े होते हैं।
दरअसल, अखिलेश यादव की राजनीतिक बेचैनी का सबसे बड़ा कारण केवल भाजपा नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रति लगातार बना जनविश्वास भी है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में योगी आदित्यनाथ ने स्वयं को केवल एक प्रशासक के रूप में नहीं, बल्कि धरातल पर सक्रिय, संघर्षशील और वैचारिक रूप से स्पष्ट नेता के रूप में स्थापित किया है।
यही कारण है कि विपक्ष का बड़ा हिस्सा संगठनात्मक संघर्ष के बजाय प्रतीकात्मक राजनीति और डिजिटल उत्तेजना में शॉर्टकट तलाशता दिखाई देता है। किंतु जमीन पर खड़ा जनविश्वास केवल ट्वीट, ट्रेंड और तंज से नहीं टूटता। उसके लिए निरंतर जनसंपर्क, वैचारिक स्थिरता और संघर्षशील राजनीति की आवश्यकता होती है।
भारतीय जनता पार्टी का पश्चिम बंगाल में संघर्ष इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। एक समय ऐसा था जब वहां भाजपा का नाम लेने तक से लोग हिचकते थे। कार्यकर्ताओं पर हमले हुए। राजनीतिक हिंसा हुई। अनेक कार्यकर्ताओं ने अपने प्राण गंवाए। सैकड़ों लोग वर्षों तक भय, प्रताड़ना और सामाजिक बहिष्कार झेलते रहे। लेकिन भाजपा का कार्यकर्ता वहां डटा रहा। उसने वातानुकूलित कमरों में बैठकर राजनीति नहीं की।
उसने गांवों की धूल फांकी, सड़कों पर संघर्ष किया, लाठियां खाईं, अपमान सहे, किंतु पीछे नहीं हटा।
वर्षों तक पश्चिम बंगाल में भाजपा के कार्यकर्ता राजनीतिक प्रतिशोध, सामाजिक दबाव और हिंसा के बीच भी अपने झंडे के साथ खड़े रहे। अनेक परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया। बूथ स्तर का कार्यकर्ता लगातार हमलों के बावजूद गांवों में डटा रहा। यह राजनीति एयरकंडीशंड बहसों से नहीं बनी थी। यह संगठन की उस तपस्या से बनी थी, जिसमें परिणाम वर्षों बाद दिखाई देते हैं।
परिणामस्वरूप पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा ने अपने लिए वह स्थान निर्मित किया, जिसे कभी असंभव माना जाता था। यह स्थिति किसी वायरल प्रतीक, डिजिटल उत्तेजना या क्षणिक राजनीतिक शोर से नहीं बनी। यह बूथ स्तर के संघर्ष, संगठनात्मक विस्तार और वैचारिक धैर्य का परिणाम थी।
यही वह सबक है, जिसे समाजवादी पार्टी सहित पूरे विपक्ष को समझना होगा। लोकतंत्र की लड़ाइयां स्टूडियो की रोशनी में नहीं, जमीन की धूल में जीती जाती हैं। सत्ता परिवर्तन स्क्रीन की चमक से नहीं, संगठन और संघर्ष की धीमी तपिश से जन्म लेता है। जनांदोलन हैशटैग से नहीं, हिम्मत, हठ और निरंतर जनसंपर्क से खड़े होते हैं।
आज विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह संघर्ष की संस्कृति खो चुका है। उसके पास न सड़क पर उतरने का धैर्य बचा है, न वैचारिक स्पष्टता और न ही जनता के बीच वैसी विश्वसनीयता, जो किसी व्यापक आंदोलन की नींव बन सके। परिणामस्वरूप वह किसी अदृश्य चमत्कार, किसी वायरल प्रतीक और किसी क्षणिक डिजिटल उबाल में अपना तारणहार खोजने लगता है।
सबसे दु:खद यह है कि विपक्ष ने संघर्ष की भाषा ही खो दी है। लोहिया की बेचैनी नहीं। जेपी की नैतिक आंच नहीं। मुलायम सिंह की सड़क वाली मारक क्षमता नहीं। आज का बड़ा विपक्ष धरना कम, डिजिटल प्रदर्शन अधिक करता है।
ऐसा लगता है मानो लोकतांत्रिक संघर्ष की तैयारी नहीं, किसी वीडियो गेम का लेवल पार करने की रणनीति बना रहे हों। लेकिन लोकतंत्र कोई वीडियो गेम नहीं है। यह मिट्टी, मार और मनोबल की लड़ाई है। यहां पसीने से पथ बनते हैं और संघर्ष से संगठन। यहां वर्षों तक बिना परिणाम दिखे भी डटे रहना पड़ता है।
लोकतंत्र में विचारधारा का स्थान मीम नहीं ले सकते। व्यंग्य आंदोलन का विकल्प नहीं बन सकता। राजनीति केवल वायरल होने की कला नहीं है। यह जनता के बीच विश्वास अर्जित करने की दीर्घकालिक साधना है। जो दल संघर्ष से कट जाते हैं, वे धीरे-धीरे समाज की धड़कनों से भी कट जाते हैं।
‘कॉकरोच राजनीति’ के सम्मुख यह शरणागति वस्तुतः लोकतांत्रिक तेवर का अपमान है। क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व केवल सत्ता का विरोध करना नहीं, बल्कि जनता के सामने एक गंभीर और विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करना भी होता है।
आज भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ी चिंता यह है कि विपक्ष इतना निर्बल क्यों हो गया कि उसे अपने भीतर कोई नायक दिखाई नहीं देता। यही आज के विपक्ष की सबसे बड़ी त्रासदी है। वह भारतीय जनता पार्टी से कम, अपनी वैचारिक रिक्तता, संघर्षहीनता और नेतृत्वहीनता से अधिक पराजित दिखाई देता है।
और शायद यही कारण है कि आज विपक्ष सत्ता से पहले स्वयं अपनी छाया से भयभीत दिखाई देता है। क्योंकि जिसने संघर्ष का साहस खो दिया हो, वह अंततः CJP जैसे प्रतीकों में ही अपना तारणहार खोजने लगता है।
– प्रणय विक्रम सिंह
