जलवायु संकट अब केवल वैज्ञानिकों की शोध रिपोर्टों या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का विषय नहीं रह गया है। यह आज करोड़ों लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुका है। एशिया में अचानक आने वाली विनाशकारी बाढ़, यूरोप में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और जंगलों की आग, अफ्रीका में सूखा तथा अनेक देशों में अनिश्चित वर्षा का क्रम यह स्पष्ट करता है कि पृथ्वी का जलवायु तंत्र तेजी से बदल रहा है। वर्ष 2026 में विश्व मौसम विज्ञान संगठन तथा विभिन्न जलवायु निगरानी संस्थाओं ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तापमान औद्योगिक युग से पहले की तुलना में लगभग 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा के बेहद निकट पहुँच गया है। यह केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के सामने खड़ी सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौती का संकेत है।
पिछले कुछ वर्षों में चरम मौसमीय घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ी हैं। पहले जहाँ किसी क्षेत्र में एक दशक में एक बार भीषण बाढ़ आती थी, वहीं अब ऐसी घटनाएँ कुछ ही वर्षों के अंतराल पर दिखाई दे रही हैं। इसी प्रकार लंबे समय तक चलने वाली लू, असामान्य ठंड, समुद्री तूफान और जंगल की आग अब अलग-अलग घटनाएँ नहीं रह गईं, बल्कि बदलते जलवायु तंत्र की परस्पर जुड़ी हुई कड़ियाँ बन गई हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राकृतिक जलवायु चक्र हमेशा से मौजूद रहे हैं, किंतु जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई और औद्योगिक उत्सर्जन ने पृथ्वी के तापमान को इतना बढ़ा दिया है कि प्राकृतिक घटनाएँ पहले की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी रूप ले रही हैं।
एशिया इस संकट का सबसे संवेदनशील क्षेत्र बनता जा रहा है। यहाँ विश्व की लगभग 60 प्रतिशत आबादी निवास करती है और बड़ी संख्या में लोग नदियों, समुद्री तटों तथा पर्वतीय क्षेत्रों पर निर्भर हैं। दक्षिण एशिया में मानसून का स्वरूप लगातार बदल रहा है। कहीं अत्यधिक वर्षा से नदियाँ उफान पर हैं तो कहीं वर्षा की कमी से खेत सूख रहे हैं। जापान, चीन, भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के अनेक हिस्सों में भारी वर्षा, भूस्खलन और बाढ़ ने लाखों लोगों को प्रभावित किया है। पहाड़ी क्षेत्रों में तीव्र वर्षा के कारण मिट्टी की पकड़ कमजोर हो जाती है और पूरे गाँव खतरे की चपेट में आ जाते हैं। यह स्थिति केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि अनियोजित निर्माण, वनों की कटाई और असंतुलित भूमि उपयोग से भी जुड़ी हुई है।
यूरोप की तस्वीर बिल्कुल भिन्न दिखाई देती है, किंतु संकट उतना ही गंभीर है। फ्रांस, स्पेन और भूमध्यसागरीय क्षेत्रों ने वर्ष 2026 में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का अनुभव किया। फ्रांस में जुलाई का औसत तापमान 126 वर्षों के इतिहास में सबसे अधिक दर्ज किया गया। कई क्षेत्रों में वर्षा सामान्य से बहुत कम रही, जिससे नदियों का जलस्तर घटा और जंगल सूखने लगे। सूखी वनस्पति तथा तेज हवाओं ने जंगल की आग को भयंकर रूप दे दिया। हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र नष्ट हुए और अनेक समुदायों को सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा। यह संकेत है कि विकसित देश भी जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से सुरक्षित नहीं हैं।
जलवायु संकट की जड़ में बढ़ता वैश्विक तापमान है। वैज्ञानिक आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2026 का जुलाई महीना इतिहास के दूसरे सबसे गर्म जुलाई महीनों में शामिल रहा। महासागरों की सतह का तापमान भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। समुद्र का गर्म होना केवल समुद्री जीवों की समस्या नहीं है। यही गर्म महासागर अधिक जलवाष्प उत्पन्न करते हैं, जिसके कारण कहीं मूसलाधार वर्षा और कहीं अधिक शक्तिशाली चक्रवात बनने की संभावना बढ़ जाती है। इस प्रकार समुद्र और वातावरण एक दूसरे को प्रभावित करते हुए चरम मौसम की घटनाओं को और तीव्र बना देते हैं।

इस वर्ष एक और महत्वपूर्ण कारक अल नीनो रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन के अनुसार प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा मजबूत अल नीनो अगस्त से अक्टूबर तक विश्व के मौसम को प्रभावित कर सकता है। इसके कारण अनेक क्षेत्रों में सामान्य से अधिक गर्मी तथा वर्षा के पैटर्न में बड़े परिवर्तन की आशंका व्यक्त की गई है। भारत सहित कुछ क्षेत्रों में कम वर्षा की संभावना है, जबकि पूर्वी अफ्रीका और दक्षिणी यूरोप के कुछ भागों में अधिक वर्षा हो सकती है। यह स्पष्ट करता है कि जलवायु संकट केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक वायुमंडलीय और समुद्री प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ विषय है।
