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शर्मिला टैगोर की असली पहचान है आयशा सुल्ताना?

शर्मिला टैगोर की असली पहचान है आयशा सुल्ताना?

नाम, धर्म और वैचारिकी का सच!

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग, सामाजिक
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भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ गिने-चुने नाम ऐसे हैं जिन्होंने पर्दे पर अमिट छाप छोड़ी, किंतु उनका वास्‍तविक जीवन वह नहीं रहा, जोकि पर्दे पर उनकी पहचान है, इन्हीं नामों में से एक हैं, शर्मिला टैगोर यानी कि आयशा सुल्ताना।

वैसे सत्यजीत रे की फिल्मों से अपने करियर की शुरुआत करने वाली शर्मिला टैगोर इस वक्‍त विशेष रूप से ‘वंदे मातरम्’ पर दिए गए उनके एक विवादास्पद बयान के बाद से चर्चा में बनी हुई हैं। क्‍योकि एक तरफ उनका नाम हिन्‍दू है दूसरी ओर वे वही तर्क गढ़ते हुए दिखती हैं, जोकि भारत के राष्‍ट्रगीत वन्‍देमातरम् को लेकर अक्‍सर कट्टर इस्‍लामिक सोच रखनेवाले मुसलमान गढ़ते हैं।

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ऐसे में यह सवाल उठना स्‍वभाविक है कि क्या उनकी असली पहचान आज भी बंगाली हिंदू परंपराओं से जुड़ी है या फिर वह पूरी तरह से ‘आयशा सुल्ताना’ के रूप में अपनी इस्लामिक पहचान को जी रही हैं? असल में यह पहचान की पड़ताल इसलिए भी आवश्‍यक हो गई है क्‍योंकि उनका व्‍यवहार धर्म के आधार पर गहरे अंतर्विरोधों को उजागर करता हुआ दिख रहा है।

शर्मिला टैगोर से ‘आयशा सुल्ताना’ बनने की कहानी
इसके लिए साल 1968 में चलते हैं, उस दौर में शर्मिला टैगोर हिंदी सिनेमा की शीर्ष अभिनेत्रियों में शामिल थीं। इसी दौरान उनका प्रेम संबंध भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान और भोपाल के नवाब मंसूर अली खान पटौदी से हुआ। उस दौर में ‘विशेष विवाह अधिनियम’ (स्पेशल मैरिज एक्ट-1954) मौजूद था, जिसके तहत दो अलग-अलग धर्मों के लोग बिना अपना धर्म बदले कानूनी शादी कर सकते हैं, लेकिन एक पढ़ी-लिखी महिला होने के बाद भी विवाह की कानूनी और धार्मिक औपचारिकताओं को पूरा करने के लिए शर्मिला टैगोर ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और अपनी पहचान बदलकर इस्‍लामिक शरिया नियमों के अनुसार, (विवाह) निकाह किया और अपना एक नया इस्लामिक नाम रखा, आयशा सुल्ताना।

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अब उनकी शाही पटौदी परिवार की बहु और भोपाल की बेगम के रूप में नई पहचान थी। हालांकि, विवाह के बाद भी उन्होंने फिल्मों में काम करना जारी रखा और पर्दे पर अपना पुराना नाम ‘शर्मिला टैगोर’ ही बनाए रखा, यहीं सबसे ज्‍यादा विवाद पैदा होता है, आखिर उन्‍होंने अपनी ये दोहरी पहचान क्‍यों बनाए रखी? स्‍वभाविक है, वे जानती थीं कि हकीकत सामने आने के बाद उनका जो नाम है वह गुमनामी में खो जाएगा। क्‍योंकि आयशा के नाम से भारतीय समाज उन्‍हें स्‍वीकार नहीं करेगा।

कानूनी दस्तावेजों का सच: क्या छिपाया गया नाम?
अब एक बड़ा तर्क यह है कि यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से धर्म बदलता है, तो उसे अपनी नई पहचान को पूरी तरह और गर्व से स्वीकार करना चाहिए। मगर शर्मिला टैगोर के मामले में ऐसा नहीं दिखता है। उनके कानूनी और आधिकारिक दस्तावेजों पर एक अनूठा विरोधाभास देखने को मिलता है। भारत के अदालती मामलों, संपत्ति के दस्तावेजों और विरासत प्रमाण-पत्रों (Succession Certificates) में उनका नाम आधिकारिक रूप से “शर्मिला टैगोर उर्फ आयशा सुल्ताना” दर्ज है। कानून की भाषा में ‘उर्फ’ या ‘Alias’ का उपयोग तब किया जाता है जब एक ही व्यक्ति के दो अलग-अलग नाम और पहचान समाज या प्रशासन में सक्रिय हों।

