बच्चों की रूह बहुत नर्म होती है… ओस की बूंद जैसी। उनकी दुनिया बहुत पाक होती है। वो दुनिया अभी मज़हबों, मसलकों, फ़तवों और फ़ायदे की फ़िक्र से अछूती होती है। वहां एक ख़रगोश, एक बकरी का बच्चा, एक बछड़ा… सब दोस्त होते हैं। बच्चे किसी जानवर को देखकर उसके गोश्त का वज़न नहीं तौलते, उसकी आंखों में अपना अक्स ढूंढते हैं।
वे जब किसी बकरी के बच्चे को देखते हैं, तो उनके भीतर कसाई नहीं, दोस्त जागता है। वे किसी ख़रगोश को देखकर उसके गोश्त का स्वाद नहीं सोचते… उसकी मुलायम देह को अपने गालों से लगा लेते हैं। वे बछड़े के पीछे दौड़ते हैं, उसकी गर्दन में हाथ डालते हैं, उसका माथा चूमते हैं।
बच्चों को लगता है कि जानवर भी उनकी तरह ही होते हैं। उन्हें भी डर लगता होगा। उन्हें भी प्यार अच्छा लगता होगा। उन्हें भी अकेलापन सताता होगा।
और सच कहूं तो बच्चों का यह ‘यक़ीन’ झूठ नहीं होता।
एक बच्चा जब किसी मेमने को गुड्डू, कालू या मोती कहकर पुकारता है, तो वह उसे पालतू नहीं बनाता… अपने घर का हिस्सा बना लेता है। उसकी आंखों में कोई फ़र्क़ नहीं होता, वह अपने छोटे भाई और उस बेज़ुबान दोस्त, दोनों को लगभग एक ही तरह से दुलारता है।
शायद इसलिए कि दोनों की रूह अभी इंसान की बनाई हुई नफ़रतों से महफ़ूज होती है।
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लेकिन फिर एक ‘कुर्बानी’ वाली सुबह आती है… एक ऐसी सुबह, जिसमें धूप तो वही होती है, लेकिन आंगन का आसमान बदल जाता है। घर में वही जानवर, जो कल तक बच्चों के साथ खेल रहा था, जो उनकी हथेलियां चाटता था, जो उनके पीछे-पीछे पूरे घर में घूमता था, जिसने अपने मासूम भरोसे में यह मान
लिया था कि यही उसका कुनबा है… उसे अचानक ज़मीन पर पटक दिया जाता है।
उसकी आंखों में पहली बार डर उतरता है। वह छूटने की कोशिश करता है। बच्चे चीख़ते हैं। रोते हैं। दामन पकड़कर कहते हैं…”इसे मत मारो”… और कुछ क्षणों के लिए पूरा आंगन जैसे सांस रोककर खड़ा रह जाता है।
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लेकिन उस वक़्त सबसे ज़्यादा बहरा इंसान हो जाता है। छुरी चलती है… और सिर्फ़ एक गर्दन नहीं कटती। उस दिन एक बच्चे के भीतर पल रही करुणा की पहली नस काट दी जाती है। उसकी रूह पर पहला ख़ूनी धब्बा गिरता है। उस दिन उसके भीतर की मासूम दुनिया में पहली दरार पड़ती है।
उसे पहली बार सिखाया जाता है कि मोहब्बत और मौत साथ-साथ भी चल सकते हैं। उस दिन बच्चा यह सीखता है कि दुनिया में भरोसा हमेशा बचाया नहीं जाता… कभी-कभी ‘हलाल’ भी कर दिया जाता है।
इससे बड़ा गुनाह क्या होगा?
इससे बड़ी संगदिली क्या होगी?
