दुनिया आज ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती ईंधन लागत जैसी त्रिस्तरीय चुनौतियों का सामना कर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ते तनाव तथा वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि केवल आयातित कच्चे तेल पर निर्भर रहना किसी भी देश के लिए दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता। भारत जैसे देश, जो अपनी आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, के लिए वैकल्पिक ईंधनों की खोज केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक और सामरिक अनिवार्यता भी है। इसी संदर्भ में पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण (E20) और अब फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए E85 जैसे विकल्पों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
हाल के दिनों में E20 को लेकर व्यापक बहस छिड़ी हुई है। केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने इसे पूरी तरह सुरक्षित, वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बताया है। उनका कहना है कि देश में करोड़ों वाहन पिछले कुछ वर्षों से E20 का सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं और किसी व्यापक तकनीकी समस्या का प्रमाण सामने नहीं आया है।
दूसरी ओर कुछ उपभोक्ता संगठनों, वाहन मालिकों और विशेषज्ञों ने माइलेज में कमी, पुराने इंजनों की अनुकूलता तथा दीर्घकालिक प्रभावों को लेकर प्रश्न उठाए हैं। यह विवाद दर्शाता है कि किसी भी नई ऊर्जा नीति की सफलता केवल तकनीकी उपलब्धि पर नहीं, बल्कि जनविश्वास, पारदर्शिता और वैज्ञानिक संवाद पर भी निर्भर करती है।
वास्तव में एथेनॉल कोई नया ईंधन नहीं है। यह गन्ने, मक्का तथा अन्य जैविक स्रोतों से तैयार होने वाला अक्षय जैव-ईंधन है, जिसे पेट्रोल में मिलाकर उपयोग किया जाता है। इससे जीवाश्म ईंधनों की खपत घटती है, कार्बन उत्सर्जन कम होता है और किसानों को अपनी कृषि उपज के लिए अतिरिक्त बाजार उपलब्ध होता है। भारत में एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने गन्ना किसानों की आय बढ़ाने, चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति सुधारने और विदेशी मुद्रा की बचत में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
यदि वैश्विक अनुभवों पर दृष्टि डालें तो ब्राजील इस क्षेत्र का सबसे सफल उदाहरण है। वहाँ दशकों से E27 (27 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल) सामान्य रूप से उपलब्ध है तथा बड़ी संख्या में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन E100 यानी लगभग शुद्ध एथेनॉल पर भी चलते हैं। ब्राजील के उपभोक्ता अपनी सुविधा और कीमत के अनुसार पेट्रोल अथवा एथेनॉल का चयन करते हैं। वहाँ मजबूत कृषि व्यवस्था और विकसित एथेनॉल उद्योग ने इस मॉडल को सफल बनाया है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में भी एथेनॉल का उपयोग कई दशकों से हो रहा है। अधिकांश पेट्रोल पंपों पर E10 उपलब्ध है, जबकि फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए E85 भी व्यापक रूप से प्रयोग किया जाता है। वहाँ मक्का आधारित एथेनॉल उद्योग ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देता है और ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने में सहायक है।
यूरोपीय देशों में अधिकांश स्थानों पर E10 मानक लागू है। हालांकि यूरोप केवल एथेनॉल पर निर्भर नहीं है, बल्कि टिकाऊ बायोमास, जैव-ईंधनों और इलेक्ट्रिक वाहनों के संतुलित विकास पर समान रूप से बल देता है। कनाडा, थाईलैंड, ऑस्ट्रेलिया, जापान और फिलीपींस जैसे देशों ने भी अपनी आवश्यकताओं और संसाधनों के अनुरूप एथेनॉल मिश्रण को अपनाया है।