 

उनकी बेटी सोहा अली खान ने अपनी पुस्तक और कई साक्षात्कारों में इस बात को स्वीकार किया है कि बचपन में वे भाई-बहन अक्सर भ्रमित हो जाते थे क्योंकि उनकी माँ कुछ सरकारी कागजातों पर ‘शर्मिला’ के रूप में हस्ताक्षर करती थीं और कुछ पर ‘आयशा’ के रूप में। यह विरोधाभास इस बात को बल देता है कि सार्वजनिक जीवन और व्यावसायिक लाभ के लिए ‘हिंदू नाम’ (शर्मिला टैगोर) का उपयोग जारी रखा गया, जबकि पारिवारिक, धार्मिक और संपत्ति से जुड़े लाभों के लिए ‘इस्लामिक नाम’ (आयशा सुल्ताना) का उपयोग किया गया।

वंदे मातरम् विवाद
अब बात ‘वंदे मातरम्’ की करते हैं। शर्मिला टैगोर ने इस पर अचानक से एक बयान दिया, जबकि वे इस बात को जानती हैं कि भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर देश में लंबे समय से एक राजनीतिक और धार्मिक खींचतान चली आ रही है। मुलसमान अब भी इसे पूरा गाना नहीं चाहते और मजहबी आड़ लेकर संपूर्ण वन्‍देमातरम् गान का वहिष्‍कार करते रहे हैं, फिर भी वे इस पर टिप्पणी करते हुए कहती हैं कि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में, जहाँ एक बड़ी आबादी एकेश्वरवाद में विश्वास करती है, वंदे मातरम् के सभी छंदों को अनिवार्य करना ठीक नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि गीत के बाद के छंदों में ‘दुर्गा’ और ‘काली’ जैसी हिंदू देवियों का आह्वान किया गया है, इसलिए मुस्लिम समुदाय के लिए इसे गाना (संभव नहीं) धार्मिक रूप से कठिन है। उन्होंने केवल इसके शुरुआती दो छंद ही गाए जाने चाहिए की बात सामने रखी।

अब इस विवाद ने यह पूरी तरह से साफ कर दिया है कि शर्मिला टैगोर के भीतर धार्मिक (मजहबी) चेतना हावी है।क्‍योंकि यह सर्वविदित है कि भारत के बहुसंख्यक समाज और स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास के अनुसार, वंदे मातरम् में आए ‘दुर्गा’ या ‘लक्ष्मी’ जैसे नाम किसी संकीर्ण मजहबी अर्थ में नहीं हैं। वे मातृभूमि की असीम ऊर्जा, शक्ति, साहस और समृद्धि के जीवंत प्रतीक हैं। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने देश की मिट्टी को ही महाशक्ति के रूप में देखा था। स्वतंत्रता सेनानियों ने बिना किसी धार्मिक भेदभाव के फाँसी के फंदे पर झूलते समय ‘वंदे मातरम्’ का जयघोष किया था।

दूसरी ओर इस्लाम के मूल सिद्धांत ‘तौहीद’ (एकेश्वरवाद) के अनुसार, अल्लाह के अलावा किसी भी अन्य आकृति, देवी, प्रतीक या देश की पूजा या वंदना (सिजदा) करना पूरी तरह वर्जित (शिर्क) माना गया है। जब शर्मिला टैगोर यह कहती हैं कि “एक ईश्वर को मानने वालों के लिए ‘वंदे दुर्गा’ कहना मुश्किल है”, तो वह अनजाने में या जानबूझकर पूरी तरह से एक रूढ़िवादी इस्लामिक पक्ष का समर्थन कर रही होती हैं।

ऐसे में स्‍वभाविक है कि लोग उनसे पूछेंगे और उनके बारे में कहेंगे ही कि यदि वह सचमुच उस बंगाली हिंदू विरासत (रवींद्रनाथ टैगोर के परिवार) की प्रतिनिधि होतीं, तो मातृभूमि की शक्ति के इन प्रतीकों को सहजता से स्वीकार करतीं। किंतु उन्‍होंने जो कहा है उससे साफ पता चलता है कि और उनका यह बयान इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि अंदरूनी तौर पर उनकी वैचारिक और धार्मिक निष्ठा पूरी तरह से मजहबी ‘आयशा सुल्ताना’ की पहचान के साथ जुड़ी हुई है।

