आज जब हम स्वतंत्र भारत की उपलब्धियों पर गर्व करते हैं, तब दादरा मुक्ति संग्राम के उन ज्ञात-अज्ञात सेनानियों को स्मरण करना भी हमारा दायित्व हैं, जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि भारत की स्वतंत्रता अधूरी न रहे। उनके साहस, संगठन और बलिदान की गाथा आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
भारत की स्वतंत्रता का इतिहास केवल 15 अगस्त 1947 पर समाप्त नहीं होता। स्वतंत्रता के बाद भी देश के कुछ भू-भाग विदेशी औपनिवेशिक शक्तियों के नियंत्रण में ही बने रहे। गोवा, दमन, दीव और दादरा-नगर हवेली ऐसे ही क्षेत्र थे, जहां पुर्तगाली शासन का शिकंजा बना हुआ था। जब पूरा देश स्वतंत्र भारत के निर्माण में जुटा था, तब इन क्षेत्रों के लोग तब भी विदेशी शासन की बेड़ियों में जकड़े हुए थे।
विशेष रूप से दादरा और नगर हवेली की मुक्ति का इतिहास भारतीय जनशक्ति, संगठन, साहस और राष्ट्रभक्ति का ऐसा अध्याय है, जिसे मुख्यधारा के इतिहास लेखन में अपेक्षित स्थान नहीं मिल सका। यह केवल एक भू-भाग को मुक्त कराने का संघर्ष नहीं था बल्कि यह उस राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक था जो मानती थी कि भारत की स्वतंत्रता तब तक अधूरी है, जब तक देश का अंतिम इंच भू-भाग भी विदेशी शासन से मुक्त न हो जाए।
जब सरकार की सीमाएं थीं, तब समाज आया आगे
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय कानूनों, कूटनीतिक दबावों और वैश्विक परिस्थितियों के कारण पुर्तगाली शासित क्षेत्रों में प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं थी। पुर्तगाल इन क्षेत्रों को अपना अभिन्न अंग घोषित कर चुका था और किसी भी प्रकार की वार्ता या समझौते के लिए तैयार नहीं था।
ऐसी परिस्थिति में समाज के भीतर राष्ट्रवादी शक्तियों ने पहल की। वर्ष 1954 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों, आजाद गोमांतक दल के कार्यकर्ताओं और स्थानीय राष्ट्रभक्त युवाओं ने मिलकर एक सुनियोजित अभियान की शुरुआत की। यह अभियान किसी सरकारी सेना द्वारा नहीं बल्कि राष्ट्रभक्ति से प्रेरित स्वयंसेवकों द्वारा संचालित किया गया था।
दादरा से सिलवासा तक विजय की यात्रा
21-22 जुलाई 1954 की रात मुक्ति सेनानियों ने दादरा स्थित पुर्तगाली पुलिस चौकी पर धावा बोला। सीमित संसाधनों और अत्यल्प संख्या के बाद भी उन्होंने पुर्तगाली बलों को आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया। दादरा की मुक्ति के साथ इस अभियान की पहली बड़ी सफलता मिली और पहली बार वहां भारतीय तिरंगा फहराया गया।
इसके बाद 28 जुलाई को नरोली और फिर 2 अगस्त 1954 को सिलवासा पर नियंत्रण स्थापित किया गया। सिलवासा उस समय दादरा और नगर हवेली का प्रशासनिक केंद्र था। पुर्तगाली सेना को विश्वास था कि वह इस क्षेत्र को बचाने में सफल रहेगी, पर मुक्ति सेनानियों के साहस और रणनीति के सामने उसका मनोबल टूट गया। 2 अगस्त की सुबह तक पूरा क्षेत्र पुर्तगाली शासन से मुक्त हो चुका था। यह विजय केवल सैन्य सफलता नहीं थी बल्कि इस बात का प्रमाण भी थी कि संगठित समाज असम्भव दिखने वाली परिस्थितियों को भी बदल सकता है।
जब संगीत बना मुक्ति संग्राम का हथियार
दादरा मुक्ति संग्राम का एक अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक पक्ष यह भी है कि इसमें कला और संस्कृति ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
