हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
मन चंगा तो समाज में गंगा

मन चंगा तो समाज में गंगा

by अमोल पेडणेकर
in ट्रेंडींग, सामाजिक, सितम्बर 2026
0

जैसा हमारा मन होगा, वैसे ही हमारी शारारिक क्रिया-प्रतिक्रिया होगी। अत: सर्वप्रथम हमें अपने अंतर्मन का आत्मनिरिक्षण करते रहना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपने विवेक-बुद्धि युक्त शुभ कर्म से मन को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास करना चाहिए, तभी समाज एवं राष्ट्र में परिवर्तन का शुभारम्भ होगा।

रेल के डिब्बे में सह प्रवासियों से हुई छोटी सी कहा-सुनी एक व्यक्ति के हत्या में बदल जाती है। दिल्ली के जंतर मंतर आंदोलन में सहभागी युवक-युवती गलत शब्द के उपयोग से घृणा का प्रदर्शन करते हैं। एक पिता अपनी युवा लड़की को नदी में डुबोकर मार देता है। पत्नी अपने पति को कभी ड्रम में भरकर तो कभी गहरी खाई में धकेल कर जान से मार देती है। ट्रेन में एक छोटी सी बात पर टोकनी वाली महिला को पट्टे से मारने का प्रयास सहप्रवासी करता है। इस प्रकार की अलग-अलग घटनाएं समाज में निरंतर घटित हो रही है।

समाज में घटने वाली इन घटनाओं को हम प्रायः बाहर से देखते हैं। इन घटनाओं के कारणों की खोज करते समय हम अर्थव्यवस्था, राजनीति, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक व्यवस्था और प्रशासन की चर्चा करते हैं। यह सब होना आवश्यक भी है, परंतु क्या हमने कभी इस प्रश्न को पर्याप्त गम्भीरता से समझने का प्रयास किया है कि इन सारी बाहरी घटनाओं के पीछे मनुष्य के भीतर क्या चल रहा है? क्योंकि समाज में घटित होने वाली हर घटना के केंद्र में अंततः मनुष्य ही होता है और उस मनुष्य के व्यवहार के केंद्र में उसका ‘मन’ होता है।

समाज में दिखाई देने वाला आंदोलन या नकारात्मक घटनाओं के पीछे कई बार मनुष्य के अंतर्मन में चल रहे आंदोलन की अभिव्यक्ति ही होती है। इसलिए वर्तमान में समाज को समझने के लिए केवल समाजशास्त्र पर्याप्त नहीं है। हमें सामाजिक मानसशास्त्र की आवश्यकता है। ऐसी दृष्टि, जो समाज में घटित होने वाली घटनाओं के पीछे व्यक्ति के मन को पढ़ सके। कारण प्रत्येक घटित होने वाली घटना से पहले व्यक्ति के मन में कुछ घटता अवश्य है।

किसी युवक का अचानक हिंसक हो जाना केवल उस क्षण की घटना नहीं होती। उसके पीछे कई दिनों, महिनों या वर्षों से जमा अनुभव हो सकते हैं। अपमान, असफलता, बेरोजगारी, असुरक्षा, परिवार से संवाद का अभाव, सामाजिक तुलना, डिजिटल दुनिया का दबाव या स्वयं के अस्तित्व को लेकर पैदा हुआ प्रश्न। इसीलिए किसी भी सामाजिक घटना को केवल ऊपरी सतह से देखना अधूरा विश्लेषण हो सकता है। कारण होने वाली घटना दिखाई देती है, व्यवहार दिखाई देता है, उसके पीछे का मन दिखाई नहीं देता। एक युवक जब कहता है, मुझे कोई समझता नहीं तो उसके शब्दों के पीछे केवल शिकायत नहीं होती, उसके भीतर स्वीकृति की भूख हो सकती है।

जब कोई व्यक्ति निरंतर क्रोधित रहता है तो उसके क्रोध के पीछे केवल उसका स्वभाव नहीं होता, सम्भव है कि उसके भीतर कोई गहरी पीड़ा हो। जब समाज में हिंसा बढ़ती है तो हम केवल हथियार, भीड़ या नारों को देखते हैं। हमें उन मनों को भी देखना चाहिए जिनमें हिंसा को स्वीकार करने की मानसिकता तैयार हुई है? एक व्यक्ति के मन में चल रहा आंदोलन कब सामाजिक आंदोलन बन जाता है? हमें पता ही नहीं चलता। किसी राष्ट्र का सामाजिक वातावरण अचानक निर्मित नहीं होता। वह करोड़ों मनों की सामूहिक मनःस्थिति से धीरे-धीरे निर्मित होता है। इसीलिए किसी भी राष्ट्र के भविष्य का प्रश्न केवल यह नहीं है कि उसके पास कितने संसाधन हैं? उसकी जीडीपी कितनी है? विकास के कितने आयाम हैं? प्रश्न यह भी है कि उस राष्ट्र के नागरिकों के मन में किस प्रकार की ऊर्जा है। आज स्किल डेवलपमेंट के साथ माइंड डेवलपमेंट की भी अत्यंत आवश्यकता है।

