राष्ट्र संत रविदास जी की प्रत्येक वाणी-दोहा सामाजिक समरसता का मंत्र है। इसलिए समाज में समरसता स्थापित करने हेतु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने उनका 650वां वर्ष जन्मजयंती मनाने का निर्णय लिया है। इस निमित्त पूरे देश भर में सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।
विक्रम की 14वीं-15वीं सदी में रचा गया साहित्य, हिंदी ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में भक्ति के स्वर से आपूरित है। एक बार लगा कि जैसे कविगण अपने आराध्य के सिवा और किसी से कुछ कहना ही नहीं चाहते थे। यह वह विषम समय था, जब हिंदू समाज बाह्य आक्रमणों के कारण राजनीतिक दृष्टि से एक ओर अस्थिर हो रहा था, जिसका प्रतिकूल प्रभाव सामाजिक व्यवस्थाओं पर पड़ रहा था। अराजकता की स्थिति में जब प्राचीन काल से चले आ रहे सामाजिक नियम तोड़े-मरोड़े जाने लगे थे; जाति, क्षेत्र, भाषा, कुल आदि के आधार पर समाज में विभाजन की खाई चौड़ी होने लगी थी, तब इस दशा को देखकर संत-भक्त कवियों का हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने अपनी तपस्या और ईश्वर उपासना से दो शताब्दियों तक भक्ति की ऐसी मंदाकिनी बहाई कि इसमें स्नान कर हिंदू समाज के सारे कलुष धुल गए।
जैसा कि हम जानते हैं कि जेहादी इस्लाम के उदय और उसकी वर्चस्ववादी मानसिकता से भारतवर्ष भी बहुत काल तक नहीं बच सका था। मंदिरों का ध्वंस और देवमूर्तियों के तोड़ने का क्रम एक बार बन गया तो यह फिर 200 वर्षों तक चलता रहा। इस आक्रमण से समाज बचाव की मुद्रा में आ गया। सामाजिक नवाचार की प्रक्रिया कुछ मंद हो गई। लोग गतानुगति के फेर में फंस गए। ऐसे समय में दक्षिण से आए संतों ने उत्तर भारत में ईश्वर भक्ति का ऐसा ताना-बाना बुना कि समाज में विश्वास का वातावरण बन गया। सबको लगने लगा कि कोई नहीं तो भगवान का सहारा तो है ही। इन संतों में रामानंद का नाम बहुत प्रसिद्ध है। उनके कुल 12 शिष्य माने जाते हैं, रविदास या रैदास उन्हीं में से एक हैं।
संत रविदास का जीवनकाल 1384 ई. से 1514 ई. के आसपास माना जाता है। कबीर की तरह इनका जन्म भी काशी में हुआ था और जीविकोपार्जन के लिए ये मोची का कार्य करते थे। इनकी भक्ति-साधना का ही प्रभाव था कि इनकी ख्याति मेवाड़ तक पहुंच गई थी और भक्तशिरोमणी मीरा इन्हें अपना गुरु मानती थीं। भक्ति साहित्य के मूल में सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने की एक स्थाई प्रवृत्ति देखी जाती है, रविदास के यहां भी यह प्रवृत्ति अपने पूर्ण स्वरुप में उपस्थित है। रविदास ने स्वीकार किया है कि इनके गुरु रामानंद ने समाज की तिरस्कृत निम्न जाति के जीवन से इन्हें ऊंचा उठाया- ‘नीच ते ऊंच किओ मेरे सतगुरु’ यह पद लिखकर उन्होंने अपने गुरु के प्रति सम्मान प्रकट किया है।

यह वर्ष महान संत रविदास के जन्मजयंती का 650वां वर्ष है। इतना दीर्घ काल व्यतीत हो जाने के बाद भी यदि इस संत के विचार महत्वपूर्ण बने हुए हैं तो इसके मूल में समरसता के उदात्त मूल्य ही हो सकते हैं क्योंकि इन विचारों और मूल्यों की आवश्यकता समाज को आज भी बनी हुई है। संत रविदास जैसे भक्तों की महत्ता इस बात में है कि वे वीतरागी होने के साथ-साथ इसी समाज के सक्रिय घटक भी थे, इसलिए उसकी हर समस्या पर स्वतंत्र विचार भी रखते थे। उन्होंने समाज में व्याप्त इस भ्रम का निराकरण किया कि जाति का आधार व्यवसाय है। तत्कालीन समाज में व्यवसाय के आधार पर लोहार, सुनार, चमार आदि जातियों की चर्चा होती थी। इसी आधार पर ऊंच-नीच की भावना का विस्तार भी हो रहा था। संत रविदास के विचारों की महत्ता इस बात में हैं कि उन्होंने मनुष्य जाति की बात की और किसी भी व्यवसाय के छोटा-बड़ा मानने की प्रवृत्ति का खंडन किया। उनका मानना था कि किसी छोटे व्यवसाय को करने से कोई छोटा नहीं होता, यदि व्यक्ति में धर्म की पहचान है तो वह महान मनुष्य बन सकता है, यथा-
