कांग्रेस के शासनकाल के घटनाक्रम पर बनी फिल्म। घटनाक्रम भी ऐसा जिसमें पंजाब में आतंकवाद पर रोक लगी। लेकिन फिल्म पर प्रतिबंध लगाया भाजपा सरकार ने। फिल्म का नाम ‘सतलुज’ है, जो इसका तीसरा नाम है। पहले इसका नाम ‘पंजाब 95’ था।
उससे भी पहले इसका नाम ‘घल्लूघारा’ (नरसंहार, भारी विनाश या प्रलय) था। फिल्म कई सालों से सेंसर बोर्ड में फंसी थी। सेंसर बोर्ड ने पहले फिल्म में 21 कट मांगे, फिर कट्स की संख्या 120 हो गई। लेकिन निर्देशक इसके लिए तैयार नहीं थे। फ़िल्म को 7 फ़रवरी 2025 को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज़ करने की घोषणा हुई और इसका टीज़र भी जारी हुआ, लेकिन फिर इसकी रिलीज टल गई।

सिनेमाघरों में अनुमति नहीं मिली तो यह फिल्म 3 जुलाई 2026 को ओटीटी प्लेटफार्म जी5 पर रिलीज हो गई। साथ में निर्देशक हनी त्रेहान ने यह भी घोषणा कर दी कि फिल्म अपने मूल स्वरूप में है और इसमें एक भी कट नहीं लगा है। शायद इसीलिए सरकार के कान खड़े हो गए और 48 घंटे के अंदर इसे ओटीटी पर भी रोक दिया गया। हालाँकि यह फिल्म अभी भी विदेशों में जी5 ग्लोबल पर उपलब्ध बताई जा रही है। जी5 ने एक बयान में कहा कि वे ‘अगले नोटिस तक’ इसे भारत में उपलब्ध नहीं करा रहे हैं।
80 और 90 के दशक के उस दौर में पंजाब पुलिस को दो ‘सुपरकॉप’ कहे गए अधिकारियों के लिए जाना जाता है और उन्हें पंजाब में आतंकवाद के खात्मे का श्रेय दिया जाता है। एक थे जूलियो फ्रांसिस रिबेरो जो मार्च 1986 से 1989 तक पंजाब के डीजीपी रहे। उन्होंने राज्य में आतंकवाद से निपटने के लिए ‘गोली के बदले गोली’ की नीति लागू की थी। आतंकवादियों ने 3 अक्टूबर 1986 को जालंधर स्थित पुलिस मुख्यालय में उन पर जानलेवा हमला भी किया था, जिसमें वे बाल-बाल बच गए थे। दूसरे सुपरकॉप केपीएस यानी कंवरपाल सिंह गिल थे। वे पहले 1988 से 1990 और फिर 1992 से 1995 तक डीजीपी रहे। गिल भी रिबेरो के ही नक्शेकदम पर चले थे।

लेकिन फिल्म में निर्देशक हनी त्रेहान की लाइन अलग है। वे आतंकवाद के खात्मे के बजाय इसे ‘पुलिस स्टेट’ के रूप में ट्रीट कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन को आधार बनाया है। अब मानवाधिकार कार्यकर्ता, आतंकवादियों और पुलिस को किस अलग–अलग नजरिये से देखते हैं, यह हम सभी जानते हैं। यही दृष्टिकोण फिल्म में निर्देशक का भी है। फिल्म पुलिस की ज्यादती पर है लेकिन आतंकवादियों की ज्यादती पर खामोश है।

खालड़ा मानवाधिकार कार्यकर्ता के अलावा शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार प्रकोष्ठ के महासचिव रह चुके थे। खालड़ा ने जून 1984 से दिसंबर 1994 के बीच अमृतसर, मजीठा और तरनतारन के तीन श्मशान घाटों में मिले अज्ञात शवों का ब्योरा सार्वजनिक किया था। उनका दावा था कि ये लावारिस शव पुलिस की अवैध कार्रवाइयों के गवाह हैं। इसके बाद 6 सितंबर 1995 को अमृतसर के कबीर पार्क स्थित खालड़ा के घर से उनका अपहरण हुआ, जिसके बाद वे कभी घर वापस नहीं लौटे। खालड़ा की भूमिका दिलजीत दोसांझ ने निभाई है।
हालांकि उसके बाद अकाली दल की सरकार बनने के बाद भी इसकी जांच नही करवाई गई थी….

बहुत से लोग शायद यह नहीं जानते कि पंजाब में आतंकवाद का मामला ऐसा है कि उसे भड़काने के लिए बस किसी चिंगारी की जरूरत है। शायद बहुत से लोग नहीं जानते कि पंजाब में आतंकवाद पर कितनी मुश्किलों से काबू पाया गया था।

एक दौर था जब पंजाब में आतंकियों के हाथों रोजाना लोग मर रहे थे और किसी के हाथ में अखबार देखकर पूछा जाता था कि पंजाब में आज क्या स्कोर रहा? वास्तव में वो दौर ऐसा था कि पंजाब में आतंकवाद के खात्मे के लिए पुलिसबल का सख्त होना बहुत जरूरी था। सख्त हुए बिना आतंकवाद का खात्मा संभव ही नहीं था। आप कितनी भी आलोचना करें लेकिन आज जो हम शांत पंजाब देख रहे हैं, यह उसी दौर की सख्ती का नतीजा है। लेकिन हम जानते हैं कि सीमा के पार और विदेश में बैठे कुछ आतंकी आज भी कोशिश में हैं कि पंजाब में उसी दौर की वापसी हो जाए।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सरकार और अधिकारियों को आशंका थी कि फिल्म पंजाब में तो चिंगारी भड़का ही सकती है, इसके कुछ संवेदनशील हिस्सों और दृश्यों का दुरूपयोग संभव है।
सरकार को डर यह भी है कही भविष्य में ऐसी और भी घटनाओं पर फिल्में सामने आ सकती है जो पुलिस सरकार पर सवाल खड़े कर सकती है… क्योंकि नॉर्थईस्ट या भी आदिवासी इलाकों में ऐसे आरोप लगते रहे हैं जो पुलिस पर सवालिया निशान लगाते हैं… सरकार को डर यह भी सता रहा है कि इसका भारत-विरोधी ताकतों द्वारा दुरुपयोग किया जा सकता है।
हालांकि लोगों के इस तर्क में भी दम है कि बैन के बाद लोग फिल्म को और ज्यादा देखने की कोशिश करेंगे, लेकिन क्या सरकार को यह बात पता नहीं होगी। निश्चित ही सरकार के पास कुछ गंभीर इनपुट रहे होंगे, जो उसने इस फिल्म पर रोक लगाई है।…..

