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पाकिस्तान के साथ सम्बंध निर्मित करते हुए अथवा पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय सम्बंधों को आगे बढ़ाते समय भारत हमेशा से जिस एक चीज की अनदेखी करता रहा, वह है पाकिस्तान के जन्म का सच और पाकिस्तान के चरित्र से उपजने वाले खतरे। भारत के विरुद्ध जिहादी मनोवृत्ति से उपजा पाकिस्तान भारत विरोध पर ही अपने अस्तित्व को बनाए रखने की नीतियों पर चलते हुए प्राय: देखा गया। ऐसा भी कहा जा सकता है कि पाकिस्तान हमेशा ही अस्तित्व के संकट यानि ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ से गुजरता रहा और पाकिस्तान का शासक वर्ग इससे बचने के लिए पाकिस्तान की जनता के सामने भारत को दुश्मन बना कर पेश करते हुए समाधान ढूंढने की कोशिश करते रहे। इसलिए यदि आज भी पाकिस्तान से यह अपेक्षा की जाती है कि वह भारत के साथ स्थायी और वास्तविक दोस्ती करेगा, तो फिर अब भारतीय राजनयिकों के लिए वैदेशिक सिद्धांतों के बजाय इतिहास की पुस्तकों को पढ़ने की आवश्यकता होगी। कारण यह है कि पाकिस्तान में जिस मनोग्रंथि को अब तक देखा गया है उसमें कश्मीर और भारत के खिलाफ जिहाद के नाम पर आतंकवादी पूरी तरह से पैठ बना चुके हैं। पाकिस्तान की तरफ से अब तक जो अभिव्यक्त हुआ है उसका भाव यही है कि-एक तो पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे के बिना भारत से वार्ता नहीं करेगा जबकि दूसरा यह कि सीमा पर युद्धोन्मादी वातावरण बनाने के लिए भारत दोषी है। अब सवाल यह उठता है कश्मीर पर पाकिस्तान से बात हो अथवा उस पर विराम लगा दिया जाए?
यह मामला तो कश्मीर के लोगों और सरकार के बीच का हो सकता है इसलिए यदि कश्मीर के नागरिकों को कोई शिकायत है तो उनके साथ सरकार को वार्ता करनी चाहिए। यदि भारत के लोग, भारत की सरकार और भारत का संविधान यह मानता है कि कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है तो ऐसी वार्ताओं का औचित्य नहीं बनता। यदि जम्मू-कश्मीर के लोग भारत के संविधान के तहत भारत के निर्वाचन आयोग के निर्देशन में चुनाव में भाग लेते हैं और ८०-८१ प्रतिशत मतदान करते हैं, उस स्थिति में जम्मू-कश्मीर की व्यावहारिक स्थिति भी सैद्धांतिक स्थिति से मेल खा जाती है। क्या इसके बाद भी पाकिस्तान के कश्मीर राग पर ध्यान देने की कोई वजह शेष रह जाती है?
