अभी ग्लास्गो में कॉमनवेल्थ गेम्स चल रहे हैं और इन गेम्स में भारत का सिक्का भी खूब चल रहा है। इस प्रतिस्पर्धा में भारत के जेन-जी का प्रतिनिधित्व करने वाले युवा अपनी क्षमताओं के बल पर मैडल्स की बारिश कर पूरे देश को गौरवान्वित कर रहे हैं। एक ओर त्रिपुरा की अस्मिता डे ने भारत को जूडो में पहला गोल्ड दिलाया तो दूसरी ओर 23 साल की अरूंधती चौधरी ने अपनी गोल्डन मुक्केबाजी में भारत का मान बढ़ाया है। ऐसे ही हर्ष सिंह, प्रीति पवार, यामिनी मोर्य, यशस्वी सिंह आदि कई नाम हैं जो अपने बेहतरीन प्रदर्शन से न केवल भारत बल्कि विश्वभर के खेल प्रेमियों को लुभा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि ये युवा केवल खेल जगत में कीर्तिमान रच रहे हैं, बल्कि हर क्षेत्र में भारत के युवाओं ने अपने सामर्थ्य का लोहा मनवाया है। और ऐसा भी नहीं कि केवल आज के युवा ऐसा कर रहे होंं, हर काल में भारत की युवा पीढ़ी ने अपने पुरूषार्थ और उत्तम चरित्र के स्वर्णिम अध्याय लिखे हैं।
भारत का इतिहास रहा है, यहां हर समय की युवा पीढ़ी अपने समय का चरित्र लिखती है। स्वतंत्रता आंदोलन की पीढ़ी ने बलिदान लिखा, स्वतंत्र भारत की पीढ़ी ने निर्माण लिखा और इक्कीसवीं सदी की पीढ़ी ने तकनीक, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा का अध्याय लिखा। आज जब इतिहास की ये कलम भारत के Gen-Z के हाथ में है तो प्रश्न केवल इतना नहीं कि यह पीढ़ी कितनी आधुनिक और चपल है, प्रश्न यह है कि यह पीढ़ी कितनी भारतीय है। वह अपनी ऊर्जा को किस रूप में व्यक्त करती है। उसे राष्ट्र निर्माण में लगाती है या राष्ट्रीय संस्थाओं से टकराकर अपनी ऊर्जा नष्ट करती है।
जब हम आज की नई पीढ़ी की बात कर रहे हैं, तो हमें भारत का सांस्कृतिक इतिहास उठाकर भी देखना चाहिए। यदि हम अतीत में झांके तो पाएंगे कि भारत में हर काल में युवाओं ने ही इतिहास रचे है। कठोपनिषद् का बालक नचिकेता मृत्यु के सम्मुख खड़ा होकर सत्य का प्रश्न करता है। वह आज भी इसलिए स्मरण किया जाता है क्योंकि उसने प्रश्न पूछे, लेकिन प्रश्नों के साथ सत्य की साधना भी की। उसने व्यवस्था को तोड़ने का नहीं, ज्ञान को पाने का मार्ग चुना। क्योंकि उसका साहस विद्रोही नहीं, सत्य की खोज का साहस था।
इसी प्रकार ध्रुव ने अपने अपमान का उत्तर हिंसा से नहीं दिया। वह विचलित अवश्य हुए, किंतु उनका उत्तर प्रतिशोध नहीं, तपस्या बना। इसलिए उन्होंने स्वयं के तप, धैर्य और आत्मविश्वास से ऐसा स्थान प्राप्त किया कि उनका नाम ही आज स्थिरता का पर्याय बन गया है। ठीक ऐसी ही कथा प्रह्लाद की भी है। प्रह्लाद सत्ता के भय के सामने झुके नहीं, किंतु उनकी दृढ़ता हिंसा में भी नहीं बदली। उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मूल्य नहीं छोड़े। अगर हम इन तीनों बालकों पर दृष्टिपात करें तो इन तीनों ने अपनी अल्पायु में यह सिद्ध कर दिया था कि महानता शक्ति, पराक्रम, क्रोध या विद्रोह से नहीं सद्चरित्र से जन्म लेती है।

