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टीजेएसबी की स्थापना का मुख्य उद्देश्य क्या है?

टीजेएसबी की स्थापना सन १९७२ में हुई। सन १९६९ में बैंकों के राष्ट्रीकृत होने के बाद समाज का एक विशिष्ट वर्ग बैंकिंग सुविधाओं से वंचित था। अत: टीजेएसबी बैंक की स्थापना का मूल उद्देश्य यही था कि समाज के अंतिम स्तर के व्यक्ति को बैंकिंग का लाभ मिले तथा उसका आर्थिक विकास हो सके।
निजी बैंकों के आने के बाद बैंकिंग क्षेत्र में एक नया चित्र उभरा कि राष्ट्रीय बैंक अर्थात सरकार के नियम कानून और निजी बैंक अर्थात तकनीक। लोग बैंकों में जाने से घबराने लगे थे। अत: टीजेएसबी बैंक का तत्कालीन उद्देश्य यह भी था कि समाज के अंतिम वर्ग के अधिकतम लोगों को बैंकिंग से जोड़ा जा सके।

किसी भी संस्था की बुनियाद उसके मूल्यों पर टिकी होती है। टीजेएसबी बैंक की बुनियाद किन मूल्यों पर आधारित हैं?

टीजेएसबी बैंक की बुनियाद मुख्य रूप से निम्न ५ मूल्यों पर आधारित हैं-
वैल्यू ऑफ विजन:- हमारा उद्देश्य यथार्थवादी है। हम यह नहीं सोचते कि एक ही दिन में हमें सारे महाराष्ट्र में बैंक की शाखाएं खोलनी हैं। हमने सोच विचार कर हमारा लक्ष्य तय किया है जो हमारे मूल उद्देश्य को पूर्ण करने वाला होगा। इससे बैंक के कार्य को एक दिशा मिलती है और पूरी ऑर्गनाजेशन उस दिशा में कार्यरत हो जाती है।

वैल्यू ऑफ प्रपोजिशन- इसमें हम यह सोचते हैं कि हमारा बैंक अन्य बैंकों की तुलना में अलग कैसे है? आज हमने समाज को, लोगों को क्या दिया?

हमारा यह मानना है कि बैंक को व्यवसाय से जो लाभ होगा वह तो होगा ही, परंतु कुछ देने के भाव से मिलने वाले संतोष का भाव अलग होता है और सही मायनों में उसी से बैंक का विस्तार होता है। अत: हम क्या अलग कर रहे हैं यह विचार सभी कर्मचारियों के मन में रहे यही हमारा प्रयास होता है। उदाहरणार्थ, आजकल तकनीक की मदद लेकर सभी बैंक यह कोशिश करते हैं कि ग्राहक कम से कम संख्या में बैंक में आएं; परंतु हम ग्राहकों को बैंक में आने के लिए प्रवृत्त करते हैं। जिससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है। यही ग्राहक फिर हमारी बैंक का मौखिक विज्ञापन भी करता है।
वैल्यू ऑफ डिलीवरी- बैंकिंग की भाषा में एक शब्द प्रयोग किया जाता है ‘टैट (टर्न अराउंड टाइम)’। कहा जाता है कि जब बैंक प्रगति करता है तो मूल्य बिखर जाते हैं परंतु हमारे यहां ‘टैट’ पर आज भी विशेष ध्यान दिया जाता है। इस ‘टैट’ को सुचारू रूप से चलाने के लिए हम अपनी प्रक्रिया, कार्यविधि पर अत्यधिक ध्यान देते हैं क्योंकि व्यक्ति बदलते रहते हैं प्रक्रिया नहीं बदलती। अगर ‘टैट’ सही है तो ग्राहक का बैंक पर विश्वास और बैंक का लाभ दोनों निश्चित रूप से बढ़ता है।
वैल्यू क्रिएटर- इसका अर्थ है बैंक के संस्थापकों के प्रति निष्ठा और आदर भाव। हम गर्व के साथ कहते हैं कि हमारा बैंक रा.स्व.संघ के मूल्यों पर आधारित बैंक है। अत: सभी के मन में यह भाव होने चाहिए कि मुझे उस विचारधारा में ही कार्य करना करना है। हमें हमारे हर छोटे-बड़े ग्राहक को समान रूप से अपनी सेवाएं प्रदान करनी हैं। हमारे यहां आने वाले नए कर्मचारियों के लिए हम एक घंटे का कार्यक्रम रखते हैं जिसमें उन्हें इस विचारधारा से अवगत कराया जाता है, जिससे वे भविष्य में उस विचारधारा और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को ध्यान में रख कर कार्य कर सकें।
वैल्यू ऑफ सिस्टम- बैंक सदैव तंत्रज्ञान और प्रणाली को अपनाने के लिए तैयार रहता है क्योंकि हम जानते हैं कि समयानुरूप तंत्रज्ञान को आत्मसात करके ही बैंक का विकास किया जा सकता है।