दरअसल १५ अगस्त को जो भारत आजाद हुआ था उसे न केवल अपने से अलग हुए एक हिस्से से संघर्ष करना था बल्कि उसे जो राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी उसे भौगोलिक और सांस्कृतिक एकता में परिवर्तित करना था, तभी वह आगे का रास्ता शांति और सहोदरता के साथ तय कर सकता था, अन्यथा नहीं। इस प्रक्रिया में रियासतों का विलय बेहद पेजीदा था, लेकिन इसके बावजूद भी जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर की रियासतों को छोड़ कर शेष रियासतों का भारत संघ में विलय सम्पन्न हुआ। मुश्किल ढंग से ही सही लेकिन हैदराबाद और जूनागढ़ का विलय भी भारत में हो गया लेकिन कश्मीर के विषय में यह नहीं कहा जा सकता। वह विवादास्पद न होते हुए विवादास्पद बना हुआ है और इस वजह से एक प्रकार का खेल का मैदान भी (पाकिस्तान और अलगाववादियों के लिए)।
कश्मीर के अलगाववादी किसी भी दृष्टि से कश्मीर का लोकतांत्रिक ढंग का प्रतिनिधित्व नहीं करते और पाकिस्तान को उसके लोगों के प्रति किसी तरह की मानवीय संवेदना नहीं है, लेकिन ये दोनों ही कश्मीर के लोगों का सरबराह होने का दावा करते हैं। भारत संघ घटक होने के नाते भारत सरकार उसके लोगों के प्रति अपने सभी दायित्वों का निर्वहन करती है, लेकिन उसके विरुद्ध पाकिस्तान व अलगाववादी शोषक होने का आरोप लगाते हैं। हालांकि दिसम्बर २०१४ में जम्मू-कश्मीर की विधान सभा के लिए सम्पन्न हुए चुनावों में जिस तरह से वहां के नागरिकों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया, उसने यह सिद्ध कर दिया है कि अलगाववादी अब कश्मीर में कोई महत्व नहीं रखते। लेकिन पाकिस्तान इस स्थिति को सहज ही स्वीकार नहीं कर सकता, इसलिए उसने दूसरे तरीके अपनाने वाली मनोदशा को व्यक्त करना आरंभ कर दिया।
जम्मू-कश्मीर पर किसी भी निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए यह जरूरत है कि उसकी परिस्थिति और पाकिस्तान द्वारा उसे लेकर भारत के खिलाफ लड़े जा रहे छद्म युद्ध, विभिन्न पक्षों अवलोकन व आकलन किया जाए। भारत की आजादी के समय ८४६७१ वर्गमील क्षेत्रफल तथा ४४ लाख की आबादी वाले कश्मीर को महाराजा हरि सिंह पूरब का स्विट्जरलैण्ड बनाना चाहते थे इसलिए उन्होंने माउंटबैटन की भारत संघ में सम्मिलित होने सम्बंधी सलाह को गंभीरता से नहीं लिया। हरि सिंह अपने निरंकुश अधिकारों के साथ कश्मीर को स्वतंत्र रखना चाहते थे। उन्होंने इस तथ्य को अनदेखा कर पाकिस्तान के साथ ‘स्टैंडस्टिल समझौता’ कर लिया कि मुस्लिम के एजेंडे में जो पाकिस्तान था उसमें कश्मीर तो १९३३-३४ के चौधरी रहमत अली के पाकिस्तान आंदोलन से ही पाकिस्तान का हिस्सा था। इस समझौते के साथ यह भी तय किया गया कि कश्मीर की डाक तार व्यवस्था का, जिसका जिम्मा पहले ब्रिटिश सरकार का था, संचालन पाकिस्तानी सरकार करती रहेगी और वही रसद पेट्रोल की सप्लाई का भी काम करेगी। यानि कश्मीर में पाकिस्तानी सेना या उसके किराए के हमलावरों का प्रवेश करने का रास्ता साफ हो गया।
