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जंतर-मंतर से दूर होते प्रतिरोध के ठिकाने

जंतर-मंतर से दूर होते प्रतिरोध के ठिकाने

by हिंदी विवेक
in विशेष, सामाजिक
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लोकतंत्र की जीवंतता केवल इस बात से तय नहीं होती कि संसद के भीतर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच कितनी सार्थक बहस होती है, बल्कि इसकी असली कसौटी यह है कि संसद के बाहर सड़कों पर आम नागरिक की आवाज को कितनी गंभीरता और सहजता से सुना जाता है। देश की राजधानी नई दिल्ली के हृदय स्थल में स्थित जंतर मंतर पिछले 33 वर्षों से इसी लोकतांत्रिक चेतना, जन आक्रोश और नागरिक उम्मीदों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। किंतु अब केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक उच्चस्तरीय समिति की सिफारिशों के आधार पर दिल्ली पुलिस ने एक ऐतिहासिक बदलाव करते हुए जंतर मंतर को अधिकृत प्रदर्शन स्थलों की सूची से बाहर कर दिया है।

28 अप्रैल 2022 के पुराने स्थायी आदेश में संशोधन करते हुए अब राजधानी में धरना और प्रदर्शन के लिए तीन नए स्थान निर्धारित किए गए हैं, जिनमें मध्य दिल्ली का रामलीला मैदान, उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के कड़कड़डूमा स्थित व्यावसायिक केंद्र मैदान शामिल हैं। प्रशासन के इस एक निर्णय ने तीन दशकों से चली आ रही प्रतिरोध की एक पूरी परंपरा को विराम दे दिया है और साथ ही लोकतांत्रिक अधिकारों तथा प्रशासनिक व्यवस्था के बीच के द्वंद्व पर एक नई बहस छेड़ दी है।

Jantar Mantar in Lutyens' Delhi de-notified as protest site; 3 new venues  named | India News

जंतर मंतर का यह परिसर केवल 18वीं सदी के खगोलीय यंत्रों का स्मारक मात्र नहीं था, बल्कि यह आधुनिक भारत के सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन चुका था। वर्ष 1993 से लेकर 2026 तक के अपने 33 वर्षों के सफर में इस छोटे से मार्ग ने अनगिनत ऐतिहासिक बदलावों की नींव रखी। चाहे वर्ष 2011 का भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल आंदोलन हो, वर्ष 2012 में निर्भया कांड के बाद उमड़ा युवाओं का स्वतःस्फूर्त जनसैलाब हो, वर्ष 2015 में पूर्व सैनिकों का वन रैंक वन पेंशन आंदोलन हो या फिर वर्ष 2023 में महिला पहलवानों का लंबा संघर्ष, जंतर मंतर ने हर वर्ग की पीड़ा को राष्ट्रीय पटल पर रखने का मंच प्रदान किया।

देश के सुदूर कोनों से आने वाले किसानों, मजदूरों, छात्रों, शिक्षकों और वंचित वर्गों के लिए यह स्थान एक ऐसी उम्मीद की तरह था, जहाँ खड़े होकर वे सीधे सत्ता के शीर्ष से संवाद करने का अहसास पाते थे। संसद भवन से मात्र 1 से 1.5 किलोमीटर की दूरी पर होने के कारण यहाँ उठने वाली हर आवाज की गूंज नीति निर्माताओं के कानों तक आसानी से पहुँच जाती थी।

इस ऐतिहासिक स्थल से प्रदर्शनों को हटाने के पीछे प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के अपने ठोस तर्क हैं। तात्कालिक कारणों पर नजर डालें तो वर्ष 2026 के जून और जुलाई माह में प्रतियोगी परीक्षाओं की शुचिता और शिक्षा सुधारों की मांग को लेकर लगभग 36 दिनों तक चला विशाल छात्र आंदोलन इस फैसले का मुख्य आधार बना। उस आंदोलन के दौरान जंतर मंतर की सीमित क्षमता के विपरीत 1 लाख से अधिक प्रदर्शनकारी जुट गए थे। जब इस भारी भीड़ ने संसद भवन की ओर कूच करने का प्रयास किया, तो सुरक्षा व्यवस्था चरमरा गई और पुलिस तथा छात्रों के बीच हुई झड़पों में 118 पुलिसकर्मियों सहित दर्जनों छात्र घायल हुए।

इसके अतिरिक्त, हाल ही में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन के मुद्दे पर राजनीतिक दलों और युवा संगठनों द्वारा फिर से जंतर मंतर पर बड़े घेराव की तैयारी की जा रही थी। नए संसद भवन और कर्तव्य पथ के आसपास अति विशिष्ट व्यक्तियों के निरंतर आवागमन और संवेदनशील मंत्रालयों की सुरक्षा को देखते हुए पुलिस का मानना है कि इतनी कम दूरी पर अनियंत्रित भीड़ का जुटना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा जोखिम है।