बैंक की स्थापना के समय कुछ उद्देश्य एवं मूल्य बैंक ने तय किए थे। आज बैंक राष्ट्रीय स्तर पर कार्य कर रहा है। ऐसे में आपने अपने मूल्यों का जतन किस प्रकार किया है?

आज बैंक का विकास हो रहा है, उसका व्यवसाय बढ़ रहा है, बड़े-बड़े कर्ज लिए जा रहे हैं, बड़ी रकमों के जमा खाते खुल रहे हैं परंतु आज भी हम विद्यार्थियों तथा महिलाओं के जीरो बैलेन्स खाते खोलने की ओर ध्यान देते हैं। हम अपनी शाखाओं में पर्सनल लोन अधिक देने के निर्देश देते हैं। क्योंकि इससे लोगों की छोटी-छोटी जरूरतें पूरी होती हैं। जो लोग साहूकारों या अन्य लोगों से २० से २५% ब्याज दर पर कर्ज लेते हैं उन्हें १२ से १३% पर कर्ज देते हैं। इससे उन्हें आर्थिक बल मिलेगा। हम अभी म्यूनिसिपल विद्यालयों के छात्रों का भी जीरो बैलेंस अकाउंट खोलते हैं। समाज सेवा के लिए व्यवसाय के उद्देश्य का हमने अभी तक जतन किया है।

आपने अपने करिअर के रूप में आर्थिक क्षेत्र को ही क्यों चुना?

सन १९८३ में मैंने बी.कॉम. पूर्ण किया। उस समय का नियम यह था कि अगर किसी की आयु १८ साल है और वह बी.कॉम. द्वितीय वर्ष में है तो वह बैंकिंग सर्विस रिक्रूटमेंट बोर्ड की परीक्षा दे सकता था। इस परीक्षा को उत्तीर्ण करके आपको जो भी बैंक मिले उसमें काम करना होता था। मैंने जब परीक्षा उत्तीर्ण की तो मुझे सेंट्रल बैंक में नौकरी मिली। तब से इसी क्षेत्र से जुड़ा हूं। शुरू के ३-४ सालों में मैंने बैंकिंग से सम्बंधित परीक्षाएं उत्तीर्ण कीं। उसके बाद आइसीडब्लूएआई तथा कंपनी सेक्रेटरी की उपाधी प्राप्त की। जिसके कारण मुझे सेंट्रल बैंक में पदोन्नति मिलती गई। सन २००१ मंट मुझे टीजेएसबी में काम करने का प्रस्ताव मिला। चूंकि मेरे मन में पहले से यह भाव था कि मैं बड़े बैंक में चाहे जितने भी अच्छे पद पर कार्य करूं परंतु समाज के लिए कुछ करने का अवसर तथा संतोष मुझे सहकार क्षेत्र में आकर मिलेगा। अत: मैं २००१ से टीजेएसबी बैंक में कार्यरत हूं।

आप सेंट्रल बैंक का १८ साल का अनुभव लेकर टीजेएसबी में आए थे। आपके आने के बाद बैंक में जो परिवर्तन हुए उनमें आपका योगदान किस प्रकार रहा?