पहले ९ अगस्त को पुंछ में दंगा प्रारम्भ हुआ, जिसका आकार धीरे-धीरे बढ़ता गया। इसे देखते हुए २२ अक्टूबर १९४७ को पठान कबाइलियों के गिरोहों ने कश्मीर पर उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत की तरफ से आक्रमण कर दिया और २६ अक्टूबर तक वे राजधानी श्रीनगर के निकट पहुंच गए। अंतत: महाराजा ने शेख अब्दुल्ला की सलाह पर अनिच्छापूर्वक ही सही भारतीय संघ में अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। २७ अक्टूबर १९४७ को लार्ड माउंटबेटन ने महाराजा हरि सिंह को लिखा, ‘‘विशेष परिस्थितियों में मेरी सरकार ने कश्मीर रियासत के भारत डोमीनियन में शामिल होने के निर्णय को स्वीकार करने का निश्चय किया है, यदि किसी रियासत को शामिल होने का प्रश्न विवाद का विषय हो तो उसका राज्य की जनता की इच्छा के अनुसार निर्णय किया जाना चाहिए। इसलिए मेरी सरकार की इच्छा है कि जैसे ही कश्मीर में कानून और व्यवस्था फिर से स्थापित हो जाए और आक्रमणकारी भगा दिए जाएं, राज्य को डोमिनियन में शामिल होने का प्रश्न जनमत द्वारा तय किया जाना चाहिए।’’
इस प्रकार से जम्मू-कश्मीर का भारत संघ में अधिमिलन हुआ लेकिन यह अस्थायी निर्णय भारत के लिए एक भूल से अधिक कुछ नहीं था, क्योंकि इसने कश्मीर को विकृत और जटिल राजनीति के हाल पर छोड़ दिया। इसके बाद से ही यहां पर मानव मूल्य भारत के लोकतंत्र और पाकिस्तानी रूढ़िवादियों के इस्लामी पाखंडवाद की भेंट चढ़ रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तान ने पाक-अधिकृत कश्मीर, जिसे उसने षड्यंत्रकारी ढंग से और संयुक्त राष्ट्र की अवहेलना करते हुए आजाद कश्मीर नाम दिया, को एक ऐसी इम्युनिटी (मकबूजा या आजाद कश्मीर कह कर) प्रदान कर दी उस पर जनमत संग्रह की बात नहीं की जाती। पाकिस्तान अब कश्मीर के मुद्दे तीसरी शक्ति को शामिल करना चाहता है। सवाल यह उठता है कि इसके पीछे उसका मकसद क्या है? उसका पहला मकसद यह है कि कश्मीर मुद्दा द्विपक्षीय मुद्दे के दायरे से बाहर निकल कर एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाना जबकि दूसरा मकसद है अमेरिका या चीन जैसे देश को इसमें शामिल करना। चूंकि इन दोनों देशों के पाकिस्तान में अपने हित और उद्देश्य निहित हैं, इसलिए ये दोनों ही देश किसी भी स्थिति में उसके विरुद्ध नहीं जाएंगे।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि पिछले डेढ़ दशक में जो स्थितियां बदली हैं, उनके कारण भले ही यह लगे कि पाकिस्तान की स्थिति कमजोर हुई है, लेकिन सच यह है कि वह पहले के मुकाबले अधिक मजबूत हुआ है। दरअसल ९/११ के बाद अफगानिस्तान में शुरू हुए अमेरिकी ‘वार इनड्यरिंग फ्रीडम’ के बाद पाकिस्तान रणनीतिक रूप सौदेबाजी करने में ज्यादा समर्थ हुआ है। इस युद्ध के लिए जब अमेरिकी सेनाएं अफगानिस्तान में प्रविष्ट हुईं तो चीन उतना ही बेचैन हुआ जितना कि १९७९ में सोवियत फौजों के प्रवेश से अमेरिका हुआ था। परिणाम यह हुआ कि उसने पाकिस्तान के साथ मैक्रो स्ट्रैटेजिक साझेदारी की शुरूआत की ताकि पाकिस्तान के जरिए अमेरिकी ताकत का काउंटर किया जा सके। परिमाण यह हुआ कि उसने पाकिस्तान को सैनिक-आर्थिक सहायता के साथ-साथ उसके परमाणु कार्यक्रम में आधारभूत सहयोग देना भी शुरू कर दिया जिसके चलते ही पाकिस्तान की परमाणु क्षमता में तेजी से वृद्धि हुई (स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट से स्पष्ट)। चूंकि अमेरिका के लिए पाकिस्तान दक्षिण एशिया में उसके उद्देश्यों को पूरा करने वाला एक ‘की इंस्ट्रमेंट’ है, इसलिए वह चीन-पाकिस्तान सम्बंधों को निर्णायक स्थिति में पहुंचते हुए नहीं देखना चाहता। यही कारण है कि अमेरिका में पाकिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक सहायता को विरोध होने के बावजूद भी केरी-लूगर एक्ट पारित कर उसे जारी रखने का निर्णय लिया गया।
