यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब के शरूराह स्थित सैन्य अड्डे पर किया गया हालिया हमला केवल एक सामान्य सैन्य घटना नहीं है, बल्कि यह मध्य पूर्व की संपूर्ण भू-राजनीतिक स्थिति और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े खतरे का स्पष्ट संकेत है। इस घातक हमले ने यह पूरी तरह से साबित कर दिया है कि ईरान और सऊदी अरब के बीच चल रहा छद्म युद्ध अब एक नए और अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश कर चुका है। लंबे समय से इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने के जो प्रयास किए जा रहे थे, वे अब विफल होते नजर आ रहे हैं। इस घटनाक्रम का रणनीतिक और कूटनीतिक विश्लेषण करने पर कई ऐसी बातें सामने आती हैं जो भविष्य की वैश्विक सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए अत्यंत चिंताजनक हैं।

इस छद्म युद्ध की जड़ें इतिहास में काफी गहरी हैं। मध्य पूर्व में सऊदी अरब और ईरान के बीच वर्चस्व की लड़ाई दशकों पुरानी है, जो मुख्य रूप से वैचारिक, धार्मिक और भू-राजनीतिक मतभेदों पर आधारित है। दोनों ही देश खुद को अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र का नेतृत्वकर्ता मानते हैं। जब वर्ष 2014 में हूती विद्रोहियों ने यमन की राजधानी साना पर कब्जा किया और वहां की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को बेदखल कर दिया, तब सऊदी अरब ने इसे अपनी सीमा पर ईरान के सीधे हस्तक्षेप के रूप में देखा। इसी खतरे को भांपते हुए वर्ष 2015 में सऊदी अरब ने एक सैन्य गठबंधन बनाकर यमन में सैन्य हस्तक्षेप किया था। उनका मुख्य उद्देश्य हूतियों को खदेड़ना और पुरानी सरकार को फिर से स्थापित करना था। हालांकि, यह सैन्य अभियान जितना आसान सोचा गया था, उतना साबित नहीं हुआ। हूतियों ने बाहरी सैन्य प्रशिक्षण और उन्नत हथियारों के बल पर सऊदी गठबंधन को कड़ी टक्कर दी, जिसके परिणामस्वरूप यह युद्ध एक अंतहीन दलदल में तब्दील हो गया।
वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से यमन में एक युद्धविराम लागू हुआ था, जिससे इस क्षेत्र में कुछ वर्षों तक सापेक्षिक शांति बनी रही थी। पूरी दुनिया को यह उम्मीद थी कि इस युद्धविराम के माध्यम से यमन के लंबे समय से चले आ रहे गृहयुद्ध का कोई स्थायी राजनीतिक समाधान निकल सकेगा। लेकिन हालिया घटनाओं, विशेषकर शरूराह सैन्य अड्डे पर उन्नत प्रक्षेपास्त्रों और चालक रहित विमानों से हुए भीषण हमले ने उन सभी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। इसके जवाब में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने भी हूती नियंत्रित इलाकों पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए हैं। इन जवाबी कार्रवाइयों से यह स्पष्ट हो गया है कि दोनों पक्षों के बीच अब किसी भी प्रकार की शांति वार्ता की संभावनाएं लगभग समाप्त हो गई हैं और क्षेत्र एक बार फिर से विनाशकारी युद्ध की ओर बढ़ रहा है।
इस संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका भौगोलिक और सामरिक विस्तार है। यह हमला ऐसे समय में हुआ है जब हूतियों ने यमन के लाल सागर तट और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण मोखा बंदरगाह पर अपना कब्जा मजबूत कर लिया है। मोखा बंदरगाह पर नियंत्रण का सीधा अर्थ है बाब अल मन्देब जलडमरूमध्य पर हूतियों की पकड़ मजबूत होना। यह जलमार्ग वैश्विक व्यापार के सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में से एक है। दुनिया का लगभग 12 प्रतिशत तेल और प्राकृतिक गैस का व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है। एशिया को यूरोप और उत्तरी अमेरिका से जोड़ने वाले इस अहम समुद्री मार्ग पर विद्रोही गुट का नियंत्रण अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिए एक खुली चुनौती है। विद्रोहियों ने सऊदी अरब के बंदरगाहों के खिलाफ अपनी खुद की समुद्री नाकेबंदी की घोषणा कर दी है, जिससे मालवाहक जहाजों की सुरक्षित आवाजाही पर गंभीर संकट पैदा हो गया है।