सर्वप्रथम तो मैं यह कहना चाहूंगा कि कोई भी परिवर्तन अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता। बैंक को आगे ले जाने की जो सब की इच्छाशक्ति थी उससे सब कुछ संभव हो सका। राष्ट्रीयकृत बैंकों में जिस प्रकार काम होते हैं, जो कार्यप्रणाली होती है उस पर मैं सबके साथ बैठ कर चर्चा करता था, अपने बैंक को इससे क्या फायदा होगा यह बताता था और सभी की सम्मति मिलने के बाद ही काम शुरू करता था।
मुझे कैजन का सिद्धांत बहुत पसंद है कि एक रात में कोई विकास नहीं होता। धीरे-धीरे मैंने छोटे-छोटे परिवर्तन करना, विकास करना शुरू किया।

टीजेएसबी बैंक ने विगत १५ वर्षों में अत्यधिक प्रगति की है। आपके अनुसार किस निर्णय के कारण यह प्रगति दिखाई देती है?

मेरे अनुसार पिछले १५ वर्षों में टीजेएसबी में अन्य बैंकों के विलीनीकरण के निर्णय के कारण हमारी प्रगति अधिक हुई है। सन २००७ में हमारे बैंक की १७-१८ शाखाएं थीं। तब १७ शाखाओं वाली सदगुरु जंगली महाराज को.ऑप. बैंक तथा ४ शाखाओं वाली नवजीवन सहकारी बैंक का हमारे बैंक में विलीनीकरण हुआ। इस निर्णय के कारण हमारी शाखाओं की संख्या दुगुनी हो गई और हमारा व्यवसाय भी एक-डेढ़ हजार करोड़ से बढ़ गया। रिजर्व बैंक के इतिहास में भी यह पहली घटना थी जब किसी १७-१८ शाखाओं वाली किसी बैंक में १७ शाखाओं वाली बैंक का विलीनीकरण हुआ हो। यहीं से हमारी बैंक की प्रगति प्रारंभ हुई। बैंकिंग क्षेत्र का विस्तार हुआ तथा हमारे व्यवसाय वृद्धि की गति भी तेज हुई।
आप विगत १५ वर्षों से बैंक से जुड़े हैं। कृपया बैंक की सकारात्मक और नकारात्मक बातों पर प्रकाश डालें।
बैंक में सकारात्मक बातें ही अधिक हैं। पॉलिसी मैटर में सकारात्मकता की बात करें तो बैंक के बाय-लॉज में ही यह तय किया गया है कि बैंक के संचालक दैनंदिन निर्णय प्रक्रिया में शामिल नहीं होंेगे। न वे बैंक से कर्ज लेंगे और न किसी को गारंटी देंगे। आरबीआई ने ये निर्णय २००१ में लिया परंतु हमने यह पहले ही तय कर लिया था। इसी प्रकार आरबीआई का एक और नियम है कि बोर्ड पर दो चार्टर्ड अकाउंटेंट होने आवश्यक हैं। हमारे बैंक की तो स्थापना ही चार्टर्ड अकाउंटेंट ने की है। तब से लेकर आज तक बोर्ड पर चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं ही। दूसरी सकारात्मकता दिखाई देती है हमारे स्टाफ में। हमारा स्टाफ उत्साहपूर्ण तरीके से काम करने वाला है। मैनेजमैंट के द्वारा लिए गए निर्णयों, दिए गए दिशानिर्देशों को सभी लोग मानते हैं। किसी स्कीम को ये लोग अपनी पूरी ताकत लगा कर चलाने की कोशिश करते हैं। ये दूसरे बैंकों में कम देखने को मिलता है।
एक और सब से बड़ी सकारात्मक बात है तकनीक। बैंक का विजनरी बोर्ड तकनीक को लेकर बहुत सक्रिय है। हमारे बैंक में एटीएम, कोअर बैंकिंग सॉल्यूशन, यूपीआई प्लेटफॉर्म का लेनदेन इत्यादि सभी अत्याधुनिक बैंकिंग व्यवहार हो रहे हैं। हमने कोअर बैंकिंग के लिए सर्वर लेते समय ही इस बात का ध्यान रखा था कि अगर हम आवश्यकता से थोड़ी अधिक क्षमता का सर्वर लेते हैं तो अन्य बैंकों को भी यह सुविधा दे सकते हैं। अब छोटी-बड़े मिलाकर लगभग ४० सहकारी बैंक इस सर्वर का उपयोग कर रहे हैं। मैनेजमेंट ने हमें काम करने के लिए एक खुला वातावरण प्रदान किया और तकनीक के क्षेत्र में हमेशा प्रगतिशील सोच रखी; इसे भी एक सकारात्मक पहलू कहा जा सकता है।

