आतंक के चेहरे खत्म हो रहे हैं, फिर भी कश्मीर घाटी तब तक पूरी तरह इस्लामिक आतंकवाद से मुक्त नहीं मानी जा सकती, जब तक विस्थापित कश्मीरी हिंदू अपने घरों में भयमुक्त होकर लौटकर फिर से अपना जीवन शुरू नहीं करते। लश्कर-ए-तैयबा का कमांडर मोहम्मद आसिफ उर्फ हाशिम मूसा सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारा गया है। जिस आतंकी नेटवर्क को वर्षों से सुरक्षा एजेंसियां तलाश रही थीं, उसके महत्वपूर्ण चेहरों का क्रमशः सफाया हो रहा है। मूसा के अंत की खबर भले ही हिंसा पीड़ित हिन्दुओं को कुछ सुकून देती है, किंतु कश्मीर की दासतान यहां समाप्त नहीं होती।

वस्तुत: कश्मीर का दर्द हर देशभक्त भारतीय को तब तक दर्द देगा, जब तक कि वहां 1990 के दशक में आतंक के कारण अपने घरों से विस्थापित हुए कश्मीरी हिंदू अपने पुश्तैनी घरों में वापस नहीं लौट जाते हैं! भले ही आज केंद्र की मोदी सरकार इस दिशा में अनेक प्रयास कर रही है, फिर भी हमें यह सच तो स्वीकारना ही होगा कि अभी वहां वह स्थिति नहीं पैदा हो सकी है कि वे अपने बच्चों को उसी भूमि पर सुरक्षित भविष्य दे सकेंगे, जहां उनके पूर्वजों ने सदियों तक ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा को जीवित रखा!
आतंकियों का सफाया, यह भी एक सच है
2024 से सितंबर 2026 तक सुरक्षा बलों ने इस्लामिक चरमपंथ एवं आतंकवाद के विरुद्ध लगातार अभियान चलाए हैं। गृह मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में जम्मू-कश्मीर में 67 आतंकवादी मारे गए। वर्ष 2025 में यह संख्या 46 रही। वर्ष 2026 में सितंबर तक विभिन्न अभियानों में आतंकियों के मारे जाने का सिलसिला जारी है। निश्चित ही मूसा समेत कई प्रमुख आतंकी कमांडरों का खात्मा सुरक्षा तंत्र की लगातार कार्रवाई का परिणाम है।
वस्तुत: मूसा का अंत इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसके नेटवर्क का संबंध जम्मू-कश्मीर में हुए कई बड़े आतंकी हमलों से जुड़ा हुआ था, जिसकी पुष्टि स्वयं गृहमंत्रालय ने भी की थी। हलान, डीकेजी, कंडी, शाहसितार, शिवखोरी, गगनगीर, बूटापथरी और पहलगाम जैसी घटनाओं से जुड़े नेटवर्क पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई लगातार आगे बढ़ी है। यह तस्वीर बताती है कि आतंकवाद का संगठित ढांचा भारी दबाव में है। घुसपैठ पर निगरानी बढ़ी है। स्थानीय स्तर पर आतंकी भर्ती की क्षमता कमजोर हुई है। हथियारों की बरामदगी और आतंकियों के विरुद्ध लगातार अभियान सुरक्षा व्यवस्था की सक्रियता को सामने रखते हैं।
फिर भी कश्मीर की जमीन पर एक दूसरा सच मौजूद है। भय की आखिरी दीवार अभी बाकी है। बड़े आतंकी नेटवर्क के कमजोर पड़ने के बाद भी आतंकवाद हो रहा है, वे बड़े हमलों के स्थान पर छोटे और सॉफ्ट टार्गेट चुन रहे हैं। अल्पसंख्यक नागरिक, प्रवासी श्रमिक, पर्यटक, सुरक्षा कर्मचारी और सामान्य नागरिक आतंकियों के निशाने पर आते हैं।

2024 का रियासी तीर्थयात्री बस हमला, गांदरबल के गगनगीर में श्रमिकों पर हमला और अप्रैल 2025 का पहलगाम नरसंहार इस खतरे की गंभीरता दिखाते हैं। पहलगाम में 26 लोगों की हत्या ने देश को झकझोरा ही था और 2026 में कुलगाम क्षेत्र में गैर-स्थानीय श्रमिकों पर गोलीबारी जैसी घटनाओं ने भी यह संदेश दिया कि आतंकी हिंसा की क्षमता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
टार्गेट किलिंग का मकसद व्यक्ति की हत्या से आगे जाता है। एक व्यक्ति पर चली गोली सैकड़ों परिवारों के भीतर भय पैदा करती है। किसी कश्मीरी हिंदू कर्मचारी पर हमला घाटी में रह रहे दूसरे परिवारों के मन में सवाल पैदा करता है। किसी प्रवासी मजदूर की हत्या रोजी-रोटी के लिए आए दूसरे श्रमिकों को असुरक्षित महसूस करा सकती है। किसी पर्यटक की हत्या पर्यटन आधारित अर्थव्यवस्था को मनोवैज्ञानिक झटका देता है। मगर यह भी सच है कि आतंकवाद इसी मनोवैज्ञानिक प्रभाव पर फलता है।
आतंक की जड़ बंदूक से गहरी है
कश्मीर की समस्या को समझने के लिए आतंकवाद की वैचारिक पृष्ठभूमि पर भी गंभीर चर्चा जरूरी है। सीमा पार बैठे आतंकी संचालक, पाकिस्तान आधारित संगठन, ऑनलाइन प्रचार तंत्र, आतंकी वित्तपोषण और डिजिटल कट्टरपंथ इस पूरे ढांचे के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इंटरनेट और एन्क्रिप्टेड संचार माध्यमों के जरिए युवाओं तक पहुंचने की कोशिशें सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौती बनी हुई हैं, इसलिए आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध का अगला चरण विचार और मनोविज्ञान के स्तर पर भी लड़ा जाना है।

