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***हेमंत महाजन****
चीन के विस्तारवाद को रोकना हो तो उसे अपने चंगुल में पकड़ना जरूरी है। उसके लिए सामर्थ्य निर्माण करने की जरूरत है। …सेना, सुरक्षा सामग्री की उपलब्धि और दांवपेचों को सफल बनाने के लिए सख्त राजनीतिक नेतृत्व हो तो चीन को सामरिक, आर्थिक धरातल पर परास्त करना भारत के लिए आसान साबित होगा। मोदी सरकार ने इस दिशा में पहल की है।
ड़ेढ सौ साल पहले स्वामी विवेकानंद ने चीन का असली रूप पहचान कर उससे सजग रहने की चेतावनी दी थी। सरदार वल्लभभाई पटेल ने भी सन १९५० में चीन की साम्राज्य बढ़ाने की मानसिकता को पहचाना था। पटेल ने कहा था कि तिब्बत में चीन का विघ्न उपस्थित करना, भारत में विघ्न उपस्थिन करने जैसा है। सरदार पटेल से भी पहले प्रखर राष्ट्रवादी योगी अरविंद घोष ने सजग रहने की चेतावनी दी थी। कहा था कि दक्षिण-पश्चिम एशिया और तिब्बत पर पूरी तरह वर्चस्व स्थापित कर उस भूभाग पर हमेशा केवय लिए काबू पाने का खतरा चीन से है।
चीन पर तिब्बत का हमला और पंडित नेहरू की तटस्थता की वृत्ति के संदर्भ में डॉ. आंबेडकर ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि अगर भारत तिब्बत को मान्यता देता, जैसी १९४९ में चीनी गणराज्य को प्रदान की थी, तो भारत-चीन विवाद न होकर तिब्बत-चीन सीमा-विवाद होता। १९६२ के युद्ध के पहले जब भारतीय सीमा में घुसकर चीन ने कुछ भूभाग हड़प लिया था, तब पंडित नेहरु के लिए वह चिंता का विषय नहीं था। जॉर्ज फर्नांडिस रक्षा मंत्री थे तब १९९८ में उन्होंने कहा था कि भारत को चीन से ज्यादा खतरा है। इस खतरे की तीव्रता आज कई गुना ब़ढ़ी प्रतीत होती है।
चीन की सामरिक विस्तार नीति
भारत के चारों ओर चीनी ड्रॅगन अपना शिकंजा कस रहा है। सेशेल्स के कारण हिंद महासागर में चीन घुसपैठ करेगा और भारत को मात देगा। ‘मालदीव’ में वह पनडुब्बियों का अड्डा स्थापित कर रहा है। चीन की ‘स्ट्रींग ऑफ पर्ल्स’ की नीति का यह एक हिस्सा है। पाकिस्तान के बलुचिस्तान में ग्वादर बंदरगाह, म्यांमार में कोको आयलैण्ड, श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह, बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह चीन ने अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए विकसित किए हैं। मानचित्र में देखने पर पता चलता है कि भारतीय द्विपकल्प के आसपास चीन ‘मोती की मात्रा’ पिरो रहा है।
चीन का सामरिक आक्रमण
चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत को चिढ़ाना या सताना शुरू किया। वैश्वीक अर्थनीति में भारत महासत्ता बनकर उभर रहा है, फिर भी उसके उपखंड में उसका राजनीतिक वर्चस्व कम हो रहा है। आजकल आर्थिक आक्रमण ज्यादा है। जमीन हड़पने से ज्यादा अहमियत आर्थिक क्षेत्र के एक-दूसरे के वर्चस्व को कम करने में है। दबाव डालना यही युद्ध नीति है। बड़ी तीव्रता के साथ चीन भारत पर आर्थिक और सामरिक धावा बोल रहा है।