नोटबंदी के माहौल में बैंक की स्थिति कैसी थी?

बैंक की जो खास बात है वह है काम की पारदर्शिता। नोटबंदी के समय भी हमने आरबीआई को पहले दिन से सभी विवरण भेजे थे। ९ तारीख को हमने अपने सारे स्टाफ को इस परिस्थिति में कैसे काम करना है इसकी जानकारी दी थी। बैंक में कितना कैश जमा हो रहा है इसकी जानकारी मैं हर एक घंटे में डायरेक्टर्स को देता रहता था। हमें उस समय कम कैश मिल रहा था परंतु हमारा दृष्टिकोण उसे अधिक से अधिक लोगों में बांटना था। अत: हमने किसी को भी अत्यधिक कैश नहीं दिया। सभी को लगभग समान अनुपात में कैश दिया। साथ ही हमने विभिन्न माध्यमों से लोगों को यह बताने की कोशिश की कि सरकार का यह फैसला लोगों को तकलीफ देने के लिए नहीं है। मैंने स्वयं वेबिनार के माध्यम से संवाद साधा और लोगों को इस कदम की जानकारी दी।

आप स्वयं आर्थिक क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। नोटबंदी के बारे में आपके क्या विचार हैं?

नोटबंदी जिस उद्देश्य से की गई थी वह है काले धन पर रोक लगाना। काला धन वह धन है जो रिकॉर्ड में नहीं होता और सरकार को उससे कर प्राप्त नहीं होता। जिससे देश के विकास में रुकावट होती है। काला धान दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। अत: नोटबंदी जैसा ठोस कदम उठाना आवश्यक था। निश्चित रूप से इसका फायदा निकट भविष्य में देश को होगा ही।

ठाणे से शुरू हुई बैंक का विस्तार अब देश के विभिन्न राज्यों में हो गया है। इस विस्तार के पीछे कौन सी नीतियां कारगर साबित हुईं?

बैंकिंग क्षेत्र में खुली प्रतियोगिता है। आपको हर शहर में हर बैंक की शाखाएं मिलती हैं। अगर बैंक का विकास करना है, लाभ कमाना है, शेयरधारकों को अच्छा लाभ दिलाना है तो हमें अपना विस्तार करना ही होगा। यही सोचकर हमने बैंक को मल्टीस्टेट करने का निर्णय लिया। यहां भी हमने अपनी कार्यप्रणाली वही रखी कि लोगों को बैंक तक आने का मौका दिया। जो हमारे ग्राहक नहीं हैं वे बैंक में आएं और बैंक को समझ कर अपना खाता खोलें। हमारे इस प्रयास का हमें उचित परिणाम प्राप्त हुआ और बैंक का विस्तार होता गया।
ठाणे तथा महाराष्ट्र में बैंक की शाखाएं बढ़ाना, विस्तार करना आसान है परंतु दिल्ली तथा गुजरात जैसे राज्यों में यह चुनौती है। इसका सामना बैंक कैसे कर रहा है।
अवश्य ही यह बड़ी चुनौती है। परंतु हम अपने मूल्यों पर कायम है। मैंने जैसा कि शुरुआत में ही कहा कि हम टर्न अराउंड टाइम के मूल्य पर कार्य करते हैं। हम अपनी निर्णय प्रक्रिया में देर नहीं करते। अगर हमारा निर्णय नकारात्मक भी है तो ग्राहक को जल्दी ही पता चल जाता है। ग्राहकों के हित में सेवाएं देने के कारण लोगों का बैंक पर विश्वास बढ़ा है।

