विरोध करना किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र एवं विरोध को सहन कर पाना किसी भी स्वस्थ समाज का एक महत्वपूर्ण आधार है, परन्तु विरोध मात्र इसलिए हो क्योंकि आपका राजनीतिक एवं वैचारिक आधार ही मात्र विरोध व्यक्त करने तक सीमित हो, यह कहाँ तक उचित हो सकता हैl
अब से पूर्व भी राजधानी दिल्ली के परिक्षेत्र में अनेक बार धरने, विरोध एवं अनशन हुए हैँ, लेकिन इस बार का आंदोलन जंतर मंतर पर पूरी तरह असफल रहा है क्योंकि इस आंदोलन का ना कोई एक वैचारिक आधार है और न ही कोई एक सर्वमान्य मांगl आंदोलन के पहले दिन से जंतर मंतर पर अलग-अलग विचित्र किस्म के प्राणी एकत्रित हुए, किसी को मनुवाद से आजादी चाहिए थी, तो किसी को ब्राह्मणवाद से l

कुछ ने नारा दिया कि, “मेरा लिंग मेरी इच्छा” तो कुछ ने कहा कि ‘छीन के लेंगे आजादी’ लेकिन बताया नहीं किससे छीनेगे आजादीl कुछ ऐसे भी थे जो होमोसेक्सुलिटी पर अपनी स्वतंत्रता के पोषक थे तो कुछ दूसरे के हिस्से की स्वतंत्रता चाहते थेl फिर क्या पूरा आंदोलन ऐसे महामानवों का जमघट बन गया, जहाँ सबकी अपनी-अपनी राग एवं अपनी-अपनी ढपलीl
ढपली से याद आया, कामपंथियों (वमियों) के केंचुवें भी अपने-अपने गंध से बाहर निकले और बैठ गए आंदोलन मेंl उनके सरगना भी समय-समय पर जेएनयू कैंपस की बॉउंड्री लाँघते और धमकते जंतर मंतरl उनकी अपनी इच्छा भी पूर्ण होती क्योंकि एक कैंपस के अंदर ही कबतक आजादी मांगते और फिर लगने लगते नारे, ‘ब्राह्मणवाद से आजादी’,’ मनुवाद से आजादी’l बेचारे मनु स्वर्ग लोक बैठ कर सोचते और प्रसन्न होते कि भला इस आंदोलन के सहारे ही किसी ने मेरा नाम तो लिया l
इस पूरे आंदोलन मे नीट परीक्षा देने वाला न कोई विधार्थी दिखता है और न ही उसके परिजनl फिर दिखते कौन हैँ, स्वरा भास्कर, हाँ वही जिन्हें कुछ वर्ष पूर्व भी छीन के आजादी चाहिए थीl दिखते प्रकाश, जिन्हें सनातन धर्म से आजादी चाहिए थी और अभी भी चाहिएl कुछ और भी ऐसे लोग नजर आते जिन्हें जाना ही केवल इसलिए जाता है क्योंकि वे बेचारे सुबह से शाम तक मोदी जी को गाली देते रहते हैँl उनकी सभी समस्याओं का कारण मोदी और संघ हैँ तो समस्याओं का निराकरण कांग्रेस के युवराजl कुछ वे लोग भी दिख जाते हैँ जो हिन्दुओं को इस देश के दोयम दर्जे का नागरिक समझते हैं, उनकी पूरी इच्छा भारत को भी कबका पाकिस्तान बना देने की रही है, लेकिन वे बेचारे भी मोदी की वज़ह से अनवरत संकट में ही रह रहे हैँl
वास्तव में ऐसे आंदोलन समिष्ट समाज की भावनाओं के साथ क्षल करके अपने निजी एवं बेहद ही घिनौने स्वार्थ की पूर्ति करते हैँl अन्ना आंदोलन की आड़ में केजरीवाल जैसे महा प्रपंची एवं लोभी व्यक्ति ने एक आम आदमी का नमूना खड़ा किया,जो धीरे-धीरे स्वतः ही नागरिक सजगता के कारण पूर्णतः असफल होने की कगार पर हैl केजरीवाल ने नागरिक समाज की उस भावना के साथ खिलवाड़ किया, जिसमें जन आंदोलनों पर विश्वास कर सामान्य व्यक्ति भी अपने और अपने समाज एवं राष्ट्रहित के लिए कार्य करने हेतु तत्पर होता हैl
एक बेहद ही ग़दगी में रहने वाले परजीवी जीव के नाम पर जिन चंद लोगों ने एक असफल आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया, वास्तव में वे भारतीय समाज के आधार तत्वों से सामान्य रूप में भी परिचित नहीं थे, उन्हें हम भारतीय बांग्लादेशी एवं नेपाली लम्पट नजर आये कि अपने ही राष्ट्र की प्रवाहमान सशक्त धारा को विचलित करने के लिए कूद पड़ेl
सोनम इतने अलग-अलग किस्म के काकरोचों के अगुवा बने हैँ कि उन्हें भी खुद नहीं समझ आ रहा कि वे कहाँ फंस गएl
सोनम को इतनी सामान्य जानकारी तो होनी ही चाहिए थी कि काकरोच गंदगी में रहने वाले जीव हैँ, वो भला समाज एवं राष्ट्र का क्या भला करेंगेl उन्हें तो बस आजादी चाहिए लेकिन चाहिए किससे, यह वो स्वयं नहीं जानतेl
खैर मेंनस्ट्रीम मीडिया को जंतर मंतर को कभी-कभी लाइव करना चाहिए, ताकि इन आंदोलनकारियों की विलक्षण क्षमता को देखकर हम सामान्य भारतवासी घर बैठे अपना मनोरंजन कर सकेंl
बाक़ी सोनम जी के स्वस्थ रहने की कामना है
– सचिन

