भगवान विश्वकर्मा को सनातन परम्परा में ब्रह्मांड के प्रथम शिल्पकार, वास्तुकार और अभियंता के रूप में पूजा जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने ही देवताओं के दिव्य अस्त्रों, भव्य नगरियों (जैसे द्वारका, लंका और इन्द्रप्रस्थ) और स्वर्ग लोक का निर्माण किया।
विश्वकर्मा विमना आद्विहाया धाता विधाता परमोत संदृक्।
तेषामिष्टानि समिषा मदन्ति यत्रा सप्तऋषीन्पर एकमाहुः॥
इसमें उन्हें सम्पूर्ण ब्रह्मांड का मूल रचयिता माना गया है। प्रत्येक वर्ष कन्या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा पूजा मनाई जाती है। इस दिन कारीगर, शिल्पकार और निर्माण कार्य से जुड़े लोग अपने औजारों, मशीनों, वाहनों और तकनीकों की पूजा करते हैं, ताकि उनका कार्य सुचारू रूप से चले और उसमें उन्नति हो।
आज के युग में विश्वकर्मा पूजा केवल पारम्परिक औजारों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि इसका अर्थ और व्यापक हो गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, कलन विधि और रोबोट विज्ञान मनुष्य के रचनात्मक मस्तिष्क की देन हैं। आज के सॉफ्टवेयर निर्माता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता विकासक और डेटा वैज्ञानिक भी आधुनिक ‘विश्वकर्मा’ की भूमिका निभा रहे हैं, जो कोड और आंकड़ों के माध्यम से नई आभासी दुनिया का निर्माण कर रहे हैं।
प्राचीन काल में हथौड़ा, छैनी या पहिया मनुष्य के औजार थे। आज संगणक, सर्वर, क्लाउड, कृत्रिम बुद्धिमत्ता मॉडल और कोड हमारे प्रमुख औजार हैं। इसलिए विश्वकर्मा पूजा का आधुनिक अर्थ इन उपकरणों के साथ इससे जुड़े लोगों के प्रति सम्मान और तकनीक के उपयोग को लोककल्याण से जोड़ने का संकल्प भी है। विश्वकर्मा पूजा कौशल और निरंतर सीखने का भी उत्सव है। जब काम करने के तरीके तेजी से बदल रहे हैं, तब स्वयं को उन्नत करना और नई तकनीकों को सीखना ही इस परम्परा की आधुनिक अभिव्यक्ति है।

रामायण और महाभारत काल में भी विश्वकर्मा का सम्बंध दिव्य स्थापत्य और निर्माण से जोड़ा गया है। लंका, पुष्पक विमान तथा इंद्रप्रस्थ जैसे निर्माण उनके अप्रतिम शिल्प और अभियांत्रिकी की प्रतीकात्मक स्मृति हैं।
इनके अलावा अनेक दिव्यास्त्रों और नगरों के निर्माता भगवान विश्वकर्मा को केवल देवताओं का शिल्पी नहीं, बल्कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड का प्रथम अभियंता माना गया है। सनातन परम्परा केवल ज्ञान और दर्शन की बात नहीं करती, बल्कि यह सृजन, स्थापत्य और विज्ञान का व्यावहारिक संगम है।
आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एल्गोरिदम, चैटबॉट्स और ऑटोमेशन के दौर में यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि तकनीक मानव कौशल और श्रम को प्रतिस्थापित कर सकती है। ऐसे समय में विश्वकर्मा पूजा का महत्व और बढ़ जाता है। इसका संदेश स्पष्ट है-औजार बदल सकते हैं, लेकिन सृजन का उद्देश्य और उसकी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बदलनी चाहिए।
बदलती तकनीकी दुनिया में कौशल का अवमूल्यन नहीं, बल्कि उसका उन्नयन आवश्यक है। साधारण कार्यों के स्वचालित होने के साथ मनुष्य को उच्चतर कौशल, रचनात्मकता, नेतृत्व और प्रणाली-निर्माण की ओर बढ़ना होगा।

विश्वकर्मा पूजा का आधुनिक संदेश यह नहीं है कि मशीन और मनुष्य एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी हैं। बल्कि यह है कि मनुष्य अपने ज्ञान, कौशल और विवेक से तकनीक को दिशा दे। इसीलिए विश्वकर्मा पूजा हमें तकनीक के अंध-आकर्षण नहीं, बल्कि उत्तरदायी दृष्टि देती है। नई तकनीक की सफलता केवल उसकी गति या क्षमता से नहीं, बल्कि इस बात से तय होनी चाहिए कि वह समाज में क्या महत्त्व जोड़ती है। यदि तकनीक श्रम को सुलभ करती है, जीवन को बेहतर बनाती है, तो वह विश्वकर्मा के सृजनात्मक आदर्श के निकट है। भगवान विश्वकर्मा केवल अतीत के पौराणिक शिल्पी नहीं हैं, बल्कि वे हर युग के नवाचार और निर्माण के प्रतीक हैं।
विश्वकर्मा पूजा हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो भगवान विश्वकर्मा की उपासना के लिए मनाया जाता है। भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का मुख्य शिल्पी और वास्तुकार माना जाता है। उन्होंने स्वर्ग के भवन, इंद्र का रथ, सुदर्शन चक्र और त्रिशूल जैसे दिव्य अस्त्र बनाए थे। यह पर्व विशेष रूप से कारीगरों, मिस्त्रियों, इंजीनियरों, ड्राइवरों और तकनीकी क्षेत्रों से जुड़े लोगों द्वारा बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
यह पूजा कन्या संक्रांति के दिन होती है। इस दिन लोग अपने औजारों, मशीनों, कंप्यूटर और वाहनों को साफ करके फूल-माला से सजाते हैं तथा उनकी पूजा करते हैं। सुबह स्नान कर भगवान विश्वकर्मा की मूर्ति स्थापित की जाती है, धूप-दीप जलाए जाते हैं और आरती की जाती है। कई कारखानों और कार्यालयों में सामूहिक पूजा का आयोजन होता है तथा काम बंद रखा जाता है।
यह पर्व श्रम और कौशल के सम्मान का प्रतीक है। यह हमें याद दिलाता है कि समाज की प्रगति में कारीगरों का कितना बड़ा योगदान है।
अपर्णा झा