बच्चों की परवरिश और घर का माहौल: सांस्कृतिक समन्वय या एकतरफा झुकाव?
शर्मिला टैगोर और पटौदी परिवार के प्रशंसक अक्सर उनके घर को ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ (सांस्कृतिक समन्वय) का प्रतीक बताते हैं, जहाँ ईद और दिवाली दोनों मनाए जाने की बातें कही जाती हैं। लेकिन यदि व्यावहारिक धरातल पर देखा जाए, तो झुकाव स्पष्ट रूप से एक तरफ दिखाई देता है।
शर्मिला टैगोर के तीनों बच्चों, सैफ अली खान, सबा अली खान और सोहा अली खान के नाम, उनकी प्रारंभिक शिक्षा और उनकी धार्मिक पहचान पूरी तरह से इस्लामिक है। हाल ही में उनकी बेटी सबा अली खान ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट किया था कि उनकी माँ (शर्मिला) ने बचपन से ही उन्हें इस्लामिक प्रार्थनाएं, तौर-तरीके और धार्मिक संस्कार सिखाने पर ध्यान दिया। पटौदी पैलेस में हिंदू रीति-रिवाजों या पूजा-पाठ का कोई स्थाई स्थान नहीं रहा।

इसके अतिरिक्त, सैफ अली खान के बच्चों (तैमूर और जेह) के नामों को लेकर जो देशव्यापी विवाद हुआ, उसने भी यह दिखाया कि परिवार अपनी नई धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर कितना दृढ़ है। ऐसे में यह सोचना गलत नहीं प्रतीत होता कि ‘सांस्कृतिक समन्वय’ या ‘धर्मनिरपेक्षता’ की बातें केवल सार्वजनिक मंचों के लिए थीं, जबकि वास्तविक जीवन में पटौदी खानदान की इस्लामिक परंपराओं को ही सर्वोपरि रखा गया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सैफ अली खान द्वारा अपने बेटे का नाम तैमूर रखा जाना है, जबकि सभी जानते हैं, तैमूर नाम इतिहास में हिन्‍दू नरसंहार के लिए जाना जाता है।
तुर्क-मंगोल आक्रांता तैमूर लंग का भारत आक्रमण (वर्ष 1398) क्रूरता, लूटपाट और भीषण नरसंहार के सबसे भयावह अध्यायों में से एक है। तैमूर ने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-तैमुरी’ में स्पष्ट किया था कि भारत पर उसके आक्रमण का मुख्य उद्देश्य मूर्तिपूजक हिंदुओं के खिलाफ युद्ध करना और धन लूटना था। उसके पूरे अभियान के दौरान हिंदू आबादी को अत्यधिक बर्बरता का सामना करना पड़ा।

आक्रमण की शुरुआत और सीमावर्ती नगरों में तबाही

तैमूर लंग के सैनिकों ने जब दिल्ली में खड़ी कर दी कटे सिरों की मीनार - BBC  News हिंदी
तैमूर लंग मार्च 1398 में समरकंद से एक विशाल सेना के साथ निकला और सितंबर में सिंधु नदी पार कर पंजाब में दाखिल हुआ। रास्ते में आने वाले तुलम्बा, सिरसा, फतेहाबाद, कैथल और पानीपत जैसे नगरों में उसकी सेना ने भारी तबाही मचाई। इन क्षेत्रों में हिंदू बस्तियों को पूरी तरह लूट लिया गया, खड़ी फसलों को नष्ट कर दिया गया और जो लोग इस्लाम स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हुए, उन्हें बेरहमी से मार दिया गया या बंदी बना लिया गया। भटनेर (हनुमानगढ़) के किले पर कब्ज़ा करने के बाद हुए नरसंहार ने पूरे उत्तर भारत में खौफ पैदा कर दिया था।

एक लाख हिंदू कैदियों का सामूहिक नरसंहार
तैमूर के इतिहास का सबसे वीभत्स कांड दिल्ली के पास ‘लोनी’ नामक स्थान पर हुआ। तैमूर की सेना के पास लगभग 1,00,000 हिंदू बंदी (पुरुष, महिलाएं और बच्चे) एकत्र हो चुके थे। तैमूर ने अपनी सेना को आदेश दिया कि सभी एक लाख बंदियों को एक ही दिन में मौत के घाट उतार दिया जाए। इतिहासकारों के अनुसार, इस वीभत्स नरसंहार में नदी-नाले खून से लाल हो गए थे।

