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उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित जौहड़ी गांव में उम्मीद की एक किरण ने करीब डेढ़ दशक पूर्व अंगडाई ली। अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज एवं पेशे से डॉक्टर रहे राजपाल सिंह ने जनसाधारण का खेल बना दिया। आधुनिक सुविधाओं के अभाव में उन्होंने युवाओें के हाथ में लाठी, गन्ने, ईंट का टुकड़ा, पानी से भरा जग, खेत मेंे काम आने वाले उपकरण आदि पकड़ा कर ग्रामीण प्रतिभाओं को तराशा। ये युवा अब देश-विदेश में अपना परचम रियो ओलम्पिक में भारतीय एयर राइफल निशानेबाज अभिनव बिन्द्रा चौथे स्थान पर सिमट गए। १० मीटर पुरुष एयर पिस्टल में जीतू राय आठवें स्थान पर थे। अपूर्वी चन्देला और अयोनिका पॉल की जोड़ी १० मीटर महिला एयर पिस्टल में क्वालीफाइ भी नहीं कर सकी। वर्ल्ड कप में सिल्वर तथा राष्ट्रमंडल खेलों में गोल्ड जीतने वाली अपूर्वी चंदेला ४११.६ स्कोर के साथ ३४वें स्थान और अयोनिका ४०७ स्कोर के साथ ४३वें स्थान पर रही। २५ मीटर एयर पिस्टल में हिना सिद्द्ू ३८० स्कोर के साथ १४वें स्थान पर खिसक गई।
इन सभी खिलाड़ियों से देश को बहुत उम्मीदें थीं; क्योंकि इन्हें ओलम्पिक में भेजने के लिए बहुत पैसा खर्च किया गया था। इसके विपरीत देश में ऐसे उभरते निशानेबाज भी हैं जो बिना संसाधनों के अपने दम पर ओलम्पिक में भाग लेने वाले इन खिलाड़ियों से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित जौहड़ी गांव में ८ से १४ साल के निशानेबाज बिना पिस्टल के ही ईंट, गन्ने, लाठी, पानी से भरे जग तथा डमी पिस्टल आदि से अभ्यास करके इतिहास रच रहे हैंं। किन्तु इनका दुर्भाग्य यह है कि न तो भारतीय खेल प्राधिकरण और न ही कोई मंत्री, नेता अथवा अफसर इनकी मदद के लिए आगे आने को तैयार है।
खेलों के प्रोत्साहन हेतु सरकार प्रति वर्ष लगभग ६०० करोड़ से अधिक रुपये खर्च करती है। अत्याधुनिक आधारभूत सुविधाएं प्रदान करने के साथ-साथ खिलाड़ियों को प्रशिक्षण हेतु विदेश भी भेजा जाता है। लेकिन इस तड़क-भड़क एवं भारी भरकम बजट से कुछेक शहरी खिलाड़ियों को ही सुविधाएं मिल पाती हैं। ग्रामीण प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने का विचार फाइलों और नेताओं के भाषणों मेंे ही सिमट कर रह जाता है। किन्तु महानगरीय चकाचौंध से अलग राजधानी दिल्ली से मात्र ७० किमी दूर दिल्ली-सहारनपुर राष्ट्रीय राजमार्ग पर उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में स्थित जौहड़ी गांव में उम्मीद की एक किरण ने करीब डेढ़ दशक पूर्व अंगडाई ली। आधारभूत सुविधाआंें के अभाव में ग्रामीण युवक-युवतियों ने एक छप्पर के नीचे बनी अस्थायी रेंज में अभ्यास करना शुरू किया। उधार की पिस्तौलों से शुरू हुए उस अभ्यास की बदौलत आज इस गांव में निशानेबाजी का जुनून इस कदर सवार है कि बालक एवं युवा ही नहीं, बल्कि ८० साल की महिलाएं भी निशानेबाजी में दुनियाभर में देश का नाम रोशन कर रही हैं। अकेले इस रेंज से ४१ अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज तैयार हुए हैं। राष्ट्रीय स्तर के निशानेबाजों की संख्या ३०० से अधिक है। यही नहीं, निशानेबाजी की बदौलत यहां के ३०० से अधिक युवक-युवतियां एयर इंडिया, भारतीय रेल, ओएनजीसी, सेना एवं पुलिस आदि विभिन्न सुरक्षा बलों में उच्च पदों पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा देश के एक दर्जन से अधिक विश्वविद्यालयों में अधिकृत कोच इसी गांव के निशानबेाज हैं। खेल को रोजगार से जोड़ने का एक अत्यंत सफल प्रयोग जौहड़ी में हुआ है।
