मानवीय मनःस्थिति को घेरने वाली व्याधियां आज आम हो गई हैं। बढ़ती आपा-धापी और प्रतिस्पर्धा ने मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं बढ़ा दी हैं। अल्जाइमर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष 21 सितम्बर को विश्व अल्जाइमर दिवस मनाया जाता है।
मानवीय मनःस्थिति को घेरती व्याधियां अब आम हो चली हैं। बढ़ती आपा-धापी और विस्तार पाती प्रतियोगी सोच ने मन-मस्तिष्क से जुड़ी परेशानियां भी बढ़ा दी हैं। इस मोर्चे पर समय रहते सजग होना आवश्यक है। अल्जाइमर व्याधि को लेकर जन-जागरूकता लाने के लिए ही प्रतिवर्ष पूरे सितम्बर महीने को अल्जाइमर माह के रूप में मनाया जाता है। 21 सितम्बर को मनोभ्रंश की बीमारी के निदान और संवेदनशीलता के साथ इसके लक्षणों को समझने हेतु विशेष रूप से सजगता लाने का दिन है। यह दिन दुनियाभर में विश्व अल्जाइमर दिवस के रूप में मनाया जाता है।
समय रहते सजग हों
चिंतनीय है कि अल्जाइमर की व्याधि के समझने में अधिकांशत: देर हो जाती है। वर्ष 2026 के लिए विश्व अल्जाइमर दिवस की थीम भी ‘जितनी जल्दी आपको पता चलेगा, उतना ही आप संभलने के प्रयास कर पाएंगे – मनोभ्रंश का निदान महत्वपूर्ण है’ रखी गई है। समझना आवश्यक है कि बदलती मनःस्थिति को समझने के लिए अल्जाइमर के शिकार व्यक्ति को नहीं उसके स्वजनों-परिजनों को भी लक्षणों पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि धुंधलाती याददाश्त एक बड़ी जनसंख्या के लिए समस्या बन गई है। दिमाग की क्षमता का लगातार कम होते जाना अकेलेपन से लेकर अवसाद तक, कितनी ही स्वास्थ्य समस्याओं के बढ़ते जाने के डरावने हालात बना रहा है। इतना ही नहीं भूलने की आदत असुरक्षा का भी एक बड़ा कारण बन जाती है।
दुर्घटनाओं को न्योता देने वाली साबित होती है। चिंतनीय है कि मनोभ्रंश की बीमारी से जूझने वालों के आंकड़े तेजी से बढ़ रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा अनुमान के अनुसार दुनिया भर में 3.5 करोड़ से भी ज्यादा लोग मनोभ्रंश से पीड़ित हैं। दुनिया की बढ़ती जनसंख्या के कारण साल 2050 तक यह संख्या तिगुनी से भी अधिक बढ़कर 11.5 करोड़ तक पहुंच जाएगी। शोधकर्ताओं का कहना है कि वैश्विक स्तर पर हर 4 सेकंड में डिमेंशिया का एक नया मामला सामने आता है।

हमारे देश में अल्जाइमर के शिकार लोगों की संख्या 60 लाख से ज्यादा है। विदित हो कि डिमेंशिया से जुड़ी सबसे आम परेशानी अल्जाइमर रोग है। अल्जाइमर का यह रोग व्यक्ति की भाषा और निर्णय लेने की क्षमता पर गहरा दुष्प्रभाव डालता है। इसके चलते बार-बार किसी सवाल या समझाइश को दोहराना, समय, तारीखों या जानी-पहचानी जगहों को लेकर भी भ्रमित होने की उलझी सी मनोदशा को सजग होना आवश्यक है। इसीलिए याददाश्त कम होने, सोचने की क्षमता घटने, व्यवहार में असहजता आने और रोजमर्रा की बातें तक भूल जाने जैसे सभी लक्षणों पर अवश्य ध्यान दें।