बांग्ला देश, म्यांमार, थायलैण्ड, कंबोडिया जैसे विविध देशों के साथ भी चीन ने करार किए हैं। माओवादियों के दबाव में कैद नेपाल भी पहले उसके साथ था। भारत की सरहद के पास चीन सड़कें बनवा रहा है। क्वांघाय से ल्हासा तक रेल मार्ग, नेपाल और भारत-चीन सरहद के पास ‘नथूला-पास’ के डोंग तक बनेगा। एक तरफ भारत के साथ व्यापार और शांति की चर्चा और दूसरी तरफ विवादित सीमा पर फौजी हवाई-अड्डा स्थापित करना, दूर-दराज तक मार करनेवाले अस्त्र-शस्त्र लगाना, फौजी यातायात के लिए रेल को सीमा तक ले आना, भारत के आसपास नौ-सैनिक अड्डे स्थापित करना-चीन की यही रणनीति रही है।
पाकिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल, ईरान, श्रीलंका, उत्तर कोरिया, म्यांमार आदि राष्ट्रों में चीन ने अपने हाथ-पांव पसारे हैं।
चीन को प्रत्युत्तर की जरूरत
आनेवाले दिनों में भारत-चीन स्पर्धा बढ़ेगी। चीन ने वियतनाम पर दबाव डाला था। परिणाम यह हुआ कि वियतनाम ने अपने शत्रु अमेरिका से दोस्ती प्रस्थापित की। अब वियतनाम ने दक्षिण-चीन सागर में अमेरिकन अस्त्र-शस्त्र रखना स्वीकार कर लिया। चीन ने पीत सागर, पूर्व व दक्षिण चीन सागर को अपना क्षेत्र घोषित किया है। चीन की यह बात मानने को उस इलाके के छोटे-छोटे राष्ट्र तैयार नहीं हैं। इस सागर के स्पार्ट ले और अन्य द्वीपों पर और तेल-क्षेत्रों पर एकतरफा अधिकार जता रहा है, पर फिलीपीन्स, वियतनाम और अन्य एशियाई राष्ट्रों ने इसे अस्वीकार किया है।
चीन का सच्चा दोस्त कोई नहीं। म्यांमार, वियतनाम और ताइवान भी चीन की विस्तार नीति से चिंतित हैं। चीन ने पीत सागर, पूर्व व दक्षिण चीन-सागर अपना क्षेत्र माना है। मालदीव में चीन पनडुब्बियों का अड्डा बनाना चाहता है। चीन की स्ट्रींग ऑफ पर्ल्स नीति का वह हिस्सा है। इस नीति के अनुसार पाकिस्तान के बलुचिस्तान का ग्वादर बंदरगाह, म्यांमार में कोको आयलैण्ड, श्रीलंका में हंबनटोटा, बंदरगाह, बांग्लादेश में चटगांव बंदरगाह ये सब चीन ने अपने लिए विकसित किए हैं। चीन की सामरिक भूख भयानक है। रूस, मंगोलिया, मध्य एशिया, कोरिया, वियतनाम, भारत के आसपास के नज़दीकी इलाकों पर चीन ने अपना मालिकाना हक जताया है। दुनिया के सागरी मार्गों पर वह अपनी धाक जमाने में सब से आगे है। ये सारे देश चीन की जबरदस्त महत्वाकांक्षा से चिंतित हैं।
चीनी उपसागर के प्रति नीति क्या हो?
दक्षिण, दक्षिण-पूर्व, एशियाई और पूर्व एशियाई राष्ट्रों से परंपरागत मित्रता के संबंध दृढ़ करके भारत को स्पष्ट जबाब देना चाहिए। भारत के लिए पूर्व-एशिया, जापान, कोरिया के सैनिक बल और आर्थिक सामर्थ्य महत्वपूर्ण साबित होगा। चीन को दो टूक जवाब देने के लिए भारत को अपने सच्चे दोस्तों की फौज खड़ी करनी पड़ेगी। भारत वैश्वीक अर्थव्यवस्था में गौण स्थान न लें। हमारी अर्थव्यवस्था अच्छी है और सामरिक सामर्थ्य भी।
भारत की दक्षिण-चीन उपसागर के संबंध में क्या नीति हों?
अगर चीन अपने पड़ोस में आकर हमें सताने लगे तो हमें यह लड़ाई ‘साउथ चायना सी’ में ले जानी चाहिए।
चीन के विरोध में एकजूट हो
चीन की बढ़ती आक्रमक और विस्तारवादी प्रवृत्ति के विरूद्ध एशियाई राष्ट्र एकत्रित हुए हैं। इसमें जापान, दक्षिण कोरिया फिलिपीन्स, वियतनाम और आस्ट्रेलिया शामिल हैं। ये सारे राष्ट्र चीन के बढ़ते सैनिक सामर्थ्य, संरक्षण खर्च, हिंद-महासागर और दक्षिण-पूर्व चीन समुद्र में चीन की बाधा डालने की नीति के कारण असुरक्षित बने हैं। चीन की विस्तार नीति और बाधा डालने की नीति को रोकना इनका प्रमुख लक्ष्य बन रहा है। इनके व्यापक परस्पर संबंधों को लेकर एक नया सामरिक गठबंधन बन रहा है। भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को चीन से सर्वाधिक खतरा होने के कारण चीन के विरोध में एशियाई राष्ट्रों की एकजूट भारत के लिए फायदेमंद होगी।
चीन की ‘घेराबंदी’ का भारत को समय पर प्रत्युत्तर देना चाहिए। मालदीव, मादागास्कर, सेशेल्स के साथ संबंधों को बढ़ावा, मलेशिया, जापान, ताइवान, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया से विशेष संबंध प्रस्थापित करना जैसे उपाय भारत कर सकता है। चीन पर अपना शिकंजा कसना जरूरी है। यह महासागर ‘इंडियन ओशन’ के रूप में जाना जाता है, ‘चायना ओशन’ नहीं। हमें हिंद महासागर की रक्षा करनी चाहिए।
कच्चे माल की पूर्ति करनेवाले देश चीन के दबाव में
अपनी तंत्र कुशलता के बल पर दुनिया में दूसरे नंबर की आर्थिक महासत्ता बने जापान को चीन ने मात दी है। अमेरिका का अव्वल स्थान वह छीन लेना चाहता है। चीन की औद्योगिक कच्चे माल की भूख भयंकर है। हिंद महासागर पर वह अपनी सत्ता कायम करना चाहता है। भारतीय उपखंड में भारत ‘बिग ब्रदर’ न बनने पाए इसके लिए वह प्रयत्नशील है। भारत को मात देकर चीन अमेरिका को भी ललकार सकता है। कह सकता है ‘अगर हिंमत है तो करो मुकाबला’। भारत पर प्रहार करके चीन विश्व राजनीति और अर्थनीति पर अपनी पकड़ मजबूत करेगा।
युद्ध की बदलती परिभाषा जो जल्दी सीखेगा वहीं दुनिया पर शासन करेगा। चीन ने इस बात पर गौर किया और अपने तौर-तरीकों, ढंग में बदलाव लाने में अग्रसर रहा। चीन की तकरीबन हर क्षेत्र की विस्तार नीति सारी दुनिया के लिए चिंता का विषय है। युद्ध सिर्फ सैनिक ही नहीं लड़ते, बल्कि युद्ध आर्थिक, राजनीतिक, कूटनीति से युक्त, मानसिक और सामरिक धरातल पर व्यूहरचना में उलझकर, या किसी राष्ट्र पर दबाव डालकर लड़ा जाता है। चीन की वर्तमान चालें इस बात की ओर इशारा करती हैं कि किसी राष्ट्र पर दबाव ड़ालकर उसे कैसे अपना दास बनाया जाता है। चीन पूरी दुनिया में महासत्ता बन रहा है। चीन भारत को पाकिस्तान की मदद से आंतरिक सुरक्षा के व्यूह में अटका कर स्वयं की-प्रगति जारी रखे हुए हैं।
इस संदर्भ में चीन की नीति अनुकरणीय है। किसका राज है, सत्ता है इसका विचार न करते हुए जिसका व्यापार कमजोर है, स्पर्धा करने वाले बहुत कम हैं, ऐसे देश चुनकर, उनको अपना कर वर्चस्व कायम करना जैसी चीन की व्यापारी नीति है। इससे कारोबार में जरूरत की कच्ची सामग्री की आपूर्ति करने वाले देशों पर चीन आने वाले समय में अपनी धाक जमाएगा। और चीनी आर्थिक विस्तार नीति अनेक सालों तक चलती रहेगी।
भारत में चीन की आर्थिक विस्तार नीति
चीन की नीति के संबंध में बोलते वक्त डेन झिओपिग ने कहा था कि ‘राष्ट्र अपने लक्ष्य और अपने रहस्य ना बतायें, छुपाकर रखे।’ १९७८ में चीन और भारत की प्रति व्यक्ति आय समान स्तर पर थी। पर १९९९ में चीन की प्रति व्यक्ति आय भारत से दुगुनी हो गई। चीन की आर्थिक विस्तार नीति की ओर हमने ज्यादा ध्यान नहीं दिया है। चीन की हमारे बिजली निर्मिति और दूरसंचार क्षेत्र में घुसपैठ की है। राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से ऐन वक्त पर संबंधित परियोजना से बाहर निकलकर चीन भारतीय अर्थव्यवस्था को हानि पहुंचा सकता है।
भारतीय बाजार पर चीनी आक्रमण
चीन की ‘मेड इन चायना’ चीजों ने भारत में अपना डेरा जमाया है। आजतक उन्होंने देशी बाजार का २०-२५ प्रतिशत हिस्सा हथिया लिया है। कीमत कम होने के कारण भारतीय विक्रेता और ग्राहकों को ये चायनीज चीजें पसंद आने लगी हैं। भारतीय बाजार में खिलौने, मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक चीजों से लेकर देवी-देवताओं के फोटो तथा पूजा सामग्री तक चीन ने घुसपैठ कर रखी है। चीनी बोनसाय ने भी भारतीय बाजार में अपना प्रभाव डाला है। हमारे घर चायनीज पौधें आ गए हैं। हमारे बाजार चायनीज चीजों से अटे पड़े हैं। छोटे बच्चों के खिलौने, वॉटर प्युरिफायर, गैस गीझर, इलेक्ट्रॉनिक्स वस्तुएं, छोटे-छोटे इलेक्ट्रिक बल्ब की माला, इलेक्ट्रिक इस्त्री जैसी अनेकों चीनी चीजें अत्यल्प कीमत में बाजार में उपलब्ध हैं।
त्यौहारों के बाजार में भी चीनी घुसपैठ
जो त्यौहार धूमधाम से मनाए जाते हैं, उन त्यौहारों को ध्यान में रखकर आकाशदीप, उपहारस्वरूप दी जानेवाली चीनी चीजों ने भारतीय बाजार में स्थान पा लिया है। दीवाली में बड़े पैमाने पर पटाखे छोड़े जाते हैं। यह देखकर अनेकों पटाखों की बिक्री चीनी विक्रेताओं ने की। उन्होंने भारतीय बाजार में १८०० करोड़ रुपयों का मुनाफा कमाया। चीनी आकाशदीपों ने भारतीय बाजार पर कब्जा किया है। ये दीप भारतीय दीयों की तुलना में सस्ते होने के कारण ग्राहक उनकी तरफ आकर्षित होते हैं। चीनी बंदनवार, मिट्टी के दीये, प्लास्टिक से बनी बल्ब की मालाओं की बड़े पैमाने पर मांग है।
दूरसंचार तकनीक और चीनी आक्रमण
नेपाल सरकार की नेपाल टेलिकॉम ने अपने आधुनिकीकरण व विस्तार का काम चीनी कंपनियों को सौंपा है। इस कारण चीन पड़ोसी देशों में मुक्त संचार कर सकेगा। दूरसंचार की तकनीक अच्छी होने के कारण देश को आर्थिक फायदा हुआ। इस क्षेत्र में अग्रसर रहने के गुण अपने में है क्या? स्विचेस बनाने में हम कहीं भी नहीं हैं। हैण्ड सेट बनाने में भी नहीं, तकनीक के प्रबंधन में भी पीछे, दूरसंचार क्षेत्र में भारत सर्वाधिक गति से विस्तार पानेवाला क्षेत्र है। फिर भी देश में विकसित हुए तकनीक को बढ़ाने में हमने रुकावट पैदा की।
चीन की आर्थिक विस्तार-नीति
चीन ने आर्थिक विस्तार-नीति को पनपने दिया। चीन ने अपनी सरकारी कंपनियों को दुनिया जीतने की सलाह दी। आर्थिक निवेश के पांच सूत्रों का अनुसरण करने का आदेश दिया। उसी प्रकार काम निर्धारित करते हुए विश्व स्तर का ब्रांड निर्माण करना, निर्यात प्रमुख बाजार की संख्या बढाना, बाजार की स्पर्धा को ताकतवर बनाना, कम आय दिलानेवाले विदेशी निवेश में कटौती करना जैसे उद्देश्यों को चीन ने बहुत महत्व दिया था।
चीन की सरकारी और निजी कंपनियों के कारोबार ने पेट्रोलियम चीजें, लोहा, तांबा, ऍल्युमिनियम, कोयला इत्यादि की तरह रसायन आयात कराने की कच्ची सामग्री के उत्पाद में दुनियाभर में हजारों अरब डॉलर का निवेश किया है। अब अपने कारोबार को ही देखिए-
चायनीज वस्तुएं लघु उद्योग में बनायी जाती हैं। चीनी महिलाएं चीजें घर में बनाती हैं। इससे उनके दाम कम हैं। हमारे यहां ऐसे घरेलू उद्योग ही नहीं। इससे अपनी वस्तुओं के दाम ज्यादा हैं। चीन में ऐसे घरेलू उद्योग का सामान सस्ते में उपलब्ध होता है। हमारे यहां इतने सारे टैक्स हैं कि अपनी चीजों की कीमत उस हिसाब से ज्यादा है। इन कारणों से हमारे उद्योजकों की मानसिकता बदल गई है। चीनी चीजें अगर सस्ते में मिल रही हैं तो हम ऐसी चीजें क्यों बनायें? इस विचार से हम चीनी वस्तुओं के कंटेनर खरीदते हैं। उस पर अपना लेबल चिपकाते हैं और बाजार में बेचते हैं। उसमें हम 

बहुत पैसा कमाते हैं। पर इससे हम चीनी अर्थव्यवस्था की मदद कर रहे हैं, यह बात ध्यान में नहीं आती। हमारे यहां बेरोजगारी तो है ही, पर सामाजिक सुरक्षा को भी खतरा बढ़ रहा है। अगर हमें चीन से मुकाबला करना है तो हमें भी उसकी तरह लघु उद्योगों की निर्मिति करनी पड़ेगी। सस्ते में जगह, कच्चा माल उपलब्ध करा देना चाहिए। टैक्स कम करना चाहिए, जिससे हम विशेषता भरी चीजें बना सकें।
चीन की जो कंपनियां गिलगिट, बाल्टीस्तान और पाकव्याप्त कश्मीर में व्यापार करती हैं, उन सारी कंपिनयों को ब्लैक लिस्ट में समाविष्ट करना चाहिए। चीन की आर्थिक घुसपैठ बंद करनी चाहिए। ऐसा सब करने पर ही चीन के आर्थिक विकास संबंधों को बाधा पहुंचेगी तभी वह उसकी दुष्टताभरी हरकतें रोकेगा।
१०० प्रतिशत विदेशी निवेश अच्छा कार्य
नयी सरकार ने सुरक्षा क्षेत्र व अन्य क्षेत्रों में ४९ से १०० प्रतिशत विदेशी निवेश को मान्यता देने का निर्णय लिया है। यह एक कदम आगे बढता है। इस निर्णय से आधुनिक तकनीक भारत में आने में मदद मिलेगी। ध्यान में रखनेलायक बात तो यह है कि केवल नीति निर्धारित कर देने से निवेश के लिए कतार लगेगी ऐसी उम्मीद रखना गलत होगा। प्रत्यक्ष कार्य को अंजाम देने के लिए इस क्षेत्र में काम करनेवाली कंपनियों को भारत में लाकर बेहतर कोशिश करनी चाहिए। यह कोशिश अगर कामयाब हुई तो कंपनियां भारत आकर अपने कारखानें बनायें और विकसित तकनीकी कुशलता भारत में लाए। उद्देश्य तभी सफल होगा।
मेक इन इंडिया नीति
सारा निवेश संयुक्त परियोजना के रूप में हो। भारतीय और विदेशी कंपनियों का जाइन्ट वेंचर हो। उदाहरणार्थ, हवाई जहाज़ के लिए भारतीय कंपनी और राफेल कंपनी का जाइन्ट वेंचर हो। इससे हमारी इंडस्ट्री बढ़ेगी और अत्याधुनिक तकनीक भी आएगी। भारतीय वैज्ञानिकों की क्षमता ज्यादा है। अमेरिका में सिलिकॉन वैली में या नासा में बड़े पैमाने पर भारतीय वैज्ञानिक हैं। तरक्की के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। विदेश में मौजूद भारतीय प्रतिभा को भारत में वापस लाने की जरूरत है। विदेश के उच्च पदस्थों को भारत वापस लाना चाहिए। जब चारों ओर से इस प्रकार की कोशिशें होंगी तब सरकार की नीति सफल होगी, कामयाब होगी। कुछ सालों बाद भारत स्वाधीन बनेगा। चीनी आर्थिक विस्तार नीति पर भारत में रोक लगेगी।
सकारात्मक परिवर्तन
मोदी सरकार ने पहला कदम विदेश नीति में सकारात्मक परिवर्तन करके उठाया। पड़ोसी देशों के प्रमुखों को शपथ-ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया। पहले विदेश दौरे के लिए भूटान को चुना। भूटान और भारत की बाह्य, आंतरिक सुरक्षा जोड़ दी गई है। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतीन के साथ भी बातचीत हुई है। नेपाल दौरा भारत की सुरक्षा और आर्थिक नीति सुदृढ़ होने की दृष्टि से महत्वपूर्ण था। मोदी को वीजा देने से इनकार करने वाली अमेरिका ने अब मोदी जी के साथ अच्छे संबंध प्रस्थापित किए हैं।
केंद्र में सत्ता पलट हो जाने के बाद चीन अलग-अलग प्रकार से नयी सरकार के रूख की टोह लेता रहता है। नयी सरकार की मानसिक ताकद कितनी है यह जानने के लिए चीन ऐसी हरकत करता है। हमें अलग अलग स्तर पर चीन से लड़ने की तैयारी करनी चाहिए। इन सारी बातों पर सरकार ध्यान दे रही है। जापान के प्रधान मंत्री जिंजो आबे से मुलाकात और वियतनाम दौरा। २६ जनवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति का दौरा, चीन के विरोध में समान दुख से पीड़ित देशों के संगठन बनाने के लिए किया जा रहा है।
चीन को सबक सिखाया जाए
चीन की सामरिक और विस्तार नीति का भारत को बिना किसी विलंब के स्पष्ट प्रत्युत्तर देना चाहिए। मालदीव, मादागास्कर, सेशेल्स से संबंध बढ़ाना; जापान, ताइवान, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया के साथ विशेष संबंध प्रस्थापित करना जैसे उपाय भारत कर सकता है। भारत को चाहिए कि चीन को अपने चंगुल में जकड़ें। इसके लिए सामर्थ्य निर्माण करने की जरूरत है। चीन का लक्ष्य कभी भी बदल सकता है। अपनी सीमा की सुरक्षा करने में भारतीय सेना सक्षम है। युद्ध टालता है तो भी युद्ध के लिए सक्षम और तैयार रहना पड़ेगा। उसके लिए प्रखर इच्छाशक्ति की जरूरत है। सेना, सुरक्षा सामग्री की उपलब्धि और दांवपेचों को सफल बनाने के लिए सख्त राजनीतिक नेतृत्व हो तो चीन को सामरिक, आर्थिक धरातल पर परास्त करना भारत के लिए आसान साबित होगा।
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