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नशा मुक्त युवा विकसित भारत की नींव

नशा मुक्त युवा विकसित भारत की नींव

by हिंदी विवेक
in युवा, शिक्षा, सितम्बर 2026
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देश की सीमाओं की रक्षा सैनिक करते हैं, परंतु देश के भविष्य की रक्षा उसकी युवा पीढ़ी करती है। इसलिए आज आवश्यकता केवल नारा लगाने की नहीं बल्कि वातावरण बदलने की है। हमें यह संकल्प लेना होगा कि नशा करने वाले व्यक्ति से नहीं अपितु नशे से घृणा करेंगे और पीड़ित व्यक्ति को सुधार तथा उपचार का अवसर देंगे।

नशा मात्र एक व्यक्ति को प्रभावित नहीं करता। इसका प्रभाव परिवार, समाज और राष्ट्र पर पड़ता है, अत: इसका प्रभाव व्यापक है। नशे के विरुद्ध लड़ाई केवल कानून व्यवस्था से सम्बंधित विषय नहीं है। यह राष्ट्रीय चरित्र, जनस्वास्थ्य और युवा शक्ति को संरक्षित करने का अभियान है। भारत आज 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इस संकल्प की सबसे बड़ी शक्ति देश का युवा है। जिस देश की युवा पीढ़ी स्वस्थ, शिक्षित, अनुशासित, कर्मठ और लक्ष्य के प्रति समर्पित हो, उस देश की प्रगति सुनिश्चित हो जाती है। इसके विपरीत यदि युवा नशे की गिरफ्त में चले जाएं तो शिक्षा, रोजगार, परिवार, स्वास्थ्य, उत्पादकता और सामाजिक सुरक्षा, हर क्षेत्र पर उसका दुष्प्रभाव पड़ता है। इसी व्यापक चुनौती को ध्यान में रखते हुए मोदी

सरकार ने ‘नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत संकल्प अभियान’ को राष्ट्रव्यापी जनभागीदारी आंदोलन का स्वरूप दिया है।
यह अभियान 100 सप्ताह तक चलने वाला है। इसका लक्ष्य केवल नशे के दुष्परिणामों के बारे में जानकारी देना नहीं बल्कि युवाओं को नशे से दूर रखने के साथ-साथ उन्हें राष्ट्र निर्माण की सकारात्मक शक्ति से जोड़ना है। नशा मुक्त युवा ही विकसित भारत की नींव है।

International Day against Drug Abuse Poster Drawing | Say No To Drugs Drawing |Lahari Virudha Poster

नशा व्यक्ति की निर्णय क्षमता, स्वास्थ्य और भविष्य को प्रभावित करता है। एक युवा की नशे की आदत पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति को संकट में डाल देती है। नशा मुक्ति को केवल ‘नशा छोड़ने’ तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसके साथ शिक्षा, रोजगार, खेल, कौशल विकास, मानसिक दृढ़ता, पारिवारिक संवाद और सामाजिक सहयोग को जोड़ना होगा। विकसित भारत का अर्थ केवल बड़ी अर्थव्यवस्था, चौड़ी सड़कें, आधुनिक तकनीक और ऊंची इमारतें नही हैं। विकसित भारत का वास्तविक आधार स्वस्थ नागरिक, मजबूत परिवार, संस्कारवान युवा और कर्तव्य पारायण समाज है।

माय भारत और युवाओं की निर्णायक भूमिका
इस अभियान की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें युवा केवल श्रोता नहीं बल्कि परिवर्तन के वाहक बनाए जा रहे हैं। प्रधान मंत्री द्वारा अभियान के शुभारम्भ के दौरान परिवार, शिक्षक और समाज में युवाओं के साथ खुले संवाद तथा नशे की समस्या से जूझ रहे लोगों को सहयोग और चिकित्सा सहायता देने पर बल दिया गया। अब आगे माय भारत के स्वयंसेवक, एनएसएस, युवा क्लब, विद्यार्थी, शिक्षक, शैक्षणिक संस्थान, एनजीओ और आध्यात्मिक संस्थाएं मिलकर इसे जन आंदोलन का स्वरूप दे सकते हैं।

2 अगस्त 2026 को आयोजित राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम में 10,000 स्थानों पर वर्चुअल सहभागिता तथा 125 आध्यात्मिक संगठनों, माय भारत एवं एनएसएस से सम्बद्ध संस्थानों, युवा क्लबों और शैक्षणिक संस्थानों की भागीदारी निर्धारित की गई थी। युवाओं के लिए शपथ, प्रश्नोत्तरी, जागरूकता कार्यक्रम और विभिन्न गतिविधियों को भी अभियान से जोड़ा गया है।