इसके साथ ही विश्व के अनेक देश एथेनॉल के समानांतर अन्य जैव-ईंधनों और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर भी तेजी से कार्य कर रहे हैं। बायो-ब्यूटेनॉल को एथेनॉल की तुलना में अधिक ऊर्जा घनत्व वाला ईंधन माना जाता है और इसे बिना बड़े इंजन परिवर्तन के उपयोग किया जा सकता है। ABE (Acetone-Butanol-Ethanol) मिश्रण भी एक उन्नत जैव-ईंधन विकल्प के रूप में विकसित हो रहा है। बायो-डीजल पहले से ही कई देशों में डीजल वाहनों के लिए सफल विकल्प है। इसके अतिरिक्त ग्रीन हाइड्रोजन, बायो-हाइड्रोजन, सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल (SAF) तथा सिंथेटिक ई-फ्यूल भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था के महत्वपूर्ण आधार माने जा रहे हैं। स्पष्ट है कि विश्व केवल एक ईंधन पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि विविध ऊर्जा स्रोतों का संतुलित मिश्रण विकसित कर रहा है।
भारत के लिए एथेनॉल की उपयोगिता अनेक स्तरों पर महत्वपूर्ण है। इससे कच्चे तेल के आयात में कमी आती है, विदेशी मुद्रा की बचत होती है, ऊर्जा आत्मनिर्भरता मजबूत होती है, किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है।
सरकार का अनुमान है कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से हजारों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा की बचत संभव हुई है। यदि एथेनॉल उत्पादन में मक्का, गन्ना तथा कृषि अपशिष्ट का संतुलित उपयोग किया जाए तो यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई गति दे सकता है।
इसके बावजूद कुछ व्यावहारिक चुनौतियों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अनेक वाहन निर्माता कंपनियों ने स्वीकार किया है कि पुराने मॉडल के वाहन E20 के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। एथेनॉल में जल अवशोषित करने की क्षमता अधिक होती है, जिससे कुछ परिस्थितियों में ईंधन प्रणाली के धातु भागों पर प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होने के कारण कुछ वाहनों में माइलेज में हल्की कमी देखी जा सकती है। इन चिंताओं को केवल अफवाह कहकर खारिज करने के बजाय वैज्ञानिक परीक्षणों, स्वतंत्र शोध और पारदर्शी संवाद के माध्यम से स्पष्ट करना अधिक उचित होगा।
सरकार और उद्योग जगत को यह सुनिश्चित करना होगा कि E20 अथवा E85 का उपयोग केवल उन्हीं वाहनों में किया जाए जो इसके लिए प्रमाणित हैं। प्रत्येक वाहन पर स्पष्ट लेबलिंग, पेट्रोल पंपों पर उपयुक्त जानकारी, उपभोक्ताओं के लिए जागरूकता अभियान तथा तकनीकी प्रशिक्षण आवश्यक है। साथ ही एथेनॉल उत्पादन में खाद्यान्न सुरक्षा, जल उपयोग और पर्यावरणीय संतुलन का भी ध्यान रखा जाना चाहिए, ताकि ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाया गया कदम कृषि और खाद्य सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले।
वास्तविकता यह है कि एथेनॉल न तो सभी समस्याओं का अंतिम समाधान है और न ही इसे पूरी तरह अस्वीकार किया जा सकता है। यह ऊर्जा परिवर्तन (Energy Transition) की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। भविष्य में भारत को एथेनॉल, बायो-डीजल, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, सीएनजी, बायो-सीएनजी और सिंथेटिक ईंधनों जैसे अनेक विकल्पों का संतुलित विकास करना होगा। यही रणनीति ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण दोनों के लिए अधिक प्रभावी सिद्ध होगी।

आज आवश्यकता किसी एक पक्ष का समर्थन या विरोध करने की नहीं, बल्कि तथ्यों, विज्ञान और अनुभवों के आधार पर संतुलित निर्णय लेने की है। यदि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को पारदर्शिता, वैज्ञानिक परीक्षण, उपभोक्ता हितों और मजबूत अवसंरचना के साथ आगे बढ़ाया जाए, तो यह भारत को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण बढ़त दिला सकता है।
वहीं यदि लोगों की आशंकाओं की अनदेखी की गई या पर्याप्त तैयारी के बिना विस्तार किया गया, तो एक अच्छी नीति भी अनावश्यक विवादों में घिर सकती है। इसलिए भारत को वैश्विक अनुभवों से सीखते हुए चरणबद्ध, वैज्ञानिक और सर्वस्वीकार्य ऊर्जा परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ना होगा। यही भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक मजबूती और हरित विकास का सबसे विश्वसनीय मार्ग है।
– ललित गर्ग