हथियारों, रसद और संगठनात्मक व्यवस्थाओं के लिए आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता थी। प्रसिद्ध संगीतकार सुधीर फड़के के प्रयासों से पुणे में एक विशेष चैरिटी संगीत कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में भारत की स्वर कोकिला लता मंगेशकर और महान पार्श्वगायक मोहम्मद रफी ने बिना किसी पारिश्रमिक के प्रस्तुति दी।
उस समय कदाचित् किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि संगीत की मधुर स्वर-लहरियां एक मुक्ति संग्राम की ऊर्जा बन जाएंगी। इस कार्यक्रम से प्राप्त धनराशि का उपयोग मुक्ति अभियान की आवश्यकताओं को पूरा करने में किया गया। यह घटना भारतीय राष्ट्रवाद के उस स्वरूप को दर्शाती है जिसमें कलाकार, समाजसेवी, स्वयंसेवक और सामान्य नागरिक एक ही उद्देश्य के लिए खड़े दिखाई देते हैं।
राजाभाऊ वाकणकर: केवल योद्धा नहीं, सांस्कृतिक राष्ट्रनिर्माता भी-
दादरा मुक्ति संग्राम के प्रमुख रणनीतिकारों में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर, जिन्हें राजाभाऊ वाकणकर के नाम से जाना जाता है, का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। बाद के वर्षों में वे भारत के महान पुरातत्वविदों में गिने गए और भीमबेटका शैलाश्रयों की खोज के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध हुए।
इतिहास की उपेक्षा और पुनर्स्मरण
दादरा और नगर हवेली की मुक्ति के बाद भी इसका औपचारिक विलय तत्काल भारत में नहीं हो सका। अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण यह क्षेत्र कुछ वर्षों तक स्थानीय प्रशासन के अधीन संचालित होता रहा और अंततः 11 अगस्त 1961 को भारत संघ में औपचारिक रूप से सम्मिलित हुआ। दुर्भाग्य से इस पूरे संघर्ष को भारतीय इतिहास में वह स्थान नहीं मिला, जिसका वह अधिकारी था।
वर्षों बाद दादरा और नगर हवेली को पुर्तगाली दासता से मुक्ति विषय पर एक बार फिर चर्चा आरम्भ हुई- जब वर्ष 2019 में इस ऐतिहासिक सत्य को देश के सर्वोच्च पटल पर स्वीकार किया गया। वर्ष 2019 में जब संसद में दादरा-नगर हवेली और दमन-दीव के विलय से जुड़ा विधेयक पेश किया गया, तब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने ऐतिहासिक दस्तावेजों को सामने रखते हुए सदन में कहा कि दादरा और नगर हवेली को पुर्तगाली दासता से मुक्त कराने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की बाजी लगाई थी।
उन्होंने विशेष रूप से राजाभाऊ वाकणकर और सुधीर फड़के के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि इतिहास के इन पन्नों को दबाया नहीं जा सकता और इस मुक्ति संग्राम में संघ की भूमिका अद्वितीय और सर्वोपरि थी।
राष्ट्र केवल राजनीतिक सीमाओं का नाम नहीं
दादरा मुक्ति संग्राम हमें बताता है कि राष्ट्र केवल राजनीतिक सीमाओं का नाम नहीं हैं। राष्ट्र उन लोगों के त्याग, साहस और समर्पण से बनता है, जो अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय उद्देश्य को प्राथमिकता देते हैं। इतिहास केवल राजाओं और सरकारों का ही नहीं होता। इतिहास उन लोगों का भी होता है जो बिना किसी पद, पुरस्कार या प्रसिद्धि की अपेक्षा के राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं।
आशीष त्रिवेदी