मेरी जाति कमीनी, पांति कमीनी, ओछा जनमु हमारा
मेरी जाति कुटबांढला ढोर ढोवंता नितहि बानारसी आसपास।
अब बिप्र परधान तिहि करहि डंडउति,
तेरे नाम सरणाई रविदास दासा॥
कहने का आशय है कि व्यवसाय का छोटा-बड़ा होना आत्मिक शुद्धि और ईश्वर भक्ति के मार्ग की बाधाएं नहीं हो सकती क्योंकि व्यवसाय की भूमिका जीवन निर्वाह के निमित्तमात्र ही है, जबकि आत्मिक पुष्टि के लिए ईश्वर भक्ति परम आवश्यक है और इसी से मनुष्य अपना और अपने कुल का उद्धार कर सकता है-
ब्रहमन वैस सूद अरु खत्री, डोम चमार मलेछ मन सोई।
होइ पुनीत भगवंत भजन ते, आपु तारि तारे कुल दोई।
संत रविदास ने वैदिक धर्म की श्रेष्ठता का प्रतिपादन किया, जिसमें कर्म के महत्व का प्रतिपादन किया गया है, उन्होंने बहुत स्पष्ट कहा है-
जन्म जाति को छंडिकरी, करनी जात परधान।
इह्यौ बेद को धरम है, करे रविदास बखान॥
यही कारण है कि संत रविदास ने मानव-मात्र को एक जाति माना है क्योंकि श्रेणियां तो व्यवसाय के कारण बनती चली जाती हैं। इसलिए इन श्रेणियों में जन्म लेने मात्र से कोई ऊंचा या नीचा नहीं माना जा सकता। वस्तुत: व्यक्ति अपने कर्मों के कारण ही निम्न या श्रेष्ठ हो सकता है क्योंकि कुकर्म की कीचड़ में सनकर कुलीन भी अंतत: मलीन हो ही जाते हैं-
रविदास जन्म कै कारनै, होत न कोउ नीच।
नर कूं नीच करि डारिहै, ओछे करम कौ कीच॥
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना काल से ही हिंदू समाज को संगठित करने के संकल्प भाव से आगे बढा है। इसलिए संत रविदास की 650वीं जन्मजयंती को महान अवसर मानते हुए इसने सामाजिक समरसता को जनजागरण का विषय बनाने का निश्चय किया। आज के दिन हिंदू समाज को संगठित करने के साथ-साथ समरसता का भाव जागृत करना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसलिए संत रविदास के साहित्य का मनन-चिंतन होते रहना भी समीचीन प्रतीत होता है।
संघ अब अपनी यात्रा के 100 वर्ष पूर्ण कर रहा है। एक शताब्दी की इस यात्रा में संघ ने हिंदू समाज की अहर्निश सेवा की है। समाज को संगठित करना हो, उसमें भातृभाव भरना हो, राष्ट्र की रक्षा के लिए तत्पर रहने की भावना का विकास करना हो, संघ ने इसको पूर्ण समर्पण के साथ इन सब कार्यों को वहन किया है। आज के दिन संत रविदास के समरसता के विचार को समाज में व्यापक रूप से प्रतिष्ठित करने के लिए भी स्वयंसेवक पूरी तन्मयता से लगे हुए हैं तो उसके मूल में इन संतों और विचारकों की सत्प्रेरणा ही कार्य कर रही है।
भारत विश्व मानचित्र में एक समर्थ राष्ट्र के रूप में अंकित हो जाए, यह ध्येय तभी पूर्ण हो सकता है, जब इस देश से विषमता नामक रोग नष्ट हो जाए। मानव को उसके जन्म के कारण नहीं बल्कि उसके कर्म की शुचिता के आधार पर जाना जाए, तभी वस्तुत: इस राष्ट्र ही नहीं इस पृथ्वी पर स्थाई शांति का वास हो सकेगा। जिस दिन भी यह स्थिति बन सकेगी, संत रविदास जैसे महापुरुष के विचार उसमें अवश्य परिलक्षित होंगे।
डॉ. अजीत कुमार पुरी ‘अन्वेषक’

