सृष्टि के निर्माण और शिल्प कला के आदि देवता भगवान विश्वकर्मा की जयंती भारतीय संस्कृति में एक अत्यंत पावन और महत्वपूर्ण अवसर है। यह दिन केवल एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन में सृजन, श्रम और शिल्प के महत्व को स्थापित करने वाला एक महान पर्व है। हिंदू धर्मग्रंथों और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, भगवान विश्वकर्मा को इस पूरे ब्रह्मांड का प्रथम वास्तुकार और शिल्पी माना गया है। वे ही वह ईश्वरीय शक्ति हैं जिन्होंने देवताओं के रहने के लिए भवनों, उपयोग के लिए अस्त्रों और संपूर्ण सृष्टि के भौतिक ढांचे का निर्माण किया। जिस प्रकार ब्रह्मा जी को सृष्टि का रचयिता माना जाता है, उसी प्रकार उस सृष्टि को भौतिक रूप, सुंदरता और उपयोगिता प्रदान करने का कार्य भगवान विश्वकर्मा का है। उनकी जयंती हर वर्ष कन्या संक्रांति के दिन मनाई जाती है। भारतीय पंचांग के अनुसार यह वह समय होता है जब सूर्य देव सिंह राशि की अपनी यात्रा पूर्ण करके कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। इसी खगोलीय घटना के कारण यह पर्व प्रायः हर वर्ष 16 या 17 सितंबर को ही पड़ता है।

भगवान विश्वकर्मा के महान कार्यों का वर्णन हमारे वेदों, पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में विस्तार से मिलता है। मान्यता है कि जब समुद्र मंथन हुआ था, तब उसमें से कई अनमोल रत्न निकले थे और उसी महान मंथन से भगवान विश्वकर्मा की भी उत्पत्ति हुई थी। उन्होंने देवताओं के लिए एक से बढ़कर एक अद्भुत वस्तुओं का निर्माण किया। भगवान शिव का त्रिशूल, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, देवराज इंद्र का वज्र और यमराज का कालदंड जैसे अजेय और शक्तिशाली अस्त्र उनके ही शिल्प कौशल का परिणाम हैं। केवल अस्त्र ही नहीं, बल्कि उन्होंने देवताओं के निवास के लिए कई भव्य नगरों का भी निर्माण किया। स्वर्ण की लंका, जो बाद में रावण के अधिकार में आ गई थी, उसका निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने ही भगवान शिव और माता पार्वती के लिए किया था। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के लिए समुद्र के बीच में द्वारका नगरी और पांडवों के लिए हस्तिनापुर तथा इंद्रप्रस्थ जैसी मायावी और सुंदर नगरियों का निर्माण भी उन्हीं के हाथों हुआ था। उनके द्वारा रचित स्थापत्य कला की कोई बराबरी नहीं कर सकता।
यह पर्व समाज के उस वर्ग को समर्पित है जो अपने हाथों और कौशल से नई वस्तुओं का निर्माण करता है। इस दिन देश भर के सभी औद्योगिक क्षेत्रों, कारखानों, कार्यशालाओं और निर्माण स्थलों पर एक अलग ही उत्सव का माहौल होता है। जो लोग भी किसी न किसी रूप में उपकरणों, औजारों या यंत्रों से जुड़े हैं, वे इस दिन को अपने सबसे बड़े त्योहार के रूप में मनाते हैं। अभियंता, मिस्त्री, बढ़ई, लौहकार, स्वर्णकार, मूर्तिकार और राजमिस्त्री सहित सभी कामगार इस दिन अत्यंत श्रद्धा भाव से भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते हैं। इस दिन प्रातः काल उठकर स्नान करने के पश्चात सभी लोग अपने कार्यस्थलों की साफ सफाई करते हैं। अपने दैनिक उपयोग में आने वाले सभी छोटे बड़े औजारों को धोकर और पोंछकर उन पर चंदन का तिलक लगाया जाता है और फूल मालाएं चढ़ाई जाती हैं। कार्यशालाओं को बहुत ही सुंदर ढंग से सजाया जाता है और भगवान की प्रतिमा स्थापित करके पूरे विधि विधान से उनका पूजन किया जाता है।

इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस दिन पारंपरिक रूप से कोई भी कारीगर या कामगार अपने औजारों का उपयोग नहीं करता है। पूरे वर्ष जिन उपकरणों की मदद से वे अपनी आजीविका चलाते हैं, विश्वकर्मा जयंती के दिन उन सभी उपकरणों को विश्राम दिया जाता है। यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि हम जिन वस्तुओं से अपना जीवन यापन करते हैं, उनके प्रति हमारे मन में सम्मान और कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। औजारों की पूजा करने के पीछे यह गहरी दार्शनिक सोच है कि हमारे उपकरण जड़ या निर्जीव नहीं हैं, बल्कि वे ईश्वरीय शक्ति का ही एक रूप हैं जो हमारी मेहनत को सफल बनाते हैं। पूजा के समय भगवान से प्रार्थना की जाती है कि उनके कार्यस्थल पर हमेशा बरकत रहे, यंत्र सुचारू रूप से चलते रहें और काम करते समय किसी भी प्रकार की दुर्घटना या संकट का सामना न करना पड़े। पूजा के पश्चात सभी कामगारों और सेवकों के बीच प्रसाद का वितरण किया जाता है जो आपसी भाईचारे और समानता की भावना को बढ़ाता है।
आज के आधुनिक और यांत्रिक युग में विश्वकर्मा जयंती का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। आज दुनिया पूरी तरह से तकनीकी प्रगति पर निर्भर है। बड़े बड़े कल कारखाने, गगनचुंबी इमारतें, तेज रफ्तार रेलगाड़ियां, अंतरिक्ष में जाने वाले यान और हमारे हाथों में मौजूद संचार के छोटे उपकरण, यह सब उसी शिल्प और विज्ञान का परिणाम हैं जिसके आदि देव भगवान विश्वकर्मा हैं। यह दिन हमें याद दिलाता है कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति में उसके कामगारों और शिल्पकारों का सबसे बड़ा योगदान होता है। जब तक कोई व्यक्ति अपने हाथों से श्रम करके किसी वस्तु का निर्माण नहीं करता, तब तक कोई भी विकास संभव नहीं है। इसलिए यह त्योहार श्रम की गरिमा को पहचानने और उसे सम्मान देने का एक बहुत बड़ा अवसर है। हमारे समाज में अक्सर शारीरिक श्रम करने वालों को वह सम्मान नहीं मिल पाता जिसके वे अधिकारी हैं, लेकिन विश्वकर्मा पूजा हमें यह संदेश देती है कि हाथ से काम करने वाला प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर का ही काम कर रहा है और उसका कौशल वंदनीय है। श्रम को ईश्वर की साधना के रूप में देखना भारतीय संस्कृति की एक बहुत ही अनूठी और महान देन है।
इस प्रकार विश्वकर्मा जयंती केवल एक दिन का उत्सव नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन दर्शन का एक अभिन्न अंग है। यह हमें सृजन की शक्ति का सम्मान करना सिखाता है। जब एक मूर्तिकार पत्थर को तराश कर मूर्ति बनाता है, जब एक लौहकार लोहे को तपाकर उसे उपयोगी आकार देता है, या जब एक वास्तुकार किसी भवन का नक्शा बनाता है, तो उन सभी के भीतर भगवान विश्वकर्मा का ही अंश काम कर रहा होता है। यह दिन हमारी उस प्राचीन वैज्ञानिक और तकनीकी विरासत का भी स्मरण कराता है जो सदियों पहले हमारे ऋषियों और शिल्पियों ने विकसित की थी। आज की युवा पीढ़ी को इस पर्व के वास्तविक अर्थ को समझने की अत्यंत आवश्यकता है। अंत में हम यही कह सकते हैं कि जिस प्रकार भगवान विश्वकर्मा ने अपनी कला से सृष्टि को संवारा, उसी प्रकार हमें भी अपने कर्म और कौशल से इस संसार को और अधिक सुंदर तथा उपयोगी बनाने का निरंतर प्रयास करना चाहिए। सच्ची विश्वकर्मा पूजा यही होगी कि हम अपने काम के प्रति पूरी तरह से ईमानदार रहें और अपने हुनर का उपयोग समाज की भलाई और मानवता के विकास के लिए करें।
– महेन्द्र तिवारी