जो जानवर आपके घर में बेफ़िक्री से सोया, जिसने आपके बच्चों की आवाज़ पहचान ली थी, जो शाम होते ही दरवाज़े पर आकर बैठ जाता था, जिसने कभी
यह गुमान भी नहीं किया होगा कि जिन हाथों से उसे दाना मिलता है, वही हाथ उसकी मौत का इंतज़ाम करेंगे।
उसी की गर्दन पर छुरा फेर देना, यह सिर्फ़ क़त्ल नहीं है… यह भरोसे की ‘शहादत’ है। यह उस निश्चिंत विश्वास का टूटना है, जो किसी बेजुबान ने इंसान की आंखों में देखा था।
जंगल में शेर जब शिकार करता है, तो वह भूख का उसूल होता है, कोई धोखा नहीं। वह पहले दोस्ती नहीं करता। वह किसी मेमने को अपने बच्चों के साथ नहीं खिलाता। वह उसकी गर्दन पर प्यार से हाथ फेरकर फिर छुरा नहीं चलाता।
लेकिन इंसान…
जो ख़ुद को अशरफ़ुल-मख़लूक़ात कहता है… पहले दुलारता है, अपने हाथों से दाना खिलाता है, भरोसा जीतता है… और फिर उसी भरोसे की छाती में लोहे की धार उतार देता है।
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है, जब इस पूरे मंज़र को ‘रूहानियत’ का लिबास पहना दिया जाता है। जब बच्चों की चीख़ों से ज़्यादा अहम रस्म हो जाती है। जब रहम को कमज़ोरी और संगदिली को ईमान समझ लिया जाता है।
कहा जाता है कि क़ुर्बानी सबसे अज़ीज़ चीज़ की निशानी है। मगर सदियों से इंसान अपनी सबसे प्यारी चीज़ बचा लेता है और छुरी हमेशा किसी बेज़ुबान की गर्दन तक पहुंचती है।
कभी किसी बच्चे से पूछिए उस दिन… उसे याद आता है कि कल तक वही बकरा उसके पीछे-पीछे भागता था। उसकी कॉपी चाट जाता था। उसके स्कूल से लौटने पर उछल पड़ता था।
और आज…
उसका ख़ून नाली में बह रहा है। आंगन वैसा ही है। दीवारें भी वही हैं। लेकिन बच्चे की आंखों में दुनिया अब पहले जैसी नहीं रहती।
सबसे भयावह दृश्य वह नहीं होता, जहां ख़ून बह रहा हो, बल्कि वह होता है, जहां ख़ून बहने के बाद लोग दावतों में मशगूल हो जाएं। इसे ‘मुक़द्दस त्यौहार’ और ‘मसर्रत अंगेज़ मौका’ कहकर फिर उसी मंज़र के बीच मुस्कुराहटों की महफ़िल सजा लें।
कितना बड़ा विरोधाभास है कि जो इबादत सुबह सजदों, दुआओं और आंसुओं से शुरू होती है, वही दोपहर होते-होते स्वाद, दावत और ज़ायकों के शोर में बदल जाती है।
काश दुनिया बच्चों की तरह सोच पाती। काश मज़हब का पहला सबक़ रहम होता। काश इबादत की पहली शर्त मोहब्बत होती। लेकिन शायद इंसान अभी
इतना पाक नहीं हुआ।
इसलिए बच्चे अब भी रोते हैं…
बेज़ुबान अब भी कटते हैं…
और इंसान अपने ही हाथों अपनी रूह की आख़िरी नर्मी मारता चला जाता है। धीरे-धीरे… बिना शोर के… जैसे कोई भीतर से पत्थर होता चला जाए।
त्योहार इंसान की रूह को जगाने के लिए होते हैं, उसे कत्ल करने के लिए नहीं। वे करुणा को गहरा करने के लिए होते हैं, उसे हलाल करने के लिए नहीं।
जब तक हमारी खुशियां, हमारा अकीदा, हमारा ईमान किसी मूक चीख़, किसी कांपती गर्दन और किसी बहते लहू पर टिकी रहेंगी, तब तक सभ्यता का हर दावा अधूरा रहेगा।
आज के दिन दुनिया के करोड़ों बच्चे अपने किसी छोटे दोस्त को खो देते हैं। वे पहली बार समझते हैं कि दुनिया में सिर्फ़ मौत नहीं होती… भरोसे का क़त्ल भी होता है। और शायद यही सबसे बड़ा मातम है।
मेरे पास इस दृश्य के लिए कोई मुबारकबाद नहीं है। बस उन बेज़ुबान आंखों के लिए एक ख़ामोश फ़ातिहा है, जो आख़िरी सांस तक इंसान की आंखों में रहम तलाशती रहीं… और बदले में उन्हें सिर्फ़ चमकता हुआ लोहा मिला।
– प्रणय विक्रम सिंह