इस भौगोलिक लाभ के कारण ऊर्जा संकट का खतरा भी कई गुना बढ़ गया है। वर्तमान समय में दुनिया पहले से ही कई मोर्चों पर ऊर्जा आपूर्ति की समस्या से जूझ रही है। शक्तिशाली देशों के बीच बढ़ते तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से होने वाली तेल आपूर्ति पहले ही बाधित चल रही है, जहां से दुनिया का लगभग 20 से 25 प्रतिशत कच्चा तेल गुजरता है। अब बाब अल मन्देब के भी हूतियों के निशाने पर आ जाने से सऊदी अरब का तेल निर्यात बहुत बड़े खतरे में फंस गया है। सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से तेल निर्यात पर ही निर्भर है। यदि विद्रोहियों ने इसी तरह सऊदी अरब के तेल संयंत्रों और बुनियादी ढांचों को निरंतर निशाना बनाना जारी रखा, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आना तय है। इसका सीधा असर भारत जैसे विकासशील देशों सहित पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा और महंगाई बेकाबू हो सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम में दुनिया की बड़ी महाशक्तियों का रुख भी काफी निराशाजनक और चिंताजनक रहा है। ऐतिहासिक रूप से कुछ पश्चिमी देश सऊदी अरब के बड़े रणनीतिक भागीदार रहे हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उन्होंने सीधे तौर पर सैन्य हस्तक्षेप करने से किनारा कर लिया है। यह कूटनीतिक खामोशी सऊदी अरब को इस मोर्चे पर अकेला छोड़ रही है। महाशक्तियों की यह नीति क्षेत्र के अन्य देशों के लिए भी एक स्पष्ट संकेत है कि उन्हें अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं उठानी होगी।
दूसरी ओर, ईरान का रवैया इस संघर्ष को और भड़काने वाला है। शरूराह अड्डे पर हमले और लाल सागर के तटों पर हूतियों की सैन्य बढ़त के बाद, ईरान के भीतर जिस तरह से जश्न मनाया गया, वह यह साबित करता है कि हूती केवल एक स्वतंत्र विद्रोही गुट नहीं हैं। यह संघर्ष पूरी तरह से क्षेत्रीय वर्चस्व की लड़ाई है, जिसमें यमन की जमीन और वहां के निर्दोष नागरिकों का इस्तेमाल मोहरे के रूप में किया जा रहा है।
विरोधी देश अपनी कूटनीतिक और सैन्य चालों के तहत हूतियों को एक हथियार के रूप में उपयोग करके सऊदी अरब और अन्य देशों पर दबाव बना रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य मध्य पूर्व में सऊदी अरब के प्रभाव को कम करना और अपना वर्चस्व स्थापित करना है। इस छद्म युद्ध में अत्याधुनिक हथियारों और खुफिया जानकारी का आदान प्रदान खुलेआम हो रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय नियमों का सीधा उल्लंघन है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की निष्क्रियता के कारण ऐसे विद्रोही गुटों का मनोबल बढ़ रहा है, जो भविष्य में किसी भी देश की संप्रभुता के लिए अत्यंत घातक है।
इस भू-राजनीतिक खींचतान के बीच सबसे बड़ी त्रासदी यमन के आम नागरिकों की है। यमन पिछले एक दशक से दुनिया के सबसे भयानक मानवीय संकट का सामना कर रहा है। युद्ध के कारण वहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह तबाह हो चुकी है, लाखों लोग भुखमरी के कगार पर हैं और स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं। शांति समझौते के टूटने का सबसे बड़ा खामियाजा इन्हीं निर्दोष नागरिकों को भुगतना पड़ेगा। युद्ध के फिर से भड़कने से अंतरराष्ट्रीय राहत सामग्री का पहुंचना भी मुश्किल हो जाएगा, जिससे मानवीय त्रासदी और अधिक गहरी हो जाएगी। मानवाधिकार संगठनों की तमाम अपीलों के बावजूद, युद्धरत पक्ष मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रखकर केवल अपने सामरिक लाभ के लिए लड़ रहे हैं।
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि सऊदी अरब पर हूतियों का यह घातक हमला मध्य पूर्व की अस्थिरता का एक नया अध्याय है। जब तक हूतियों की बढ़ती सैन्य क्षमता पर लगाम नहीं लगाई जाती और इस संघर्ष को पीछे से संचालित कर रही ताकतों के साथ कोई ठोस कूटनीतिक समाधान नहीं खोजा जाता, तब तक इस क्षेत्र में स्थायी शांति की उम्मीद करना बेमानी है। यमन का यह युद्ध अब केवल दो देशों की सीमा का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और वैश्विक मानवाधिकारों के लिए एक नासूर बन चुका है। वैश्विक समुदाय और प्रमुख महाशक्तियों को अब मूक दर्शक की भूमिका छोड़कर इस संकट के समाधान के लिए त्वरित और कठोर कदम उठाने होंगे, अन्यथा इसके दूरगामी परिणाम पूरी दुनिया के लिए अत्यंत विनाशकारी साबित होंगे।
– महेन्द्र तिवारी