कारणों को समझें – घर का रास्ता भूल जाने की बात हो या सरल से हिसाब-किताब का तरीका याद न आना। हर बार कुछ भूल जाना हंसकर टाल देने जैसी बात नहीं होती। धीरे-धीरे स्मृति को कम करने वाली यह व्याधि साधारण कार्यों को करने की क्षमता भी खत्म कर देती है। इसीलिए सहज से बदलावों को भी नोटिस करना आवश्यक है। आधुनिकता के नाम पर अपने मन-मस्तिष्क पर निर्भरता कम करने वाली जीवनशैली को लेकर सोचना आवश्यक है। विचारणीय है कि बढ़ती तकनीकी सुविधाओं ने भी लोगों की स्मरण शक्ति को कम किया है। विशेषकर स्मार्ट गैजेट्स ने विजुअल माध्यम भूमिका बढ़ा दी है।
हर मुठ्ठी में मौजूद जानकारियों की स्क्रीन ने मस्तिष्क की सजगता घटा दी है। बदली जीवनशैली के इस दौर में दिमाग पर जोर डालकर सोचने और कुछ याद रखने की आवश्यकता कम हुई है। सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, अल्जाइमर्स आमतौर पर 60 साल की आयु के बाद व्यक्ति को अपना शिकार बनाता है पर कुंद होती याद्दाश्त अब केवल जीवन के आखिरी पड़ाव पर पहुंचे बुजुर्गों की परेशानी भर नहीं रही कम आयु के लोग भी अल्जाइमर रोग की चपेट में आ रहे हैं। विदित हो कि जमीनी जीवनशैली वाले हमारे देश में भी कमजोर होती याददाश्त के मरीज तेजी से बढ़ रहे हैं। चिंतनीय है कि यह केवल बातों-हालातों को भूल जाने भर की मनःस्थिति भर नहीं है। विस्मृति की इस बीमारी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी मृत्यु तक के मामले में 7वां प्रमुख कारण माना है ।
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बचाव के उपाय – अल्जाइमर की व्याधि से बचाव के लिए सबसे पहले तो जीवनशैली में बदलाव लाना आवश्यक है। प्रत्येक समय तकनीक पर निर्भर रहने की बजाय कुछ बातों, सूचनाओं, तारीखों या आयोजनों को याद रखने का प्रयास कीजिए। अल्जाइमर की चेतावनियों और संकेतों को गम्भीरता से लीजिए। धुंधलाती स्मृतियों की समस्या का सामना करने के लिए मन और मस्तिष्क को सजग-सक्रिय रखने की राह चुनें। साथ ही कुछ नया सीखने और प्राकृतिक परिवेश से जुड़ने के साथ ही शारीरिक रूप से सक्रिय रहना भी इस व्याधि के जाल से दूर रखता है। इतना ही नहीं एकाकी होते मानवीय जीवन में परिवेश से जुड़ाव के मार्ग खोजना भी आवश्यक हो चला है समग्र रूप से शारीरिक, सामाजिक और मानसिक गतिविधियों से दूरी स्मृति कम होने के जोखिम को और बढ़ाती है।
परेशानी यह है कि इस समस्या को लेकर आज भी सजगता की कमी है। ऐसे में गलत धारणाओं को दूर करने और बीमारी के बारे में उचित समझ को बढ़ावा देने के प्रयास भी आवश्यक हैं। इस साल का विषय ‘द अरलियर यू नो, द मोर यू कैन डू- ए डिमेन्शिया डाइग्नोसिस मैटर्स’ भी यही संदेश लिए है। यह विषय समय पर प्रारम्भिक चेतावनियों और संकेतों के समझने के साथ ही सही चिकित्सा जांच की सजगता लाने से भी जुड़ा है। कई बार आयु बढ़ने के साथ याददाश्त कमजोर होने को एक सामान्य प्रक्रिया मान लिया जाता है। जबकि इस स्थिति में चिकित्सकीय जांच करवानी चाहिए। लोगों में जागरुकता लाने के पुख्ता प्रयास और जीवनशैली जनित कारणों को समझकर जीवन से जुड़ी बातों को ही भुला देने वाली इस बीमारी से बचने की राह निकालना बेहद आवश्यक है।
डॉ. मोनिका शर्मा
