आंदोलन के नाम पर यह कौन सी पीढ़ी सामने आ रही है जिसे न मर्यादा का भान है न सामान्य शिष्टता का। इनके मुखारबिंद से जो शब्द निकल रहे हैं क्या उसे इनके माता पिता सुन सकते हैं?
हाथों में तख्तियां लिए आंदोलन दुनिया भर में होते हैं। किसी देश के प्रधानमंत्री के लिए ऐसे अपशब्द, ऐसी गालियां और ऐसे वाक्यांश जिन्हें हम देखने और सुनने में भी लजा रहे हैं। क्या यही नीट में गड़बड़ी से नाराज 20 लाख छात्रों का आक्रोश है?
शिक्षा व्यवस्था को बचाने के नाम पर अगर जंतर मंतर वाले छात्र ही इस आंदोलन का चेहरा हैं तो इस देश के उन सभी अभिभावकों को चुल्लू भर पानी में डूब जाना चाहिये (मुहावरा सन्दर्भ) जिनके बच्चे उनकी अनुमति से इस आंदोलन में बदजुबानी कर रहे हैं।
राजनीति और नेतृत्व विकास की प्राथमिक पाठशाला छात्र राजनीति और कैम्पस होते हैं यह सही है। जेपी आंदोलन से निकले अनगिनत चेहरे दशकों से हमारी संसदीय व्यवस्था के आभूषण बनकर काम कर रहे हैं। अलग-अलग वैचारिकी के बावजूद देश को उन सब पर गर्व है। लेकिन दिल्ली में जो दो दिन से हो रहा है उसने तो अश्लीलता और असभ्यता जैसे शब्दों को अप्रसांगिक और महत्वहीन बना दिया है।
छात्राओं के मुंह से जिस शब्दावली को देश सुन रहा है वह जेन जी के नाम पर देश में एक ऐसे संकट को बेनकाब कर रहा है जो नीट की गड़बड़ी से भी ज्यादा खतरनाक है। व्यवस्था की गड़बड़ी तो हम सुधार सकते हैं लेकिन सवाल इस युवा मन के मन और मस्तिष्क में समा चुकी कुसंस्कार की गंदगी का है।

यह भी सही हैं कि आन्दोलनजीवी छात्र छात्राओं के इस लज्जाजनक वर्ग को हम देश के सभी विद्यार्थियों के साथ सामान्यीकरण नही कर सकते हैं, लेकिन यह एक सामाजिक त्रासदी तो इसलिए है ही क्योंकि बच्चे तो हमारे देश के ही है। जो इस अश्लीलता और सभ्यता के सभी मानकों को रसातल पर ले जाकर भी किसी अपराधबोध को अनुभूत नही कर रहे हैं।
इस शर्मनाक प्रदर्शन में एक बात आपको कॉमन लगनी चाहिये: बांग्लादेश में ऐसे ही छात्रों ने वहां की प्रधानमंत्री शेख हसीना के अंग वस्त्रों को लेकर प्रदर्शन किया था। उनके विरुद्ध ऐसे ही शब्दों का प्रयोग किया था जैसे आज मोदी के लिए किए जा रहे हैं। उसे भी जेन जी कहा गया था। इसे भी जेन जी के गुस्से का नाम दिया जा रहा है। नेपाल,बांग्लादेश की घटनाओं के बाद भारत में ऐसे ही आह्वान करने वाले लोग कौन थे?
दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि देश में अशोक वाजपेयी जैसे बौद्धिक गैंग लीडर इस पर चुप ही नही बल्कि इसे प्रोत्साहित कर रहे हैं। 2014 के बाद मेन स्ट्रीम मीडिया की मठाधीशी गंवा चुके यूटूबर पत्रकार और विपक्ष के जिम्मेदार लोग भी चुप है। वे नामी शिक्षाविद जो 2014 तक विश्विद्यालयो में अकादमिक शिखर पर थे, वे यह नही कह पा रहे हैं कि यह हमारी शिक्षा के ये संस्कार नही है।
ऐसे में सवाल यह कि क्या ये टूल किट नही है?
आंदोलन की पटकथा और विषयवस्तु बता रही है मुद्दा धर्मेंद्र प्रधान कहीं हैं ही नहीं। नीट कहीं पीछे छूट गया है। इस आंदोलन के हैंडलर्स कहीं और हैं। देश को इन्हें चिन्हित करना होगा। आजादी.. लड़कर लेंगे आजादी… लाल सलाम के वामपंथी गिरोह रह-रह कर सक्रिय होते हैं। शिक्षा की आड़ में सिगरेट के छल्ले, सेनेटरी नेपकिन पर गालियां, गुप्तांगों तक जाती प्रदर्शन की तख्तियां और कानों में अंगुली लगा लेने पर विवश कर देती लड़कियों की गालियों को कौन सा विश्विद्यालय पढ़ाता है, यह सब जानते हैं।
नीट, जेईई और प्रसाशानिक प्रतियोगिता के भारत के विद्यार्थी तो यह सब नही पढ़ते हैं और न उनके अभिभावक ऐसी शिक्षा कॅरियर में सहभागी हैं।
पुनश्च: इस आंदोलन के साथ उठे पेपर लीक विषय पर किसी प्रकार की असहमति नही है। किसी भी प्रकार के छात्र आंदोलन से विरोध नहीं है।
सवाल केवल वही हैं जो ऊपर उठाएं गए हैं।
– अजय खेमरिया