टीजेएसबी तकनीक पर अत्यधिक बल देता दीखता है। तकनीक के संदर्भ में किए गए आपके कौन-कौन से निर्णय कारगर साबित हुए?

हमारे बोर्ड का यह स्पष्ट मत है कि अगर बैंक को आगे बढ़ाना है तो हमें कालानुरूप तंत्रज्ञान तथा तकनीक को आत्मसात करना ही होगा। अत: हम हमेशा नई तकनीकों को बैंक में लाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। जैसे हमने कोअर बैंकिंग शुरू करते समय ऐसा हार्डवेयर लिया जिसका उपयोग अन्य छोटे बैंकों को भी हो सकता है जो इतना खर्च नहीं कर सकते। इसी तरह एटीएम होना, उसका पूरे देश में कहीं से भी पैसा निकालने हेतु लिंकिंग, आधार कार्ड को खाते जोड़ना, बिल पेमेंट आदि में हम सहकार क्षेत्र में अग्रणी रहे। यूपीआई प्लेटफॉर्म पर काम करने वाला टीजेएजबी एक मात्र सहकारी बैंक है।

यूपीआई प्लेटफॉर्म पर कार्य करने वाला ‘ट्रांजेप’ नामक एप टीजेएसबी ने बाजार में उतारा है। इसकी क्या विशेषताएं हैं?

२५ अगस्त २०१६ को ‘ट्रांजेप’ बाजार में आया। इसकी खास बात यह है कि १ रुपए से लेकर १ लाख रुपए तक आप मिनटों में कहीं भी पैसे भेज सकते हैं। केवल एक वर्चुअल आईडी के आप कई बैंकों के अकाउंट जोड़ सकते हैं। कलेक्ट रिक्वेस्ट इसकी एक और बड़ी खासियत है। जैसे दूधवाले, पेपरवाले जैसे छोटे व्यापारियों के लिए यह बहुत उपयोगी है जो घर-घर जाकर महीने के अंत में पैसे लेते हैं। उनकी मेहनत बच सकती है अगर वे अपने ग्राहकों को ट्रांजेप से जोड़ें। ग्राहक उनको ट्रांजेप पर ही ऑथोराइज्ड कर देंगे तो पैसा अपने आप दूधवाले, पेपरवाले आदि छोटे व्यापारियों के खाते में जमा हो जाएगा। इसका रिस्पॉंस भी बहुत अच्छा है। अभी तक हमारे ४० हजार ट्रांजेप रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं। यहां भी हमने महानगर के ग्राहकों की अपेक्षा छोटे शहरों के ग्राहकों की ओर ही अधिक ध्यान दिया है।

सरकार के द्वारा जनहित में कौन सी आर्थिक योजनाएं शुरू की गईं हैं? बैंक ने सरकार की किन योजनाओं को लागू करने के लिए प्रयास किए हैं?

बहुत सारी ऐसी योजनाएं जिनको हमने सरकार के आदेश आते ही लागू कर दिया था। जैसे आधार क्रमांक को खाते जे जोड़ना। जब इसके लिए सरकार की ओर से आदेश आए थे तो हमने बैंक के सभी ग्राहकों को फोन करके उनका आधार क्रमांक देने के लिए कहा था और जब गैस सब्सिडी खाते में जमा होने लगी तो ग्राहकों को इसका फायदा भी समझ में आ गया।

नोटबंदी के समय सहकार क्षेत्र में पैसों की अधिक हेराफेरी होने की आशंका जताई गई थी। सहकारी क्षेत्र के अग्रणी बैंक के रूप में आपका क्या दृष्टिकोण है?

