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उपवास, सत्याग्रह, आंदोलन, धरना, प्रदर्शन राजनीतिक दृष्टि से तात्कालिक तौर पर तो लाभकारी हो सकते हैं, किन्तु सही मायने में इससे किसानों का कोई बड़ा हित या दीर्घकालिक लाभ शायद ही हो पाए। एक प्रयास जो सबसे ज्यादा जरूरी है वह है मौसम, पूंजी और सरकार पर किसानों अर्थात कृषि की निर्भरता कम करना।

किसानों का आंदोलन हुआ। आंदोलन के नाम पर हिंसा, आगजनी और उपद्रव भी हुआ। आंदोलन और किसानों की मांगें कहीं बहुत पीछे छूट गईं। बची रह गईं सिर्फ राजनीति। किसानों को छोड़, किसान नेता अपनी मांगें, महत्वाकांक्षाएं और राजनीतिक भयादोहन (ब्लैकमेलिंग) की रणनीति बनाने में जुट गए। हिंसक, स्वार्थी, अराजक और असामाजिक तत्त्वों ने किसानों को बदनाम किया, उनके आंदोलन पर पानी फेर दिया।
अन्नदाता, जीवनदाता क्या जानलेवा हो सकता है? वह मध्यप्रदेश का हो या देश के किसी हिस्से का, वह अपनी मेहनत की, खून-पसीने की कमाई सड़कों पर फेंक नहीं सकता। लेकिन मीडिया ने फल-सब्जी, दूध, आलू-प्याज को सड़कों पर फेंकते दिखाया। बसों, पेट्रोल पम्पों और निजी वाहनों को आग लगाते, धूं-धूं कर जलते दिखाया। आंदोलन तो कई बार हुए, लेकिन मध्यप्रदेश में ऐसा पहली बार हुआ। किसान आंदोलन के नाम पर किसानों और मध्यप्रदेश को हुई आर्थिक क्षति का आंकलन किसी के पास नहीं है।

दरअसल महाराष्ट्र से शुरू हुआ आंदोलन जब मध्यप्रदेश पहुंचा तो शांतिपूर्ण था। लेकिन इस आंदोलन के पीछे कोई एक संगठन या कोई एक नेता नहीं था। चूंकि मध्यप्रदेश देश के केंद्र में है, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात से घिरा है और हरियाणा, पंजाब जैसे कई राज्यों से प्रभावित है इसलिए यहां के किसी भी आंदोलन पर इन राज्यों का प्रभाव भी स्वाभाविक है। इस बार किसान आंदोलन पर इन राज्यों का नकारात्मक प्रभाव देखा गया।

किसान नेताओं ने आरोप लगाया कि किसानों को आजादी के बाद से छला जा रहा है। सरकारें किसानों के साथ उचित व्यवहार नहीं करती। वर्तमान केंद्र और मध्यप्रदेश की सरकार पर यह भी आरोप लगा कि वे उद्योगपतियों की चिंता करती हैं, किसानों की नहीं। विपक्ष ने भी सरकार और भाजपा पर आरोपों की झड़ी लगा दी। किसानों की समस्याओं और उनकी मांगों से नजरें फेर कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में लगे रहे। कांग्रेस के कई जिम्मेदार नेता लोगों को हिंसा, आगजनी और तोड़फोड़ के लिए उकसाते धरे गए। मीडिया ने भी नकारात्मक कृत्यों को ही ज्यादा तवज्जो दी। वे हिंसा और आगजनी को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते रहे। कांग्रेस के आरोपों को दिखाते-सुनाते रहे। इसकी बजाय यह ज्यादा उचित होता कि मीडिया हिंसा-आगजनी को रोकने, शांति बहाली और विभिन्न पक्षों के बीच संवाद स्थापित करने में साधक बनता।