सोशल मीडिया | फायदे, नुकसान, बहस, तर्क-वितर्क, फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन और  इंटरनेट की लत | ब्रिटानिका

सोशल मीडिया ने विचारों के प्रसार को अत्यंत तेज कर दिया है। सोशल मीडिया पर एक व्यक्ति का क्रोध हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। एक अफवाह कुछ ही क्षणों में सामूहिक आक्रोश में बदल सकती है, पर समस्या केवल सोशल मीडिया नहीं है। सोशल मीडिया या माध्यम वही फैलाता है जो व्यक्ति के मन में पहले से उपस्थित है। जिस मन में संतुलन है, वह सोशल मीडिया का सकारात्मक उपयोग करेगा। जिस मन में असुरक्षा है, वह दुसरों से तुलना करेगा। जिस मन में क्रोध है, वह आक्रोश खोजेगा। जिस मन में घृणा है, उसे घृणा की सामग्री आकर्षित करेगी और जिस मन में करुणा है, वह उसी माध्यम का उपयोग किसी की सहायता के लिए करेगा। इसलिए तकनीक को दोष देने से पहले हमें पूछना होगा, हमारे भीतर क्या भरा हुआ है? हमारे अंतर्मन में क्या चल रहा है?

घर में सम्मान है तो वह सम्मान सीखता है। घर में निरंतर अपमान है तो उसके भीतर आक्रोश जमा हो सकता है। घर में हर बात में प्रतियोगिता है तो वह स्वयं की दूसरों से तुलना करना सीखता है। घर में प्रेम है तो उसके भीतर सुरक्षा की भावना विकसित होती है। आज अनेक परिवारों के सामने एक विचित्र संकट है, हम बच्चों को सुविधाएं बहुत दे रहे हैं, पर समय कम दे रहे हैं। बच्चे को मोबाइल मिल गया, शिक्षा मिल गई, महंगे कपड़े मिल गए, मनोरंजन मिल गया, परंतु क्या उसे यह भी मिला कि कोई प्रतिदिन 10 मिनट बैठकर उससे पूछे, तुम्हारे मन में क्या चल रहा है? समाज में उपस्थित होने वाली कई सामाजिक समस्याओं की शुरुआत कदाचित् ज्यादातर परिवार में इसी प्रश्न की अनुपस्थिति से होती है। मनुष्य की सबसे बड़ी लड़ाई बाहर नहीं, भीतर है। कबीर ने मन की इसी सत्ता को पहचाना था, संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा है,

मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
कहे कबीर हरि पाइए, मन ही की परतीति॥

कबीर के लिए मन केवल विचारों का स्थान नहीं था; मन ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र की दिशा निर्धारित करने वाला केंद्र था। आज के संदर्भ में संत कबीर के इस दोहे को एक व्यापक अर्थ में समझा जा सकता है।

व्यक्ति की हार पहले मैदान में नहीं होती, कई बार मन में होती है। हिंसा पहले हाथ से नहीं होती, कई बार मन में जन्म लेती है। घृणा पहले शब्दों में नहीं आती, पहले मन में जगह बनाती है और अशांति भी पहले समाज में नहीं आती, वह पहले मन में जन्म लेती है। ओशो ने भी बार-बार मनुष्य को अपने भीतर झांकने, अपने विचारों और प्रतिक्रियाओं के प्रति सजग होने पर बल दिया। उनके चिंतन का एक केंद्रीय सूत्र यह था कि मनुष्य को अपने भीतर घट रही प्रक्रियाओं का साक्षी बनना सीखना चाहिए। यह बात व्यक्ति को पीड़ित की भूमिका से निकालकर आत्मचिंतन की दिशा में ले जाती है।