कभी अमीरों का खेल माने जाने वाले निशानेबाजी को अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज एवं पेशे से डॉक्टर रहे राजपाल सिंह ने जनसाधारण का खेल बना दिया। उन्होंने साबित कर दिया कि नाममात्र की सुविधाआंें से भी श्रष्ेठ परिणाम दिए जा सकते हैं। आधुनिक रेंज व महंगे उपकरणों के अभाव में उन्होंने व्यावहारिक कोचिंग से युवाओें के हाथ में लाठी, गन्ने, ईंट का टुकड़ा, पानी से भरा जग, खेत मेंे काम आने वाले उपकरण आदि पकड़ा कर ग्रामीण प्रतिभाओं को तराशा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक रज्जू भैया अपने भाषणों में ग्राम विकास के इस अद्भुत प्रयोग की अक्सर चर्चा किया करते थे।
इस कार्य को व्यवस्थित रूप प्रदान करने हेतु डॉ. राजपाल ने ‘जौहड़ी राइफल एसोसिएशन’ का १९९८ में गठन किया। छप्पर में चल रही अस्थायी शूटिंग रेंज से चमत्कारिक परिणाम मिलते देख भारतीय खेल प्राधिकरण ने इसे शूटिंग ट्रेनिंग सेंटर के रूप में मान्यता प्रदान की। यहीं से एक स्थायी रेंज के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। प्रयास प्रारंभ हुए तो धन का संकट सामने आया। उसी समय भामाशाह के रूप में तत्कालीन राज्यसभा सांसद श्री भारतेंदु प्रकाश सिंहल सामने आए और उन्होंने अपनी सांसद निधि से २५ लाख रुपये प्रदान किए। भूमि डॉ. राजपाल ने स्वयं अपने पास से दी। निर्माण कार्य के दौरान धन की कमी को पूरा करने के लिए डॉ. राजपाल ने अपने पुत्र विवेक सिंह (जो स्वयं अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज और अर्जुन अवार्ड से पुरस्कृत हैं) को पुरस्कारों में मिले पैसे, स्वयं को प्राप्त श्रीगुरुजी पुरस्कार, रीयल हीरोज़ अवार्ड सहित अन्य पुरस्कारों के रूप मेंे मिली समस्त राशि रेंज के निर्माण हेतु समर्पित कर दी। १३ जून, २०१५ को नवनिर्मित रेंज का उद्घाटन करते हुए उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री राम नाईक ने इस प्रयोग की बहुत प्रशंसा की।
वर्ष १९९८ से पहले डॉ. राजपाल सिंह सिर्फ वीआईपी हस्तियों को ही निशानेबाजी सिखाते थे। उनके शिष्यों में पूर्व प्रधान मंत्री राजीव गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, प्रियंका गांधी का बेटा रेहान राजीव वाड्रा, चौधरी अजीत सिंह के पुत्र जयंत चौधरी, राजस्थान की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह सहित कई दर्जन बड़ी हस्तियां शामिल हैं। लेकिन १९९८ में डॉ. राजपाल ने निश्चय किया कि वे सिर्फ गांव के बच्चों को ही शूटिंग सिखाएंगे। डॉ. राजपाल बताते हैं, ‘‘इस निश्चय के साथ मैंने सब से पहले अपने गांव जौहड़ी से यह प्रयोग शुरू किया। कुछ ही समय बाद गांव के निशानेबाज १०वें एशियाई खेलों के लिए चयनित हो गए। परिणामस्वरूप जिले से लेकर राज्य, राज्य से लेकर राष्ट्रीय और राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जौहड़ी के निशानेबाज सफलता का परचम लहराते चले गए। ’’