Say No To Drugs

इसका उद्देश्य युवाओं को केवल नशे से दूर करना नहीं बल्कि उन्हें स्वस्थ जीवनशैली और सामाजिक नेतृत्व के लिए प्रेरित करना है। अभियान को निरंतर आंदोलन बनाने के क्रम में इसकी अवधि अभियान को एक महत्वपूर्ण अवसर देती है, परंतु सफलता तभी मिलेगी जब अभियान केवल रैलियों, पोस्टरों, शपथ और भाषणों तक सीमित न रहे। हर जिले में ‘नशा मुक्त युवा कार्ययोजना’ बनाई जानी चाहिए। प्रत्येक विद्यालय, कॉलेज और विश्वविद्यालय को अपने क्षेत्र के लिए वार्षिक लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। ग्राम पंचायत, नगर निकाय और वार्ड स्तर तक युवा स्वयंसेवकों की छोटी-छोटी टीमें बनाई जा सकती हैं। प्रत्येक टीम का काम हो, युवाओं में जागरूकता फैलाना।

विद्यालय, समाज एवं परिवार में हो संवाद का दृष्टिकोण
नशे की रोकथाम की शुरुआत उस आयु से होनी चाहिए जब युवा अपनी पहचान और भविष्य का निर्माण कर रहा होता है। विद्यालयों और कॉलेजों में केवल एक दिन का ‘एंटी-ड्रग डे’ मनाने के बजाए पूरे वर्ष गतिविधियां चलनी चाहिए। विशेषज्ञों द्वारा संवाद, काउंसलिंग, खेल प्रतियोगिताएं, निबंध, भाषण, पोस्टर, नुक्कड़ नाटक, फिल्मों की स्क्रीनिंग और फिटनेस कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। शिक्षकों को छात्रों को यह समझाना होगा कि नशे की ओर बढ़ रहा विद्यार्थी अपराधी नहीं होता। कई बार वह किसी दबाव, अकेलेपन, असफलता या गलत संगति से जूझ रहा होता है। इसलिए डांट से पहले संवाद और

बहिष्कार से पहले सहायता का दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
नशे के विरुद्ध सबसे पहली सुरक्षा दीवार परिवार है। माता-पिता और अभिभावकों को बच्चों के साथ मित्रवत संवाद करना होगा। बच्चे के व्यवहार में अचानक परिवर्तन, पढ़ाई से दूरी, गलत संगति, अत्यधिक खर्च या सामाजिक अलगाव जैसी स्थितियों को केवल अनुशासनहीनता मानकर छोड़ देना उचित नहीं है। परिवार को समय रहते संवाद करना चाहिए।

भारत की सामाजिक संरचना में आध्यात्मिक संस्थाओं, संतों, धार्मिक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। वे नशा मुक्ति के संदेश को नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति दे सकते हैं। आध्यात्मिक संस्थाएं युवाओं के लिए ध्यान, योग, सेवा, संस्कार, चरित्र निर्माण और सकारात्मक जीवनशैली से जुड़े कार्यक्रम चला सकती हैं। 2025 में वाराणसी में आयोजित ‘नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत’ युवा आध्यात्मिक सम्मेलन में भी विभिन्न आध्यात्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लेकर बहुक्षेत्रीय रणनीति पर जोर दिया था।

प्रशासनिक दायित्व एवं उत्तरदायित्व
पुलिस, नारकोटिक्स सम्बंधी केंद्रीय एवं राज्य एजेंसियों, सीमा सुरक्षा तंत्र, राजस्व विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए। स्कूल-कॉलेजों के आसपास नशीले पदार्थों की विक्री पर विशेष निगरानी हो। डिजिटल माध्यमों से होने वाली अवैध विक्री और प्रचार पर तकनीकी क्षमता के साथ कार्रवाई आवश्यक है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ ही इस अभियान की सफलता का निर्णायक पक्ष है। यदि किसी सरकारी विभाग का कोई अधिकारी या कर्मचारी नशीले पदार्थों के कारोबार को संरक्षण देता है, तस्करों से मिलीभगत करता है, जांच को प्रभावित करता है या रिश्वत लेकर कार्रवाई रोकता है तो उसके विरुद्ध सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई से आगे जाकर कानून सम्मत कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।

समाधान के क्रम में स्वतंत्र शिकायत प्रणाली, गोपनीय सूचना तंत्र, सम्पत्ति एवं वित्तीय लेन-देन की जांच, विभागीय उत्तरदायित्व और समयबद्ध जांच व्यवस्था विकसित की जा सकती है। ‘नशा मुक्त युवा फॉर विकसित भारत’ बड़े राष्ट्रीय संकल्प की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। 100 सप्ताह का यह अभियान तभी सफल होगा जब यह सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़कर सामाजिक संस्कार बन जाए।

अमित त्यागी

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