सुरक्षा के अलावा स्थानीय व्यापारियों और आम नागरिकों की दैनिक परेशानियां भी इस बदलाव का एक बड़ा कारण बनी हैं। जंतर मंतर राजधानी के सबसे बड़े व्यावसायिक केंद्र कनॉट प्लेस और जनपथ के ठीक बगल में स्थित है। जब भी यहाँ कोई बड़ा प्रदर्शन होता था, तो एहतियात के तौर पर आसपास की मुख्य सड़कें और रेल के भूमिगत स्टेशन बंद कर दिए जाते थे। इससे न केवल घंटों लंबा यातायात जाम लगता था, बल्कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे की ओर जाने वाले हजारों यात्रियों की गाड़ियां छूट जाती थीं।

स्थानीय व्यापार मंडलों ने लंबे समय से यह शिकायत की थी कि लगातार होने वाले धरनों और नाकेबंदी के कारण कनॉट प्लेस के व्यापार को करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी पूर्व में यह सुझाव दिया था कि प्रदर्शनों के लिए ऐसी खुली और बड़ी जगह तलाशी जानी चाहिए जहाँ आम जनजीवन प्रभावित न हो तथा प्रदर्शनकारियों के लिए पेयजल, शौचालय और चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएं आसानी से उपलब्ध कराई जा सकें।

किंतु इस प्रशासनिक सुविधा के दूसरे पहलू पर नजर डालें तो नागरिक अधिकार संगठनों और संविधानविदों की चिंताएं अत्यंत गंभीर और विचारणीय हैं। राजधानी में सत्ता के केंद्र से जन आंदोलनों को दूर धकेलने की यह प्रवृत्ति नई नहीं है, बल्कि पिछले चार दशकों में विरोध का पता तीन बार बदला जा चुका है।

वर्ष 1988 तक इंडिया गेट के पास स्थित बोट क्लब देश के सबसे बड़े प्रदर्शनों का केंद्र हुआ करता था, जहाँ से संसद और राष्ट्रपति भवन सीधे दिखाई देते थे। अक्टूबर 1988 में चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में जब 5 लाख किसानों ने एक सप्ताह तक बोट क्लब पर डेरा डाला, तो सरकार ने सुरक्षा और व्यवस्था का हवाला देकर वहां प्रदर्शनों पर स्थायी रोक लगा दी और वर्ष 1993 में जंतर मंतर को नया विकल्प बनाया गया।

वर्ष 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने पर्यावरण और ध्वनि प्रदूषण के नियमों का हवाला देकर जंतर मंतर पर भी आंशिक पाबंदियां लगाईं, और अब वर्ष 2026 में इसे पूरी तरह से सूची से हटा दिया गया है।

बोट क्लब से जंतर मंतर और अब जंतर मंतर से बुराड़ी तथा कड़कड़डूमा के मैदानों तक का यह सफर वास्तव में सत्ता के गलियारों से आम जनता की भौतिक और मनोवैज्ञानिक दूरी बढ़ने की कहानी है। लोकतंत्र में किसी भी शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का मूल उद्देश्य सरकार का ध्यान आकर्षित करना और राष्ट्रीय समाचार माध्यमों के जरिए अपनी बात देश के सामने रखना होता है।

जंतर मंतर की भौगोलिक स्थिति उसे यह विशेष महत्व देती थी कि वहां बैठा सौ लोगों का एक छोटा समूह भी राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन जाता था। इसके विपरीत, उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी मैदान या पूर्वी दिल्ली का कड़कड़डूमा क्षेत्र मुख्य प्रशासनिक केंद्र से 15 से 20 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। बाहरी इलाकों में प्रदर्शनों को स्थानांतरित करने से प्रशासन को भीड़ प्रबंधन में तो आसानी होगी, लेकिन इससे जन आंदोलनों की दृश्यता और प्रभावशीलता कम होने का पूरा अंदेशा है। जब विरोध की आवाज सत्ता के केंद्र से बहुत दूर किसी कोने में सिमट जाती है, तो उसकी अनदेखी करना तंत्र के लिए बहुत आसान हो जाता है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क) और 19(1)(ख) देश के प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण और निशस्त्र सम्मेलन करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी वर्ष 2018 के मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ मामले में स्पष्ट रूप से कहा था कि कानून व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर नागरिकों के विरोध करने के अधिकार को पूरी तरह से निष्प्रभावी या अर्थहीन नहीं बनाया जा सकता। शासन का यह दायित्व है कि वह सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच एक स्वस्थ संतुलन कायम करे।

यदि सुरक्षा चुनौतियों और शहरी यातायात के दबाव के कारण जंतर मंतर से प्रदर्शनों को हटाना अपरिहार्य ही था, तो सरकार और प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि रामलीला मैदान, बुराड़ी और कड़कड़डूमा के नए स्थलों पर आने वाले नागरिकों की आवाज अनसुनी न रहे। लोकतंत्र की गरिमा इसी में है कि प्रदर्शन का मैदान भले ही बदल जाए, लेकिन जनता की पीड़ा को सुनने की सत्ता की संवेदनशीलता कभी कम न हो।

– महेन्द्र तिवारी

 

 

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Tags: Article 19Burari GroundDelhi Police Ministry of Home AffairsFreedom of SpeechIndian DemocracyJantar Mantar DelhiKarkardoomaProtestsRamlila Maidan

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