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संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार द्वारा महाराष्ट्र के बाहर भेजे गए तीन प्रचारकों में से मोरुभाऊ मुंजे एक थे। उन्होंने संघ में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया। उनका कार्य आज भी स्वयंसेवकों के लिए एक मिसाल है।

मोरेश्वर राघव उपाख्य मोरुभाऊ मुंजे को पूजनीय डॉ. हेडगेवार द्वारा महाराष्ट्र के बाहर भेजे गए पहले तीन प्रचारकों में से एक होने का गौरव प्राप्त है।
१८ नवम्बर, १९१६ को महाराष्ट्र के वर्धा जिले के पवनार ग्राम में जन्मे श्री मोरुभाऊ को ११ वर्ष की आयु में शिक्षा की लालसा नागपुर ले आई। अपने घर से भोसला वेदशाला जाते समय उन्होंने मोहिते का बाडा देखा। वहां शाम को कुछ युवक खेल रहे थे। दूसरे दिन भी मोरुभाऊ वहां गए तो एक वयस्क व्यक्ति ने उन्हें भी खेलने के लिए बुलाया। वह व्यक्ति स्वयं संघ निर्माता डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार थे। इस प्रकार उनका संघ प्रवेश हुआ। वह शीघ्र ही डॉक्टर जी के प्रिय बन गए।

पुणे की प्रसिद्ध चित्रशाला प्रेस के संचालक एवं ज्येष्ठ स्वयंसेवक श्री वसंतराव देवकले ने श्री मोरुभाऊ को दिनांक १७.१०.७७ को भेजे पत्र में उन्हें लिखा था-पू. डॉक्टर जी आपको बहुत चाहते थे। स्थान-स्थान पर आपकी कहानी बताते थे। आप जैसा एक निष्ठावान स्वयंसेवक शाखा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

१९३२ में श्री मुंजे के गणशिक्षक श्री गोपालराव येरमुंटवार प्रचारक के रूप में सांगली भेजे गए, उन्हें लेने श्री काशीनाथ पंत लिमये नागपूर आए थे। उस विदाई समारोह में १६ वर्षीय मोरुभाऊ मुंजे के मन में विचार आया कि उन्हंें भी प्रचारक बनाना चाहिए। सन १९३७ में उन्होंने सिटी नागपुर से इंटर की परिक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद पूजनीय डॉक्टर जी ने महाराष्ट्र के बाहर भेजने जाने वाले तीन प्रचारकों में से एक के रूप में श्री मोरुभाऊ का चयन किया। पंजाब में खासकर नाम से कट्टरवादी मुसलमानों का संगठन कार्य कर रहा था। अत: सब से पहले पंजाब में पूर्णकालिक कार्यकर्ता भेजने का निश्चय हुआ। तदनुसार तीन स्वयंसेवक- यथा मोरुभाऊ मुंजे, राजाभाऊ पातुरकर और कृष्णाजी जोशी लाहौर भेजे गए। राजाभाऊ पातुरकर का कार्यक्षेत्र लाहौर तय किया गया, कृष्णाजी जोशी का सियालकोट तथा मोरुभाऊ का रावलपिंडी।

मोरुभाऊ ने जिन क्षेत्रों में संघ कार्य प्रारंभ किया वहां जनसंख्या में मुसलमानों का प्रतिशत बहुत अधिक -रावलपिंडी ८०%, गुजरांवाला ७०.४%, शेखुपुरा ६२.६%, झेलम ८९.५%, डेरागाजीखान ८८.९%- था।

दो बार मुस्लिम कट्टरपंथियों ने मोरुभाऊ पर सशस्त्र हमला किया था लेकिन दोनों बार वह शक्ति तथा यिुक्त से अपना बचाव करने में सफल रहे। मोरुभाऊ तथा अन्य प्रचारकों ने १९३७ में पंजाब में जो कार्य प्रारम्भ किया था उसके परिणामस्वरूप १९४७ में देश के विभाजन के समय पंजाब में स्वयंसेवकों की संख्या ४७००० हो गई थी जिसके कारण बड़ी संख्या में शरणार्थी सुरक्षित भारत पहुंच सके।

मोरुभाऊ का कार्य क्षेत्र १९४१ में रायपुर किया गया। वर्तमान छत्तीसगढ़ प्रांत में उन्होंने संघ कार्य प्रारम्भ किया। १९४३ में उन्हें जबलपुर भेजा गया। वह १९४३ से १९४५ तक जबलपुर में प्रचारक थे। पारिवारिक कारणों से वे १९४५ में पूर्णकालिक प्रचारक के कार्य से मुक्त हो गए। १९४६ में वे जबलपुर के महाराष्ट्र विद्यालय में शिक्षक बने। इसी वर्ष उनका कुमुद अभ्यंकर से विवाह हुआ। गांधी जी की हत्या के बाद ४ फरवरी १९४८ को वे बंदी बनाकर जबलपुर के केंद्रीय कारागार में रखे गए। ७ माह बाद उन्हें रिहा किया गया। पश्चात संघ पर लगा प्रतिबंध हटे इसलिए उन्होंने सत्याग्रह किया।

वह उसी दिन फिर से बंदी बनाए गए। अन्य सत्याग्रही लगभग एक माह में रिहा किया गए लेकिन मोरुभाऊ को ७ जुलाई १९४९ को रिहा किया गया।
प्रचारक पद से मुक्त होने पर भी वह आजीवन संघ स्वयंसेवक बने रहे। उन्होंने संघ में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया।
सेवानिवृत्ति के पश्चात मोरुभाऊ कुछ वर्षों के लिए फिर से संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बने। उन्हें संभाग प्रचारक बनाया गया। मोरुभाऊ ‘डॉक्टर हेडगेवार स्मृति मंडल, जबलपुर’ के संस्थापक सदस्य एवं अनेक वर्षों तक उसके अध्यक्ष रहे। उन्होंने डॉक्टर हेडगेवार स्मृति व्याख्यानों का आयोजन किया।
अयोध्या में आपने कार सेवा में भाग लिया था। आंदोलन की व्यवस्था हेतु बाद में वे चार माह मनीराम छावनी अयोध्या में रहे थे।
मोरुभाऊ विश्व हिंदू परिषद में प्रदेश कोषाध्यक्ष और बाद में प्रदेश मंत्री थे। ८० वर्ष की आयु में आपने डॉक्टर हेडगेवार स्मृति मंडल जबलपुर अंतर्गत रुग्णवाहिका तथा शव वाहन के संचालन हेतु धन संग्रह किया था।
माननीय हो. वे. शेषाद्रि की सूचना पर ८४ वर्ष की आयु होने पर भी एक सप्ताह बेंगलुर का प्रवास करके वहां पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार का जीवन चरित्र तथा संघ का प्रारंभिक इतिहास कथन किया था।
९१ वर्ष की आयु में हृदयाघात से इस आद्य प्रचारक का ८ दिसम्बर २००७ को निधन हुआ।

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