मेरे विचार से जहां पैसों के लेन-देन की बात आती है वहां सच्चाई, ईमानदारी, भेदभाव विहीनता आदि बहुत महत्वपूर्ण होता है। नोटबंदी के समय जो हुआ उसके दूसरे पहलू पर मैं ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा कि हेराफेरी किसी भी बैंक में हो सकती है क्योंकि बैंक के साथ साथ यह व्यक्तिगत ईमानदारी का भी विषय है। अगर किसी राष्ट्रीयकृत बैंक या बड़े निजी बैंक के किसी कर्मचारी के द्वारा हेराफेरी करने का मामला आता है तो उसे बैंक के द्वारा व्यक्तिगत तौर पर कार्रवाई करके दबा दिया जाता है परंतु जब अगर सहकारी बैंक के किसी कर्मचारी द्वारा ऐसा कोई कार्य किए जाने पर पूरा सहकार क्षेत्र ही दोषी ठहराया जाता है।

सहकार की स्थापना का मूल उद्देश्य लोगों का कल्याण करना था परंतु आज इसमें राजनीति अधिक दिखाई देती है। आपका इस बारे में क्या मत है?

मेरा यह मानना है कि इसमें केंद्र सरकार की नीतियां अहम भूमिका निभाती हैं। नियम कानूनों को बहुत कड़ा करने की आवश्यकता है। अभी एक बहुत अच्छा कानून आया है कि कोई भी व्यक्ति २ बार अर्थात दस साल से अधिक चेयरमैन नहीं रह सकता। यह बहुत सकारात्मक कानून है। इस तरह के कुछ सख्त कानून लागू करने की आवश्यकता है।

क्या आपको ऐसा लगता है कि सहकारी बैंकों के संदर्भ में आरबीआई की भूमिका नकारात्मक है?

आरबीआई की भूमिका नकारात्मक नहीं है। हम अगर पूरे बैंकिंग क्षेत्र को देखें तो उसमें सहकार क्षेत्र केवल ३% है। अत: कई बार ऐसा लगता है जब पॉलिसी बनाई जाती है तो सहकार की ओर ध्यान नहीं दिया जाता। अत: ऐसा लगता है कि आरबीआई की भूमिका नकारात्मक है। परंतु ऐसा नहीं है। आरबीआई ने सहकारी बैंकों के लिए कुछ मानक निर्धारित किए हुए हैं। जैसे बैंक को हर साल लाभ होना चाहिये, ग्रॉस एनपीए ७% से कम हो आदि। उनके दिए हुए मानकों पर अगर कोई सहकारी बैंक खरा उतरता है तो उसे आरबीआई की ओर से हर तरह का सेंक्शन मिलेगा। जो बैंक इसे पूरा नहीं कर पाते वे आरबीआई को नकारात्मक कहते हैं। मेरा मानना है इन मानकों के कारण एक स्वस्थ प्रतियोगिता शुरू हुई है। ये मानक भी बहुत मुश्किल नहीं हैं।

सहकार क्षेत्र और आरबीआई में समन्वय स्थापन करने के लिए किन बातों पर ध्यान देना आवश्यक है?

सहकार क्षेत्र का नियंत्रण दो हाथों में है। पहला है रजिस्ट्रार ऑफ को-ऑपरेटिव सोसायटी का और दूसरा आरबीआई का। इसके कारण लोगों में थोड़ी दुविधा की स्थिति है। यह नियंत्रण किसी भी एक के हाथ में अगर आ जाए तो शायद अधिक अडचनें नहीं होंगी।

नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद क्या आपको लगता है कि बैंकिंग क्षेत्र में अच्छे दिन आ गए हैं?