‘डिसेप्शन पाकिस्तान द यूनाइटेड स्टेट्स एंड द ग्लोबल वेपन कांसिपिरेसी’ और ‘पेंडलिंग पेरिल: हाउ द सीक्रेट न्यूक्लियर ट्रेड आर्म्स अमेरिकाज एनेमीज’ से पता चलता है कि अमेरिका ने यह जानते हुए कि उसके द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता का प्रयोग पाकिस्तान भारत विरोधी गतिविधियों को संचालित करने में खर्च करता है, भारी-भरकम सहायता जारी रखी। चूंकि चीन का भी भारत के साथ घृणा-पे्रम सम्बंध है, इसलिए चीन भी भारत को तेजी से आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहता और पाकिस्तान की कम से कम दो ताकतें-सेना और जिहादी, भारत को दुश्मन नम्बर एक या सनातन शत्रु मानती हैं, इसलिए दोनों की सम-उद्देश्यिक साझेदारी और मजबूत हो गई। इसका सबसे ताजा उदाहरण काश्गर-ग्वादर हाइवे है। सामान्यतया तो २००० किमी लम्बाई वाला यह रेल और रोड लिंक, पाकिस्तान के मकरान तट स्थित ग्वादर बंदरगाह से चीन के झिंगजियान प्रांत स्थित काश्गर तक जाने वाला एक ‘ट्रेड कॉरिडोर’ है, जिसे नवाज शरीफ ‘गेम चेंजर’ मान रहे हैं। इसका प्रभाव क्या हो सकता है, इसका अनुमान कुछ समय पहले जनरल लियांग और जनरल कयानी की बीजिंग वार्ता में प्रयुक्त इस वाक्य से निकाला जा सकता है कि ‘‘इसे कतई नहीं भुलाया जा सकता कि हिन्दुस्तान ही वह मुल्क है, जिसका दोनों देशों के साथ युद्ध हुआ है।’’ यही कारण है कि पाकिस्तान इन दोनों देशों में से किसी एक को कश्मीर मुद्दे पर शामिल करना चाहता है।
ऐसी स्थिति में भारत सरकार को चाहिए कि कश्मीर को एक ऐसा आधार प्रदान करें जिससे कि बाहरी हस्तक्षेप निष्प्रभावी हो जाएं। दरअसल कश्मीर भारतीय संविधान के २१ वें भाग में अनुच्छेद ३७० को ‘अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान’ शीर्षक के अंतर्गत रखा गया है। यह अनुच्छेद काफी विवादास्पद रहा है। महावीर त्यागी, मौलाना हसरत मोहानी के साथ-साथ भारत की संविधान सभा में भी इसका विरोध हुआ लेकिन अंतरराष्ट्रीय जटिल परिस्थितियों को देखते हुए इसे ‘अस्थायी व्यवस्था’ के तहत स्वीकार कर लिया गया। एन. गोपालस्वामी ने १७ अक्टूबर १९४७ को संविधान सभा में अनुच्छेद ३६०(ए) के रूप में कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले इस प्रावधान को पेश किया जो बाद में अनुच्छेद ३७० के रूप में दर्ज हुआ। इसके बाद भारतीय संविधान के सिर्फ दो अनुच्छेद-अनुच्छेद १ और अनुच्छेद ३७० जम्मू और कश्मीर पर सीधे लागू होते हैं। शेष में या तो कुछ का लोप कर दिया गया है या वे कुछ संशोधनों के साथ लागू होते हैं। अनुच्छेद ३७० में चार उपखण्ड, तीन उपबंध और एक स्पष्टीकरण है। इस अनुच्छेद की शुरूआत इस वाक्य से हेाती है कि इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी फिर खण्ड १ का उपखण्ड (क) कहता है कि अनुच्छेद २३८ के प्रावधान जम्मू और कश्मीर राज्य पर लागू नहीं होंगे। उपखण्ड (ख) के अनुसार-(१) संघ सूची और समवर्ती सूची के वे विषय, जिनको राष्ट्रपति उस राज्य की सरकार की सलाह से घोषित कर दें कि वे विषय उस अधिमिलन पत्र में दिए गए हैं। (२) उन सूचियों के ऐसे विषय जो राष्ट्रपति उस सरकार की सहमति से आदेश द्वारा निर्दिष्ट करें। उपखण्ड(ग) प्रावधान करता है कि अनुच्छेद १ और इस अनुच्छेद के प्रावधान उस राज्य के सम्बन्ध में लागू होंगे। और उपखण्ड (घ) प्रावधान करता है कि इस संविधान के वे अन्य प्रावधान भी उस राज्य पर ऐसे अपवादों और परिवर्तनों के साथ लागू होंगे, जिन्हें राष्ट्रपति आदेश द्वारा निर्दिष्ट करें।