यही परंपरा आगे चलकर छत्रपति शिवाजी महाराज में दिखाई देती है, जिन्होंने किशोर अवस्था में स्वराज्य का स्वप्न देखा। यही तेज युवा विवेकानंद में दिखाई देता है, जिन्होंने शिकागो में खड़े होकर भारत को केवल एक राष्ट्र से ऊपर उठकर एक सभ्यता के रूप में प्रतिष्ठित किया। यही ऊर्जा युवा क्रांतिनायकों में भी दिखाई देती है, जिन्होंने अल्पायु में अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए। इनके अंदर भरपूर साहस तो था, किंतु उन्माद नहीं। इनकी कार्यशैली भी अलग हो सकती है, लेकिन इनका ध्येय एक ही था, व्यवस्था को श्रेष्ठ बनाने का।
अब यहां एक प्रश्न स्वभाविक ही जन्म ले लेता है कि ऐसी पीढ़ी आज कहाँ? यदि कोई पूछे कि आज के भारत में ऐसे युवा कहाँ हैं, तो उत्तर दूर नहीं खोजना पड़ेगा। सीमा पर तैनात सैनिकों की चौकियों से लेकर इसरो की प्रयोगशालाओं तक, स्टार्टअप की छोटी-सी कार्यशाला से लेकर ओलंपिक के मैदान तक, भारत का युवा निरंतर नए इतिहास लिख रहा है।
नीरज चोपड़ा, डी. गुकेश जैसे खिलाड़ी विश्व मंच पर भारत का गौरव बढ़ाते हैं। शुभांशु शुक्ला जैसे युवा अंतरिक्ष में भारत की नई उड़ान का प्रतीक बनते हैं। ऐसे हजारों-लाखों युवा हैं, जो आज शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और सामाजिक परिवर्तन का कार्य कर रहे हैं। अपने परिश्रम से राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ाने का कार्य कर रहे हैं। वे कैमरों की सुर्खियों में जरूर नहीं हैं, लेकिन भारत की असली कहानी वही लिख रहे हैं।

यहीं से एक असहज प्रश्न फिर जन्म लेता है कि यदि भारत की युवा परंपरा इतनी उज्ज्वल है और आज भी लाखों युवा राष्ट्रनिर्माण में जुटे हैं, तो फिर समय-समय पर ऐसी तस्वीरें क्यों सामने आती हैं जो इस पूरी पीढ़ी की छवि पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं? आखिर ऐसा क्या बदल गया कि संवाद की जगह टकराव और प्रदर्शन को सफलता का सबसे सरल मार्ग समझ लिया गया?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ प्रदर्शन इसी प्रश्न को हमारे सामने खड़ा करता हैं। यहाँ हुए प्रदर्शन और उसमें सक्रिय “कॉकरोच जनता पार्टी” की गतिविधियों ने एक गंभीर विमर्श को जन्म दिया है। किसी सरकार से कुछ मुद्दों पर असहमति रखना लोकतंत्र का स्वाभाविक अधिकार है, किंतु देश की संस्थाओं को शत्रु मानकर विरोधी स्वर बुलंद करना लोकतंत्र की आत्मा को ही कमजोर करता है।

यहाँ विरोध के दौरान पुलिस के साथ हिंसक टकराव हुए, उनको गालियाँ दी गईं, अमर्यादित इशारे करते हुए वायरल होने के कुत्सित प्रयास किए गए। देश की आर्मी को अपशब्द कहे गए। सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया, मीडिया से दुर्व्यवहार किया गया और ऐसा सब हुआ जो भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाने के लिए काफी था। इस आंदोलन से ऐसी तस्वीरें विश्वभर में वायरल कराई जाएं जिनसे भारत की लोकतांत्रिक परिपक्वता पर प्रश्न उठें, तो यह केवल विरोध नहीं रहता, यह उस पीढ़ी के आत्मबोध का प्रश्न बन जाता है जो स्वयं को भारत का भविष्य कहती है।