अच्छे दिन आना कोई जादू नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम परिस्थितियों को कैसे देखते हैं। यह किसी एक के करने से नहीं होगा। वे जो पॉलिसी लाते हैं, योजनाएं लाते हैं उन पर जब सभी मिलकर काम करेंगे तो लगेगा कि अच्छे दिन आ रहे हैं। मैं हमेशा एक उदाहरण देता हूं- लोगों को टैक्स भरना ही चाहिए। हम लोग जब अपनी आय के हिसाब से व्यय और बचत का हिसाब रखते हैं परंतु सरकार का गणित उलटा होता है। वहां विकास कार्यों में होने वाला खर्चा पहले तय किया जाता है और उसके हिसाब से आय जुटानी होती है। ये आय हमारे द्वारा भरे गए कर से प्राप्त होती है। अत: अगर विकास करना है, अच्छे दिन चाहिए तो टैक्स जरूर भरना चाहिए।

टीजेएसबी बैंक में अच्छे दिन लाने के लिए बैंक ने कर्मचारियों के हित में क्या प्रयास किए हैं?

हम हर साल हमारे बैंक के कर्मचारियों के लिए स्पोर्ट का आयोजन करते हैं। इस वर्ष हमने कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया था जिससे कर्मचारियों के अंदर छिपी अलग-अलग प्रतिभाएं लोगों के सामने आ सकें। बैंक के बाहर होने वाली खेल प्रतियोगिताओं में भी अगर हमारे कर्मचारी भाग लेना चाहते हैं तो हम उन्हें प्रोत्साहित करते हैं। कर्मचारियों का बैंकिंग का काम अच्छा होने पर उन्हें विशेष इंसेंटिव दिया जाता है जैसा हमने नोटबंदी के दौरान दिया था।

भविष्य में बैंक सफलता के किस पायदान पर होगी?

मेरा पसंदीदा बोधवाक्य है work works अर्थात आपका काम ही काम करता है। मेरा सपना है कि टीजेएसबी बैंक डिजिटल बैंक के रूप में पहचाना जाए तथा आने वाले ५ सालों में देश के सभी प्रमुख शहरों में हमारी शाखाएं हों।

साक्षात्कार के दौरान यह महसूस हुआ कि आप बैंक के कर्मचारियों के सुखदुख में सम्मिलित होते हैं। प्रत्येक कर्मचारी से सीधा संवाद करना कैसे संभव होता है?

मेरी विशेषता यही है ‘work works’। मैं स्वयं सुबह ९ से रात ९ तक ऑफिस में बैठता हूं। जिससे किसी को भी अगर मेरी जरूरत हो तो मैं उपलब्ध होता हूं। मेरे ऑफिस के उच्च अधिकारी से लेकर निम्न श्रेणी के कर्मचारी तक सभी मुझ से सीधा सम्पर्क कर सकते हैं। इसी तरह ग्राहक भी मुझ से मिल सकते हैं।

बैंक के विकास में संचालकों के योगदान के बारे में जानकारी दें।
हमारा बोर्ड ऑनररी है। वे अपने अन्य कामों के साथ बैंक का काम करते हैं। बैंक का विकास ही उनका एकमात्र लक्ष्य होता है। सभी लोग इस काम को अपनी जिम्मेदारी के रूप में निभाते हैं। सभी कार्यकर्ता के रूप में काम करते हैं।

आज जब आप अतीत की ओर देकते हैं तो बैंक के सफर को लेकर आपके मन क्या विचार आते हैं?

मैं यही सोचता हूं कि हमारे पहले जिन लोगों ने बैंक को इस मकाम तक पहुंचाया है उसे मुझे आगे ले जाना है। उन लोगों ने जिस गति से काम किया है उसी तरह हमें काम करना है और बैंक की अधिक से अधिक प्रगति की ओर अपना ध्यान केंद्रित करना है।

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