जलवायु परिवर्तन का सबसे गहरा प्रभाव कृषि पर पड़ रहा है। किसान सदियों से मौसम के निश्चित चक्र पर निर्भर रहे हैं, किंतु अब बोआई और कटाई का समय अनिश्चित होता जा रहा है। अत्यधिक वर्षा से फसलें जलमग्न हो जाती हैं, जबकि लंबे सूखे से उत्पादन घट जाता है। चावल, गेहूँ, मक्का और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगा है। इसके साथ ही कीटों और रोगों का प्रसार भी बदलते तापमान के कारण नए क्षेत्रों तक पहुँच रहा है। परिणामस्वरूप खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था दोनों पर दबाव बढ़ रहा है।
जल संकट भी इस चुनौती का महत्वपूर्ण पक्ष है। हिमालयी हिमनदों का पिघलना प्रारंभिक वर्षों में नदियों में जल बढ़ा सकता है, किंतु दीर्घकाल में यही स्थिति जल उपलब्धता को कम कर सकती है। दूसरी ओर अत्यधिक वर्षा का अधिकांश पानी तेजी से बह जाता है क्योंकि शहरों में प्राकृतिक जल निकासी तंत्र नष्ट हो चुके हैं। महानगरों में कुछ घंटों की वर्षा ही जलभराव और यातायात ठप होने का कारण बन जाती है। इसका समाधान केवल बड़े बाँध नहीं, बल्कि वर्षा जल संचयन, आर्द्रभूमियों का संरक्षण और प्राकृतिक जल मार्गों की पुनर्स्थापना में निहित है।
स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी जलवायु संकट गंभीर खतरा बन चुका है। लगातार बढ़ती गर्मी से हीट स्ट्रोक, हृदय रोग और श्वसन संबंधी बीमारियाँ बढ़ रही हैं। जंगल की आग से निकलने वाला धुआँ हजारों किलोमीटर दूर तक वायु गुणवत्ता को प्रभावित करता है। बाढ़ के बाद दूषित जल के कारण जलजनित रोग फैलने का खतरा बढ़ जाता है। बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएँ और बाहर काम करने वाले श्रमिक सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। इसलिए जलवायु परिवर्तन अब पर्यावरण के साथ साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी विषय बन चुका है।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो चरम मौसम विकास की गति को धीमा कर सकता है। सड़कें, पुल, रेल मार्ग, बिजली तंत्र और संचार व्यवस्था बार बार प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित होते हैं। बीमा कंपनियों पर दावों का बोझ बढ़ता है और सरकारों को राहत तथा पुनर्वास पर भारी खर्च करना पड़ता है। पर्यटन, मत्स्य पालन और वानिकी जैसे क्षेत्र भी प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होते हैं। विकासशील देशों के लिए यह दोहरी चुनौती है क्योंकि उन्हें एक ओर आर्थिक विकास बनाए रखना है और दूसरी ओर जलवायु अनुकूल आधारभूत ढाँचे में निवेश भी करना है।
इस संकट से निपटने के लिए केवल वैश्विक घोषणाएँ पर्याप्त नहीं हैं। सबसे पहले कार्बन उत्सर्जन में वास्तविक कमी लानी होगी। सौर, पवन और जल आधारित स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार, सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा, ऊर्जा दक्ष भवन, वनों का संरक्षण और टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ दीर्घकालिक समाधान का आधार बन सकती हैं। साथ ही प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को गाँव गाँव तक पहुँचाना अत्यंत आवश्यक है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन का मानना है कि समय पर चेतावनी मिलने से आपदाओं से होने वाली जनहानि में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
भारत जैसे देशों के लिए जलवायु न्याय भी महत्वपूर्ण प्रश्न है। ऐतिहासिक रूप से विकसित देशों का उत्सर्जन अधिक रहा है, जबकि विकासशील देश जलवायु प्रभावों का बड़ा बोझ उठा रहे हैं। इसलिए जलवायु वित्त, हरित प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग अत्यंत आवश्यक हैं। यदि वैश्विक समुदाय साझा जिम्मेदारी के सिद्धांत पर आगे बढ़े, तभी पेरिस समझौते के लक्ष्यों को व्यवहार में बदला जा सकेगा और संवेदनशील देशों को अनुकूलन के लिए पर्याप्त संसाधन मिल पाएँगे।
आज बाढ़, सूखा, लू और जंगल की आग हमें एक ही संदेश देते हैं कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ने की कीमत पूरी मानवता चुका रही है। जलवायु संकट किसी एक देश, महाद्वीप या पीढ़ी की समस्या नहीं है। यह हमारे विकास मॉडल, ऊर्जा उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति दृष्टिकोण की सामूहिक परीक्षा है। यदि समय रहते वैज्ञानिक नीति, जनभागीदारी और पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी जीवन शैली अपनाई जाए तो इस संकट के प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। अन्यथा आने वाले वर्षों में चरम मौसम अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य वास्तविकता बन जाएगा।
– महेन्द्र तिवारी

