नीट-यूजी पेपर लीक समेत परीक्षा सम्बंधी विवादों को लेकर
कॉकरोच जनता पार्टी ने शनिवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से त्यागपत्र की मांग की।
दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ ने नीट-यूजी पेपर लीक समेत परीक्षा सम्बंधी विवादों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। यह आंदोलन प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं, विशेषकर नीट परीक्षा में पेपर लीक एवं परिणाम सम्बंधी विवादों के विरोध में सामने आया।
इसके आयोजकों ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री से त्यागपत्र की मांग की और शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी मांगें उठाना अस्वाभाविक नहीं है, किंतु जिस प्रकार से इस आंदोलन को प्रस्तुत किया गया, जिस भाषा और प्रतीकों का उपयोग किया गया तथा जिस प्रकार इसे राजनीतिक रंग दिया गया, वह अनेक प्रश्न खड़े करता है।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम अपने आप में एक राजनीतिक व्यंग्य है। यह नाम स्पष्ट रूप से देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी के नाम की नकल करते हुए बनाया गया प्रतीत होता है। आंदोलन के संचालकों का कहना है कि उन्होंने यह नाम एक कथित अपमानजनक टिप्पणी के प्रतिवाद में अपनाया। उनका तर्क है कि यदि युवाओं को कॉकरोच कहा गया तो वे उसी पहचान को प्रतिरोध की शक्ति बना देंगे।

पर प्रश्न यह है कि क्या लोकतांत्रिक संवाद का स्तर इस प्रकार के व्यंग्यात्मक नामों और प्रतीकों पर आधारित होना चाहिए? क्या इससे किसी रचनात्मक समाधान का मार्ग प्रशस्त होता है या केवल राजनीतिक कटुता और टकराव को बढ़ावा मिलता है? लोकतंत्र में व्यंग्य का स्थान अवश्य है, लेकिन जब व्यंग्य का उद्देश्य केवल उपहास और उकसावे तक सीमित रह जाए, तब उसकी सार्थकता संदिग्ध हो जाती है।

छात्र हित या राजनीतिक एजेंडा
किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसके घोषित उद्देश्यों के साथ-साथ उसकी पृष्ठभूमि और कार्यप्रणाली के आधार पर भी किया जाना चाहिए। यदि छात्रों के हित, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता वास्तव में इस आंदोलन के केंद्र में हैं तो यह स्वागत योग्य है। देश के करोड़ों युवा प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता को लेकर चिंतित हैं और उनकी चिंताओं को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन जब किसी छात्र आंदोलन में विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं और सरकार-विरोधी समूहों की सक्रिय भागीदारी दिखाई देती है, तब यह आशंका भी उत्पन्न होती है कि कहीं वास्तविक मुद्दों का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए तो नहीं किया जा रहा। कई बार छात्र असंतोष को राजनीतिक मंचों के लिए ईंधन बना दिया जाता है, जिससे मूल समस्याएं पीछे छूट जाती हैं और केवल सत्ता-विरोधी अभियान प्रमुख बन जाता है।

जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में प्रतिभागियों ने कॉकरोच के मुखौटे पहने, तख्तियां उठाईं और प्रतीकात्मक प्रदर्शन किया। यह दृश्य निश्चित रूप से मीडिया का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहा। आज के डिजिटल और सोशल मीडिया युग में प्रतीकों का प्रभाव बहुत अधिक होता है, लेकिन यह भी सत्य है कि प्रतीकात्मक राजनीति कई बार वास्तविक मुद्दों की गम्भीरता को कम कर देती है।
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और बुनियादी ढांचे जैसे विषय राष्ट्रीय महत्व के प्रश्न हैं। इन पर गहन विमर्श, तथ्यात्मक बहस और ठोस नीति सुझावों की आवश्यकता होती है। यदि इन मुद्दों को केवल व्यंग्यात्मक प्रदर्शनों और नाटकीय प्रस्तुतियों तक सीमित कर दिया जाए तो समस्या का समाधान नहीं निकलता बल्कि समाज में भ्रम और उत्तेजना बढ़ सकती है।
लोकतंत्र में विरोध की मर्यादा
लोकतंत्र केवल अधिकारों का नाम नहीं है बल्कि उत्तरदायित्वों का भी नाम है। विरोध प्रदर्शन का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह शांतिपूर्ण, तथ्यपरक और रचनात्मक हो। यदि विरोध केवल व्यवस्था को बदनाम करने, जनभावनाओं को भड़काने या सामाजिक विभाजन को बढ़ाने का माध्यम बन जाए तो वह लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत माना जाएगा।
भारत की युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी पूंजी है। युवाओं में ऊर्जा, उत्साह और परिवर्तन की आकांक्षा स्वाभाविक है। यही कारण है कि विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक समूह युवाओं को अपने आंदोलनों से जोड़ने का प्रयास करते हैं, लेकिन युवाओं के लिए यह आवश्यक है कि वे किसी भी आंदोलन या अभियान का समर्थन करने से पहले उसके उद्देश्यों, पृष्ठभूमि और सम्भावित परिणामों का विवेकपूर्ण मूल्यांकन करें।
सिर्फ आकर्षक नारों, सोशल मीडिया ट्रेंड या प्रतीकात्मक प्रदर्शनों के आधार पर किसी आंदोलन का समर्थन करना उचित नहीं है। युवाओं को यह समझना होगा कि वास्तविक परिवर्तन केवल विरोध से नहीं बल्कि रचनात्मक भागीदारी, नीति संवाद और सकारात्मक प्रयासों से आता है।
परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक पर कठोर कार्रवाई, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और युवाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। वहीं, नागरिक समाज और छात्र संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे इन मुद्दों को गम्भीरता और तथ्यों के साथ उठाएं।
आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा सुधार के प्रश्न को राजनीतिक ध्रुवीकरण का विषय न बनाया जाए। यदि सरकार, विशेषज्ञ, शिक्षाविद् और छात्र संगठन मिलकर संवाद करें तो बेहतर समाधान निकल सकते हैं। केवल विरोध और प्रतिरोध की राजनीति से शिक्षा व्यवस्था की जटिल समस्याओं का समाधान सम्भव नहीं है।
–ललित गर्ग