इसके लिए कश्मीर की बहुलतावादी परंपरा को मजबूत करना जरूरी है। इतिहास की व्यापक समझ विकसित करने के कार्य मे एक बड़ा कार्य यह करना है कि ललितादित्य, कल्हण, अभिनवगुप्त और कश्मीर की प्राचीन ज्ञान परंपरा से नई पीढ़ी का परिचय कराना है। इसे साथ ही शिक्षा, रोजगार और सामाजिक संवाद को कट्टरपंथ के विरुद्ध मजबूत दीवार बनाना होगा।दूसरी ओर आज भले ही सरकारी योजनाओं के माध्यम से रोजगार और ट्रांजिट आवास की व्यवस्था हुई है। गृह मंत्रालय के फरवरी 2026 के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जम्मू में 47,466 कश्मीरी प्रवासी परिवार पंजीकृत थे। घाटी में प्रधानमंत्री पैकेज के तहत स्वीकृत 6,000 पदों में 2,896 नियुक्तियां दी जा चुकी थीं और 6,000 स्वीकृत ट्रांजिट आवासों में 4,112 का निर्माण पूरा हो चुका था। भले ही यह पुनर्वास की दिशा में महत्वपूर्ण आधार है, फिर भी पुनर्वास का अर्थ किसी सुरक्षित परिसर में नौकरी और आवास उपलब्ध करा देना भर नहीं हो सकता। वापसी का वास्तविक अर्थ घर की चौखट तक पहुंचना है।
उस घर तक, जहां परिवार की पीढ़ियां रहती हैं, अपने लोग हैं, स्वजन हैं। जहां पूर्वजों की स्मृतियां आज भी जीवित हैं। यदि कोई परिवार घाटी में लौटता है और उसे चारदीवारी से घिरे सुरक्षित परिसर में सीमित जीवन बिताना पड़ता है, तो इसे पूर्ण सामाजिक पुनर्वास कहना कठिन होगा। वास्तव में वापसी ऐसी होनी चाहिए जिसमें परिवार स्थानीय समाज का सक्रिय हिस्सा बने। बच्चे आसपास के विद्यालयों में पढ़ें। लोग व्यापार करें। खेतों और बागों में काम हो। मंदिरों में पूजा हो। बाजारों में सामान्य आवागमन हो। पड़ोसी रिश्ते फिर बनें। यही वास्तविक पुनर्वास है।
इसके साथ संपत्ति की बहाली, मंदिरों और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा, रोजगार, व्यापार, शिक्षा और स्थानीय सामाजिक स्वीकार्यता को समान महत्व देना होगा। कश्मीरी हिंदुओं की वापसी को सरकारी आंकड़े से आगे ले जाकर सामाजिक पुनर्निर्माण का अभियान बनाए, जिसकी कि आज यहां सबसे अधिक जरूरत महसूस की जा रही है।
बेशक! मूसा का मारा जाना सुरक्षा बलों की सफलता है। ऐसे हर आतंकी के अंत से आतंकवादी नेटवर्क पर दबाव बढ़ता है। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई से घाटी में हिंसा का दायरा घटा है। यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, फिर भी कश्मीर की अंतिम सफलता किसी एक आतंकी कमांडर की मौत से तय नहीं हो सकती है।
वास्तव में तो यह सफलता उस दिन दिखाई देगी, जब विस्थापित कश्मीरी हिंदू परिवार अपनी जन्मभूमि में लौटेंगे और किसी परिवार को सुरक्षा के भय से अपनी जन्मभूमि छोड़ने का विचार मन में लाने की जरूरत नहीं होगी। जब किसी नागरिक की पहचान उसके धर्म के कारण उसकी सुरक्षा का प्रश्न नहीं बनेगी और आतंक की जगह सामान्य जीवन कश्मीर की पहचान बनेगा, वास्तव में तभी असली मायनों में माना जा सकेगा कि कश्मीर अब इस्लामिक आतंकवाद से मुक्त हो गया है।
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी

