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सर्वांगीण तथा एकीकृत राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था (Comprehnesive and Integrale National Security) के सिद्धांतों का अध्ययन तथा विश्लेषण करें तो हमें पता चलता है कि मनुस्मृति तथा चाणक्य नीति के अनुसार किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रीय सुरक्षा पर निम्न चार प्रकार से आघात होता है-
बाह्योविपत्ति:, बाहय् प्रतिव्यापा-Exter§nal threats, externally instigated and abatted.
बाहयोविपत्ति: अभ्यंतर प्रतिव्यापा- External threats, internally instigated and abatted.
अभ्यांतरो विपत्ति : बाह्य प्रतिव्यापा- Internal threats, externally instigated and abatted.
अभ्यांतरो विपत्ति : अभ्यांतर प्रतिव्यापा-Internal threats, internally instigated, sustained and abatted.
दुर्भाग्य से भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा पर उपरोक्त चारों प्रकार से आघात, आक्रमण होता रहा है, हो रहा है तथा यदि हम समय रहते सचेत, दक्ष तथा सक्षम नहीं हुए तो भविष्य में भी हमें ये आघात सहन पड़ेंगे।
सामान्य नागरिक की यही समझ है कि राष्ट्रीय सुरक्षा केवल भारत की सीमाओं की सुरक्षा से सम्बंधित है; यदि भारतीय सीमाएं सुरक्षित हैं तो भारत सुरक्षित है। स्वतंत्रता प्राप्ति से आज तक का हमारा राष्ट्रीय अनुभव हमें बतलाता है कि ये धारणा गलत है। विशेषत: पिछले पांच दशकों में ज्यादातर आघात भारतीय सुरक्षा तथा राष्ट्रीय हितों पर आतंरिक कारणों से हुए हैं। २१वीं सदी में युद्ध तथा राष्ट्रीय सुरक्षा की परिभाषा, आयाम बदल गए हैं। हमारी एक और गलत धारणा है कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा यह केवल केंद्र शासन तथा सेनाओं की जिम्मेदारी है।’ यह धारणा अब निराधार और गलत है।
२१वीं सदी में भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा पर आघात बाहरी शत्रुओं से तो होगे ही परंतु उससे भी ज्यादा आघात आंतरिक कारणों से, आंतरिक शत्रुओं से हो रहे है। बाह्य आक्रमण के अतिरिक्त आतंकवाद, अलगाववाद, माओवाद, नक्सलवाद, जातिवाद, धर्मवाद, आर्थिक, व्यावसायिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक रूप से भी आघात हो रहे हैं। अर्थव्यवस्था, बैकों मे होने वाले अपराध, कृषि क्षेत्र में उत्पादन की कमी के कारण किसानों द्वारा आत्महत्याएं, मादक पदार्थों की तस्करी, अनधिकृत शस्त्रों की तस्करी, सायबर हमले, रासायनिक, जैविक (Biological) तथा परमाणु (Nuclear) खतरे बढ़ रहे हैं। काले धन का दुष्प्रभाव राष्ट्रीय सुरक्षा पर होता है। काले धन के उपयोग के कारण समाज में आर्थिक भेदभाव बढ़ रहा है। अमीर अमीर हो रहा है, गरीब और भी गरीब हो रहा है। राष्ट्र की स्थिरता तथा सुरक्षा के लिए यह अत्यंत घातक है। विश्व के अनेक देशों में केवल पिछले दो दशकों में सैन्य क्रांतियां हुईं, सामाजिक, राजनैतिक क्रांतियां हुई हैं, सत्ता में परिवर्तन हुए हैं। हमें विश्व में बदलने वाली परिस्थिति से सबक सीखना आवश्यक है।
जितनी हानि भारत में प्रत्यक्ष युद्धों से नहीं हुई उससे ज्यादा हानि अप्रत्यक्ष, परोक्ष युद्ध तथा आंतरिक अराजकता, आंतरिक युद्ध तथा आतंकवाद के कारण हुई है। भारत की भौगोलिक स्थिति, भारतीय क्षेत्रफल, भारतीय जनमानस, भारतीय बौद्धिक ज्ञान, भारतीय युवा वर्ग की योग्यता तथा क्षमता, शक्ति, भारतीय एकीकृत शक्ति हमें प्रेरित तथा प्रोत्साहित करती है कि भारत विश्व व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण, संतुलित, सकारात्मक व सक्षम भूमिका निभाए। यदि भारत ने अपनी भूमिका सशक्त रूप से नहीं निभाई तो कोई और सम्भवत: हमारा पूर्वी पड़ोसी राष्ट्र इस भूमिका को निभाएगा। राष्ट्रीय दूरगामी हितों की दृष्टि से क्या यह उचित होगा?
इस अंक में इन सब विषयों पर सुरक्षा क्षेत्र के अभ्यासकों, विश्लेषकों तथा अनुभवी लोगों के अध्ययन के आधार पर लेख सम्मिलित किए हैं। एकीकृत तथा समग्र सुरक्षा ही २१वीं सदी में भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा होगी। इस अंक में प्रकाशित लेखों का उपयोग केंद्र शासन, राज्य शासन, पुलिस व्यवस्था, शिक्षा क्षेत्र तथा अन्य क्षेत्रों में उपयोगी सिद्ध होगा।
हम सब को एकत्र होकर शासन की सहायता करना होगी। शासकीय तथा सुरक्षा व्यवस्था पर केवल उंगली उठाने से सफलता नही मिलेगी। जन मानस को भी अपना दायित्व निभाना पड़ेगा। शासन के हाथ मजबूत करना होंगे। इस अंक के माध्यम से हम आवाहन करना चाहते हैं कि प्रत्येक नागरिक एक सैनिक की तरह दक्ष, सक्षम तथा संयमित रहे। Oh Citizen you secure yourself.
भारतीय सेनाएं भारत की मुट्ठी हैं, भारतीय जनमानस भारत की भुजाएं हैं तथा भारतीय संसद भारत का मस्तिष्क है। भुजा, बाहु तथा मस्तिष्क में समन्वय होना आवश्यक है। तभी भारतीय सुरक्षा सज्ज, सक्षम तथा सशक्त होगी। यदि व्यक्ति, नागरिक, सुरक्षित नहीं है तो राष्ट्र भी सुरक्षित नहीं रहेगा। आइये, हम सब मिलकर भारत को सक्षम, सजग तथा सुरक्षित बनाएं।
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