आध्यात्मिक एवं सामाजिक क्षेत्र के महामहिम व्यक्तित्व के माध्यम से उपस्थित यह विचार हमारे व्यक्तिगत जीवन पर भी उतने ही लागू होते हैं। हम समाज से शांति चाहते हैं, किंतु क्या हमारे घर में शांति है? हम राष्ट्र में सद्भाव चाहते हैं, पर क्या हमारे वैयक्तिक व्यवहार में सहिष्णुता है? हम चाहते हैं कि दूसरे हमारी बात समझें, परंतु क्या हम कभी दूसरे की बात सुनते हैं? हम चाहते हैं कि समाज में हिंसा न हो, किंतु क्या हम अपने शब्दों में हिंसक नहीं हैं? यहीं से हमारे अंतर्मन का आत्मनिरीक्षण शुरू होता है।

समाज के मानसिक स्वास्थ्य सुधार हेतु हमें क्या करना होगा? इस प्रश्न के साथ दिखाई देने वाली समस्या बड़ी है, इसलिए समाधान भी हमें ही ढूंढने चाहिए। परिवार में प्रतिदिन कुछ समय बिना मोबाइल, बिना टेलीविजन और बिना किसी अन्य व्यवधान के बातचीत के लिए होना चाहिए। प्रश्न केवल यह न हो, पढ़ाई कैसी चल रही है? बल्कि तुम कैसा महसूस कर रहे हो? तुम्हारे अंतर्मन में क्या चल रहा है? यह छोटे से प्रश्न परिवार में परिवर्तन का बहुत बड़ा अंतर निर्माण कर सकता है।

प्रत्येक मोहल्ले या विद्यालय में मनोचिकित्सक नहीं हो सकता, परंतु प्रत्येक परिवार में सुनने वाला व्यक्ति हो सकता है। किसी युवा को या परिवार के दुर्लक्षित व्यक्ति को यह महसूस हो कि मैं अकेला नहीं हूं, कोई मेरी बात सुनने के लिए तैयार है। इससे उसके भीतर की बहुत-सी ऊर्जा विनाश से सकारात्मक निर्माण की ओर मुड़ सकती है। आध्यात्मिकता का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं है। आध्यात्मिकता का अर्थ है, मैं कौन हूं? मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मेरे क्रोध का स्रोत क्या है? मेरी इच्छाओं की सीमा क्या है? मैं दूसरों के प्रति कैसा व्यवहार करता हूं? यह समझने का प्रयास करना भी है। मेरा समाज के प्रति क्या दायित्व है? जब ये प्रश्न हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बनते हैं, तब व्यक्ति केवल पीड़ित नहीं रहता, वह दायित्ववान नागरिक बनने लगता है।

संत रविदास : भारत में धर्मांतरण के प्रारंभिक विरोधी - विश्व संवाद केंद्रसंत रविदास की प्रसिद्ध पंक्ति, ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ वर्तमान में असाधारण प्रासंगिकता रखती है। हम समाज, राजनीति, शिक्षा और युवाओं को बदलना चाहते हैं, परंतु एक प्रश्न हमें अपने सामने रखना होगा, क्या हम स्वयं को बदलने के लिए तैयार हैं? क्योंकि समाज कोई अलग वस्तु नहीं है। हम ही समाज हैं, राष्ट्र हम हैं, हम ही परिवार हैं। इसलिए हमारे विचारों, हमारी इच्छाओं, हमारे व्यवहारों और हमारी प्रतिक्रियाओं का सामूहिक रूप ही समाज है। इसलिए समाज को गाली देना आसान है, समाज को बदलना कठिन है और समाज को बदलने का सबसे पहला कदम है, अपने मन को देखना। हर व्यक्ति अपने भीतर अपना विश्व लेकर चलता है। व्यक्ति के अपने विश्व के भीतर भी संघर्ष होता है- विवेक और वासना के बीच, धैर्य और क्रोध के बीच, सेवा और स्वार्थ के बीच, आशा और निराशा के बीच संघर्ष है।

यदि व्यक्ति अपने भीतर के इस संघर्ष को संतुलित करना सीखता है तो परिवार मजबूत होता है। परिवार मजबूत होता है तो समाज मजबूत होता है। समाज मजबूत होता है तो राष्ट्र मजबूत होता है। इसलिए राष्ट्रनिर्माण केवल संसद, सरकार, सेना, उद्योग या प्रशासन का काम नहीं है।