अच्छे परिणाम मिलने लगे तो निशानेबाजी सीखने वालों की संख्या बढ़ने लगी। परन्तु पिस्टल व राइफल का घोर अभाव बना रहा। उसी समय स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की स्थानीय शाखा ने एक एयर पिस्टल एसोसिएशन को प्रदान की। जौहड़ी राइफल एसोसिएशन के संरक्षक व मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त डॉ. सत्यपाल सिंह ने भी एक पिस्टल उपलब्ध कराई। मदद करने वालों की सूची में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का नाम भी है। डॉ. राजपाल याद करते हैं, ‘‘गांव में निशानेबाजी को उस समय बहुत बड़ा बल मिला जब ‘मिशन ओलम्पिक’ के तहत सेना के तत्कालीन वरिष्ठ अधिकारी ले. जन. अशोक वासुदेव ने जौहड़ी आकर छप्पर में चल रही अस्थायी शूटिंग रेंज से ही १६ वर्ष के ६ लड़कों एवं २ लड़कियोंे का हवलदार के पद पर सीधा चयन कर लिया। तब से लेकर अब तक जौहड़ी सेे प्रशिक्षण प्राप्त २०० से अधिक ग्रामीण बच्चे भारतीय सेना की ‘ब्वॉइज स्पोट्र्स कम्पनी’ के लिए चुने जा चुके हैं। इस कार्य में पूर्व रक्षा सचिव श्री शेखर दत्ता एवं उप थल सेना अध्यक्ष रहे ले. जनरल (सेवा.) श्री राज कादियान का भी सहयोग रहा। एयर इंडिया ने गांव के ७ बच्चों का चयन किया है। पंजाब के बादल गांव मेंे भारतीय खेल प्राधिकरण के सेंटर में इस गांव की १० लड़कियों का चयन हुआ है, जिनमें से ७ लड़कियां अंतरराष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज हैं। इनमें रूबी तोमर ने वर्ल्ड यूनीवर्सिटी २०११ में स्वर्ण पदक जीता। फलस्वरूप पंजाब सरकार ने रूबी की सब इंस्पेक्टर पद पर नियुक्ति कर दी।
उच्च शिक्षा प्राप्त करने में भी निशानेबाजी सहायक सिद्ध हुई। भारत के सर्वश्रष्ेठ महाविद्यालयों की सूची मेंं शामिल दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज, मिरांडा हाउस, हंसराज कॉलेज, श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स आदि में कम अंक प्राप्त करने के बावजूद अपनी खेल प्रतिभा के बल पर इस गांव के अनेक बच्चों ने दाखिला प्राप्त किया। गांव के ही एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा रवि जाटव सेंट स्टीफंस कॉलेज का छात्र एवं शूटिंग टीम का कैप्टन रहा। उसने अनेक अंतरराष्ट्रीय पदक भी जीते हैं। कई निशानेबाजों को विदेशों से भी छात्रवृत्ति मिली। दिल्ली विश्वविद्यालय की निशानेबाजी टीम जौहड़ी गांव के निशानेबाजों से ही बनी है। अंतर विश्व-विद्यालय निशानेबाजी प्रतियोगिता में निरंतर परचम फहराने वाले निशानेबाज जौहड़ी गांव से ही निकले हैं।
भारतीय सेना के अलावा वायुसेना, नेवी, सीमा सुरक्षा बल, दिल्ली पुलिस, उत्तर प्रदेश पुलिस, पंजाब पुलिस, सीआरपीएफ, ओएनजीसी, भारतीय रेल, एयर इंडिया आदि अनेक संस्थानों में जौहड़ी के निशानेबाजों ने अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराई है। विश्व चैम्पियनशिप, कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन चैम्पियनशिप, एशियाड, दक्षेस खेल, विश्वविद्यालय खेल, जूनियर ओलम्पिक आदि में जौहड़ी के निशानेबाज तिरंगा लहरा रहे हैं। इस गांव की ८ लड़कियां अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज हैं जो अपने आप में एक रिकार्ड है।
यही कारण है कि निशानेबाजी सीखने के लिए दिल्ली महानगर से अनेक युवा इस गांव में जाते हैं। सेना एवं सुरक्षा बलों में भर्ती के लिए लाखों युवा आवेदन करते हैं, लेकिन भारतीय सेना सहित बीएसएफ और दूसरे सुरक्षा बल भर्ती करने के लिए स्वयं इस गांव में चल कर जाते हैं। यदि सरकार, समाज अथवा कॉरपोरेट जगत इन उभरती हुई प्रतिभाओं को सहारा प्रदान करें तो यकीन मानिए ‘टोकियो २०२०’ में भारत को निराश नहीं होना पड़ेगा। गांव में असंख्य प्रतिभाएं हैं। एक बार मौका तो दीजिए, दुनिया आपके कदमों में होगी।

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