उल्लेखनीय है भारत की संविधान सभा ने अनुच्छेद ३७० का प्रावधान १७ अक्टूबर १९४९ को मंजूर कर लिया था लेकिन राष्ट्रपति ने इस अनुच्छेद में प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग कर संविधान सभा की सिफारिश पर राज्य सरकार की सहमति से १४ मई १९५४ को अधिसूचना जारी की अर्थात् जम्मू और कश्मीर में भारत का संविधान विभिन्न अपवादों, उपांतरणों, सुधारों और संशोधनों के साथ १४ मई १९५४ को लागू हुआ। अनुच्छेद ३७० संविधान के भाग २१ में ‘‘अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान’’ के अंतर्गत है, लेकिन इस भाग में अनुच्छेद ३७१ के आठ उपभाग भी है जिनमें पंजाब, महाराष्ट्र, असम, नगालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम आदि के बारे में भी विशेष प्रावधान किए गए हैं। इसलिए यह माना जा सकता है कि अनुच्छेद ३७० स्थायी श्रेणी में चला गया है। दूसरी तरफ अनुच्छेद ३७० के उपखण्ड (३) के अनुसार राष्ट्रपति इस प्रावधान को समाप्त कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा की सिफारिश आवश्यक है, जो कि १७ नवम्बर १९५६ को अपना कार्यकाल पूरा जाने के बाद भंग की जा चुकी है और इससे पूर्व संविधान सभा ने इस तरह की कोई सिफारिश नहीं की, इसलिए अब अनुच्छेद ३७० अस्थायी न होकर स्थायी प्रकृति का है। इसी व्यावहारिक स्थिति का फायदा कश्मीरी अलगाववादियों और पाकिस्तान ने उठाया और भारत के खिलाफ एक छद्म युद्ध छेड़ दिया।
उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में चलाए गए ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ (१९६५) और ‘ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम’ नीति असफल हो जाने पर ‘बीयर ट्रैप’ की नीति शुरू की गई और अफगानिस्तान से सोवियत फौजों की वापसी के बाद जम्मू-कश्मीर में छाया युद्ध शुरू कर दिया। इसके बाद पाकिस्तान में बहुत सारे आतंकवादी संगठन फले-फूले जिनका मकसद था भारत में विभिन्न भागों में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देना। इनमें प्रमुख र्हैं- लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद, जमायत-उल-उलमा, हरकत-उल-मुजाहिदीन, हरकत-उल-अंसार जिनका कमोबेश एक मकसद था कि जिस तरह से सोवियत संघ विखंडित हो गया, भारत भी टुकड़ों में बांट देना। वे यह मानकर चल रहे थे कि यदि हम मृत्यु को प्राप्त होते हैं तो हम शहीद होंगे और यदि हम जीतते हैं तो गाजी होंगे। भारत हमारे लिए एक दर्द है। चाहे हम सफल हों या मर जाएं हम दोनों में संतुष्ट होते हैं। इन संगठनों ने अकेले-अकेले या फिर संयुक्त रूप से भारतीय भू-भाग पर अपनी हरकतों को अंजाम दिया है। दशकों पहले की घटनाओं को छोड़ दें लेकिन करगिल युद्ध और उसके बाद की घटनाओं का जिक्र करना जरूरी होगा।
बहरहाल पाकिस्तान का एक ही मकसद है भारत को विखंडित करना, जैसा कि उसकी सेना की ‘डिवाइन मैट्रिक्स’ से पता चलता है। यही कारण है कि जैसे ही भारत शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ना शुरू करता है और कश्मीर लोकतंत्र और शांति की प्रक्रिया की मूल धारा से जुड़ने लगता है, वैसे ही पाकिस्तान एक साथ कई मोर्चों पर सक्रिय होता है जिनमें से एक कश्मीरी अलगावादी नेताओं को सक्रिय करना, दूसरा सीमा पर आतंकी घुसपैठ और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोधी प्रचार। जो भी हो, अब भारत को रणनीतिक बनना होगा, पाकिस्तान को प्रत्येक मोर्चे पर घेरना होगा और कश्मीर पर निर्णायक कदम भी उठाने होंगे।

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