राष्ट्रनिर्माण का पहला कारखाना मनुष्य का मन है। हमें एक मानसिक स्वच्छता के व्यापक अभियान की आवश्यकता है। हमने स्वच्छ भारत की बात की। अब समय है कि हम स्वच्छ मन की भी बात करें। हमें अपने बच्चों से अभी नया प्रश्न पूछना होगा, अब तक हम उनसे पूछते आए हैं, तुम कितने नम्बर लाए? कितना कमाते हो? कौन-सी नौकरी करोगे? कितनी सफलता मिली? परंतु हमें अब और नए प्रश्न जोड़ने होंगे, तुम्हारा मन कैसा है? तुम्हारे मन में क्या चल रहा है और जब वह उत्तर दे तो तुरंत सलाह देने के बजाए पहले उसकी बातों को सुने क्योंकि सम्भव है कि उसके मन में कोई ऐसा आंदोलन चल रहा हो, जिसकी आवाज अभी हम तक या हमारे समाज तक पहुंची नहीं है।

आंदोलन करनेवाले युवा नेता और उनको उकसाने वाले राजनीति से जुड़े हुए नेतृत्व कहते हैं कि अगला आंदोलन हम यहां से इस सरकार के विरोध में शुरू करेंगे, फलाना आंदोलन इस विषय को लेकर करेंगे। वर्तमान समाज की समस्या को भांपते हुए समाज में अगला आंदोलन कहां से शुरू होगा, यह केवल राजनीतिक विश्लेषण का विषय नहीं है। वह किसी बेरोजगार युवक के मन से शुरू हो सकता है। किसी टूटे हुए परिवार से शुरू हो सकता है। किसी अकेले वृद्ध के मन से शुरू हो सकता है। किसी अपमानित व्यक्ति की स्मृति से शुरू हो सकता है। किसी बच्चे की उपेक्षा से शुरू हो सकता है या किसी ऐसे युवा के भीतर से शुरू हो सकता है जिसे लगता है कि उसके जीवन का कोई अर्थ नहीं।

हालांकि ‘देश का भविष्य संसद से नहीं सड़क से तय होगा’ ऐसा कहकर जेन-जी को संघर्ष हेतु भड़कानेवाले योगेंद्र यादव जैसे अराजक तत्वों से देश के युवाओं को सावधान और जागरूक रहने की आवश्यकता है। समाज के प्रत्येक व्यक्ति के उस छोटे-से निर्णय से मैं अपनी प्रतिक्रिया बदलूंगा। मन बदलता है तो दृष्टि बदलती है, दृष्टि बदलती है तो व्यवहार बदलता है। व्यवहार बदलता है तो परिवार बदलता है। परिवार बदलता है तो समाज बदलता है। समाज बदलता है तो राष्ट्र का वातावरण बदलता है और राष्ट्र का वातावरण बदलता है तो इतिहास की दिशा बदल सकती है।

योगेंद्र यादव - विकिपीडिया

इसलिए आज सामाजिक सुधार के साथ मानसिक और नैतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है। हमें ऐसे मन चाहिए जो असफलता में टूटें नहीं, सफलता में बहकें नहीं। विरोध में हिंसक न हों, अपमान में प्रतिशोधी न हों। तकनीक का उपयोग करें, पर तकनीक के गुलाम न बनें। प्रतियोगिता करें, पर मनुष्यता न खोएं और व्यक्तिगत सफलता को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ें। समाज की सबसे बड़ी शक्ति न तो कानून है, न व्यवस्था और न ही तकनीक। सबसे बड़ी शक्ति- स्वस्थ, संतुलित और सजग मनुष्यता में है। इसलिए परिवर्तन की शुरुआत बाहर से करने से पहले भीतर से करनी होगी, अपने अंतर्मन से करनी होगी। आज हर व्यक्ति यदि कुछ क्षण अपने भीतर उतरकर स्वयं से पूछे, मेरे मन में क्या चल रहा है? या मेरा मन स्वस्थ है तो कदाचित् यही प्रश्न समाज के भविष्य की दिशा बदलने का प्रारम्भ बन सकता है। हम केवल यह नहीं कहेंगे कि ‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’ वास्तव में हम ऐसा समाज बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे, जहां ‘चंगा मन’ ही चंगे समाज और सशक्त राष्ट्र की पहली पहचान होगी। इस विचार को साक्षी लेकर हम यही कहेंगे कि ‘मन चंगा तो समाज में गंगा’।

अमोल पेडणेकर

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
Tags: #MentalHealthInHindi#MindfulnessInHindi#MindsetShift#NationBuilding#ParentingTips#SelfIntrospection#SocialMediaImpact#SocialPsychology

अमोल पेडणेकर

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0