मानसून में सड़कों का हाल बेहाल होना केवल प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि मानव निर्मित प्रशासनिक, तकनीकी और सामाजिक कमियों का परिणाम है। पहली बरसात में ही सड़कों पर जगह-जगह जलजमाव हो जाता है और सम्बंधित विभाग की पोल भी खुल जाती है।
मानसून भारत के लिए केवल ऋतु परिवर्तन का संकेत नहीं है बल्कि यह हमारी शहरी एवं ग्रामीण अधोसंरचना की वास्तविक परीक्षा भी भी है। विडम्बना माहमारी यह है कि जिस पहली वर्षा का स्वागत प्रकृति के उत्सव के रूप में होना चाहिए, वही पहली बारिश अधिकांश नगरों और महानगरों में जल जमाव, यातायात अवरोध, दुर्घटनाओं, गड्डों, संक्रामक रोगों और प्रशासनिक अव्यवस्था का कारण बन जाती है। प्रत्येक वर्ष नगर निकाय यह दावा करते हैं कि नालों की सफाई, जल निकासी तथा वर्षा प्रबंधन की समुचित व्यवस्था कर ली गई है, किंतु पहली ही तेज वर्षा इन दावों की वास्तविकता सामने ला देती है।
प्रश्न यह है कि जब समस्या प्रत्येक वर्ष सामने आती है, पर्याप्त बजट भी उपलब्ध होता है और तकनीकी ज्ञान भी उपलब्ध है, तब भी समाधान स्थाई क्यों नहीं हो पाता ? इसका उत्तर केवल प्रशासनिक विफलता में नहीं बल्कि प्रशासन, तकनीकी नियोजन, स्थानीय कार्य-संस्कृति, नागरिक व्यवहार तथा राजनीतिक दृष्टिकोण इन सभी के सम्मिलित विश्लेषण में निहित है।

भ्रष्टाचार का आरोप प्रायः शीर्ष नेतृत्व पर लगा दिया जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि अधिकांश विकास कार्यों की गुणवत्ता स्थानीय स्तर पर तय होती है। निर्माण सामग्री की गुणवत्ता, नालियों की सफाई, सड़क निर्माण का निरीक्षण, जल निकासी के आउटलेट, गड्डों की मरम्मत और दैनिक निगरानी का उत्तरदायित्व स्थानीय अभियंताओं, कर्मचारियों तथा कार्यान्वयन एजेंसियों का होता है। यदि स्थानीय स्तर
पर निष्ठा, उत्तरदायित्व और तकनीकी अनुशासन सुनिश्चित हो जाए तो अनेक समस्याएं स्वतः समाप्त हो सकती हैं। इसलिए उत्तरदायित्व का निर्धारण केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रहकर कार्यान्वयन स्तर तक होना चाहिए।
दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष नागरिक कर्तव्यबोध का है। किसी भी नगर को केवल सरकार स्वच्छ नहीं रख सकती। आज अधिकांश नगरों में घर-घर कचरा संग्रहण की व्यवस्था उपलब्ध है, फिर भी अनेक नागरिक घरेलू कचरा, प्लास्टिक, निर्माण मलबा और अन्य अपशिष्ट सीधे नालियों में डाल देते हैं। परिणामस्वरूप जल निकासी मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं और थोड़ी-सी वर्षा में भी सड़कें तालाब बन जाती हैं। बाद में यही नागरिक प्रशासन को दोष देते हैं। वस्तुतः स्वच्छ नगर का आधार केवल सरकारी व्यवस्था नहीं बल्कि सशक्त नागरिक चेतना भी है। नागरिक कर्तव्यबोध और सिविक सेंस के बिना कोई भी शहर स्थाई रूप से स्वच्छ और जल जमाव मुक्त नहीं बन सकता।

समस्या का तीसरा कारण क्षेत्रवाद आधारित विकास है। अनेक बार प्रभावशाली नागरिक, जनप्रतिनिधि अथवा अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र में अधिकाधिक विकास कार्य करवाने का प्रयास करते हैं। परिणामस्वरूप नगर का विकास समग्र दृष्टि से न होकर खंडित रूप में होता है। कहीं सड़क ऊंची बन जाती है, कहीं नाली अधूरी रह जाती है, कहीं जल निकासी का मार्ग बंद हो जाता है और कहीं सड़क तो बन जाती है, लेकिन उसका वैज्ञानिक ढाल (स्लोप) नहीं रखा जाता। शहर एक समग्र इकाई है, उसका विकास भी समग्र दृष्टिकोण से होना चाहिए। यदि पूरी जल निकासी प्रणाली को एकीकृत रूप से नहीं देखा जाएगा तो किसी एक क्षेत्र का विकास दूसरे क्षेत्र में जलभराव का कारण बन जाएगा। इसी प्रकार अविवेकपूर्ण निर्माण भी एक गम्भीर समस्या बन चुका है।
कई स्थानों पर सड़क निर्माण के समय वैज्ञानिक मानकों का पालन नहीं किया जाता। सड़कें आवश्यकता से अधिक ऊंची बना दी जाती है, जबकि आसपास की नालियों का स्तर वही रहता है। कहीं स्थानीय मांग पर मनमाने स्पीड ब्रेकर बना दिए जाते हैं, तो कहीं बिना समुचित जल निकासी मार्ग छोड़े रोड डिवाइडर निर्मित कर दिए जाते हैं। परिणामस्वरूप वर्षा का पानी सड़क के एक ओर जमा होकर लम्बे समय तक जमा रहता है। यदि निर्माण से पूर्व अभियंताओं की संयुक्त टीम स्थल का वैज्ञानिक अध्ययन करे तथा समग्र जल प्रवाह का नक्शा तैयार किया जाए, तो ऐसी समस्याओं से बहुत सीमा तक बचा जा सकता है।
एक अन्य उपेक्षित पक्ष सड़कों के किनारे की शोल्डर व्यवस्था है। अनेक व्यापारी और मकान मालिक अपने प्रतिष्ठान अथवा घर के सामने सड़क और भवन के बीच उपलब्ध प्राकृतिक मिट्टी को हटाकर पूरी जगह पर टाइल्स, सीमेंट या कंक्रीट बिछा देते हैं। इससे वर्षा का जल भूमि में अवशोषित होने के बजाए सीधे सड़क पर बहता है। प्राकृतिक जल पुनर्भरण बाधित होता है और जल जमाव की समस्या बढ़ जाती है।
वर्तमान समय में निगरानी व्यवस्था भी उतनी प्रभावी नहीं है जितनी होनी चाहिए। अनेक बार सड़क निर्माण पूर्ण होने के बाद उसका तकनीकी ऑडिट नहीं किया जाता। नालियों की समयबद्ध सफाई, जल निकासी बिंदुओं का निरीक्षण, सड़क की ढाल का परीक्षण तथा वर्षा पूर्व तैयारियों का स्वतंत्र मूल्यांकन नियमित रूप से होना चाहिए। केवल कागजी रिपोटों से समस्या का समाधान सम्भव नहीं है। प्रत्येक नगर में मानसून पूर्व ड्रेनेज ऑडिट और मानसून पश्चात प्रदर्शन मूल्यांकन की व्यवस्था अनिवार्य की जानी चाहिए।
सरकार द्वारा सड़क निर्माण, नगर विकास और स्वच्छता के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जा रहे हैं। आवश्यकता धन की नहीं बल्कि उसके विवेकपूर्ण, पारदर्शी और वैज्ञानिक उपयोग की है। सीमित संसाधनों का भी यदि उचित नियोजन, गुणवत्तापूर्ण निर्माण और सतत रख-रखाव के साथ उपयोग किया जाए तो अपेक्षाकृत कम लागत में बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
भविष्य की दृष्टि से नगर नियोजन में आधुनिक तकनीकों का उपयोग भी बढ़ाना होगा। भू-आकृति आधारित ड्रेनेज मैपिंग, वर्षा जल प्रवाह का डिजिटल विश्लेषण, सेंसर आधारित जलभराव निगरानी, जीआईएस आधारित शहरी नियोजन तथा नियमित सामाजिक ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं नगर प्रशासन को अधिक सक्षम बना सकती हैं। साथ ही नागरिक सहभागिता को भी संस्थागत रूप देना होगा, जिससे प्रत्येक वार्ड अपने क्षेत्र की स्वच्छता और जल निकासी के लिए उत्तरदायी बने।
– अलकेश चतुर्वेदी