दिल्ली का विनाश और खोपड़ियों की मीनारें
17 दिसंबर 1398 को दिल्ली के सुल्तान को हराने के बाद तैमूर की सेना ने दिल्ली शहर में प्रवेश किया। यद्यपि शुरुआत में शांति का आश्वासन दिया गया था, लेकिन जल्द ही उसके सैनिकों ने शहर में लूटपाट और कत्लेआम शुरू कर दिया। कई दिनों तक चले इस तांडव में हिंदू आबादी को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया, उनके घरों को जला दिया गया और संपत्ति लूट ली गई। इस क्रूरता की पराकाष्ठा यह थी कि मरे हुए लोगों के कटे सिरों को इकट्ठा करके जगह-जगह नरमुंडों (खोपड़ियों) की ऊँची मीनारें खड़ी कर दी गईं, ताकि लोगों के दिलों में दहशत बैठ जाए।

इसके अलावा तैमूर के अत्याचार सिर्फ मानव संहार तक सीमित नहीं रहे थे, उसने भारत के सांस्कृतिक गौरव को भी गहरी चोट पहुंचाई। दिल्ली को खंडहर बनाने के बाद उसने मेरठ, हरिद्वार और कांगड़ा की तरफ रुख किया। हिंदुओं के पवित्र तीर्थ स्थल हरिद्वार में गंगा नदी के तट पर उसने भारी रक्तपात किया और वहां के प्राचीन मंदिरों को अपवित्र व नष्ट कर दिया। सनातन संस्कृति के प्रतीकों, मूर्तियों और पूजा स्थलों को तोड़ना उसके अभियान का एक मुख्य हिस्सा था।

इस भयावह आक्रमण में हजारों हिंदू महिलाओं को असहनीय यातनाओं का सामना करना पड़ा। उन्हें बंदी बनाकर दासी (गुलाम) के रूप में मध्य एशिया के बाजारों में बेचने के लिए ले जाया गया। इसके अलावा, दिल्ली और उत्तर भारत के हज़ारों कुशल शिल्पकारों, राजमिस्त्रियों और कारीगरों को भी जबरन बंदी बना लिया गया। तैमूर इन भारतीय कारीगरों को अपने साथ समरकंद ले गया, जहाँ उसने भारत से लूटी गई बेतहाशा धन-दौलत और इन्हीं गुलाम कारीगरों की मदद से अपनी भव्य इमारतें और जामा मस्जिद बनवाई। तैमूर के इस आक्रमण ने दिल्ली और उत्तर भारत को इस कदर पंगु बना दिया कि उस तबाही से उबरने में इस क्षेत्र को दशकों का समय लग गया। अब यह सब जानते हुए भी शर्मिला टैगोर के घर में तैमूर नाम रखा जाए! यह सीधे इस्‍लामिक कट्टरता की ओर इशारा करता है।

पहचान के अंतर्विरोधों का मूल्यांकन
शर्मिला टैगोर का जीवन और उनके हालिया बयान इस बात का जीवंत उदाहरण हैं कि कोई भी व्यक्ति अपनी सार्वजनिक छवि से चाहे कितना भी बड़ा कलाकार क्यों न बन जाए, उसकी आंतरिक वैचारिक निष्ठा अंततः उसके धार्मिक और व्यक्तिगत निर्णयों से ही तय होती है। उन्हें ‘शर्मिला टैगोर’ के नाम से बॉलीवुड में जो प्यार, सम्मान और स्टारडम मिला, वह भारत के बहुसंख्यक हिन्‍दू समाज की उदारता का प्रतीक है, जिसने कभी कलाकार को धार्मिक चश्मे से नहीं देखा। मगर जब वही कलाकार राष्ट्रीय प्रतीकों (जैसे वंदे मातरम्) को धार्मिक संकीर्णता के दायरे में तौलने लगता है, तो समाज को उनके वास्तविक स्वरूप पर विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

अत: कहना यही होगा कि कानूनी कागजातों पर दर्ज “शर्मिला टैगोर उर्फ आयशा सुल्ताना” सिर्फ दो नामों का मेल नहीं है, यह दो अलग-अलग संसारों के बीच अपने स्‍वार्थ के लिए संतुलन बनाने की एक ऐसी कोशिश है, जिसमें समय-समय पर ‘आयशा सुल्ताना’ की धार्मिक और वैचारिक पहचान ही शर्मिला टैगोर पर अधिक मुखर होकर सामने आती है, जैसा कि घर में तैमूर नाम, बच्‍चों को शरिया एवं इस्‍लामिक लॉ के अनुसार तैयार करके के साथ ही इस प्रकरण में भी दिखाई दी है।

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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