अब कुछ लोग इसे युवाओं का आक्रोश कहेंगे। आक्रोश स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन ये समझना भी जरूरी है कि आक्रोश कभी भी उत्तरदायित्व का विकल्प नहीं बन सकता। जिस युवा के हाथ में कल देश की संसद, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, सेना, उद्योग और विज्ञान की कमान होगी, यदि वही आज सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचाने, पुलिस को शत्रु मानने और हर असहमति को टकराव में बदलने का अभ्यास करेगा, तो यह वर्तमान के साथ भविष्य के लिए भी घातक चिंता का विषय है। लोकतंत्र में सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन राष्ट्र स्थायी होता है। इसलिए विरोध यदि राष्ट्र की संस्थाओं को कमजोर करने लगे, तो उस पर प्रश्न उठाना लोकतंत्र का विरोध नहीं बल्कि लोकतंत्र के प्रति उत्तरदायित्व ही है।
हमारी सभ्यता ने कभी भी ऐसे उन्माद को वीरता माना ही नहीं। हमारी परंपरा ने युवाओं को अगर अधिकारों के लिए आवाज उठाना सिखाया है तो, उसे कर्तव्यबोध का पाठ भी पढ़ाया है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युद्ध करने को कहा, लेकिन धर्म की मर्यादा नहीं लांघने दी। श्रीराम ने अन्याय का प्रतिकार किया, लेकिन लोकमर्यादा को भी सर्वोपरि रखा। और इसलिए ही वह इस देश के आदर्श हैं।
आज भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाला राष्ट्र है। यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है। और इसी शक्ति के बल पर हम विकसित भारत और आगे विश्वगुरु भारत का सपना देखते हैं। लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि शक्ति हमेशा जिम्मेदारी लेकर आती है। यदि आज हमारा Gen-Z राष्ट्रनिर्माता बनेगा तो भारत केवल विकसित राष्ट्र के साथ विश्व का नैतिक नेतृत्व करने वाला राष्ट्र भी बनेगा। लेकिन यदि यही पीढ़ी उग्रता, असहिष्णुता और अराजकता को आधुनिकता समझ बैठेगी, तो यह हमारी पूरी सभ्यता के लिए संकट होगा। इसलिए आवश्यक है कि यह पीढ़ी अपनी क्षमताओं के साथ अपने कर्तव्य भी समझे।
कुल योग यही है कि भारत को ऐसे Gen-Z की आवश्यकता नहीं जो क्षणिक उत्तेजना में अपना विवेक खो दे। भारत को ऐसे Gen-Z की आवश्यकता है जो आधुनिक हो, लेकिन अपनी जड़ों से कटा हुआ न हो। जो प्रश्न पूछे, लेकिन उत्तर खोजने का धैर्य भी रखे। जो अन्याय का प्रतिरोध करे, लेकिन न्याय की मर्यादा भी न छोड़े। जो तकनीक में अग्रणी हो, किंतु संस्कारों में भारतीय बना रहे। उसे नचिकेता की जिज्ञासा, ध्रुव का धैर्य, शिवाजी का नेतृत्व, विवेकानंद का आत्मविश्वास और क्रांतिनायकों सा राष्ट्रसमर्पण, इन सबका समन्वय बनना होगा तभी भारत के सभी संकल्प सिद्ध होंगे।
इस पीढ़ी को समझना होगा कि आने वाले वर्षों में जब भारत के इस Gen-Z का मूल्यांकन किया जाएगा, तब यह नहीं पूछा जाएगा कि उसने कितने प्रदर्शन किए, उनमें कितनी उग्रता दिखाई। प्रश्न यह पूछा जाएगा कि उसने भारत को कितना ऊँचा उठाया। यही प्रश्न आज दिल्ली में जंतर-मंतर के हालात देखने के बाद हमारे सामने है, और यही प्रश्न आने वाले भारत का उत्तर भी तय करेगा।
– अभिलाष ठाकुर