इसमें कोई दो राय नहीं कि देश का किसान समस्याग्रस्त है। यह भी सही है कि आर्थिक नीतियां किसानों के हक़ के अनुकूल नहीं रही हैं। लेकिन जो ७० वर्षों में हुआ है, वह दो-चार साल में पलट नहीं सकता। आर्थिक नीतियां उदारीकरण और पूंजीपतियों के पक्ष में हैं। किसानों की चिंता उतनी नहीं है जितनी होनी चाहिए। सत्ताधारी दल और विपक्ष का व्यवहार राजनीतिक ज्यादा है, समाधानकारक कम। यह भी सच है कि राजनीतिक दल किसानों की समस्याओं, उनकी मांगों और उनकी भूमिका के प्रति ईमानदार नहीं हैं। नीतियां उद्योगों और नगरीकरण के अनुकूल हैं, खेती-किसानी के प्रति दोयम सोच और बर्ताव है। लेकिन इन समस्याओं और चुनौतियों का क्या यह सम्यक समाधान है जो गत दिनों मध्यप्रदेश में हुआ या कुछ समय पूर्व गुजरात और हरियाणा में हुआ? हिंसा, आगजनी, उपद्रव या संसाधनों का नुकसान क्या समस्या के समाधान का वाजिब तरीका है?

भारत ही नहीं, दुनिया का किसान, मजदूर, गरीब और हाशिए का व्यक्ति समस्याओं के दुष्चक्र में घिरा है। इससे निकालने का उपाय आसान नहीं है। किसानों की समस्याएं सिर्फ आर्थिक नहीं हैं। किसानों के प्रति शासन और प्रशासन की सोच भी चिंताजनक है। कोई दल चाहे भी तो किसानों की समस्याओं का समाधान आसान नहीं। उसे पहले सरकार में आना होता है, सरकार में रहना होता है। इतना होने के बाद ही सत्ताधारी दल नीतियां और योजनाएं बनाता है। इन योजनाओं को कार्यक्रमों का रूप देना होता है। सबसे बड़ी विडम्बना यही है कि इन नीतियों, योजनाओं और कार्यक्रमों का क्रियान्वयन प्रशासनिक व्यवस्था के द्वारा किया जाता है। यह प्रशासनिक व्यवस्था स्थायी है, जबकि राजनीतिक व्यवस्था परिवर्तनशील और अल्पकालिक। हर पांच साल के बाद दलों को सरकार बनाने लायक बहुमत जुटाने की चुनौती बनी रहती हैं। नीतियों को अपने अनुकूल बनाने के लिए पूंजीपतियों, औद्योगिक घरानों का दबाव और प्रपंच हमेशा सरकार और दलों के इर्द-गिर्द ही रहता है। नौकरशाही या प्रशासन कमजोर या वंचितों के प्रति असंवेदनशील ही होता आया है। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील राजनीतिक दल के लिए एक बड़ी चुनौती है।

बहस, वाद-विवाद और आरोप-प्रत्यारोप अलग बात है। लेकिन समस्याओं और चुनौतियों के बरक्श समाधान तलाश कर उसे अमलीजामा पहनाना अलग बात। किसानों को समस्याओं का समाधान चाहिए और उन्हें समस्याओं के दुष्चक्र से बाहर आना है तो उन्हें सरकार ही नहीं हर उस राजनीतिक प्रपंच को समझना होगा जो उन्हें छलता है। प्रशासन को संवेदनशील बनाने का हर संभव प्रयास सभी को करना होगा। योजनाओं और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए प्रशासन पर चहुंओर से दबाव होना चाहिए। निश्चित तौर पर सत्ताधारी दल इसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है। लेकिन विपक्ष सिर्फ विरोध या आरोपों के कर्मकांड से अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री नहीं कर सकता। कांग्रेस लम्बे अरसे तक सत्ता में रही है। भले ही कांग्रेस स्वीकार करे या नहीं लेकिन किसानों की अच्छी-बुरी हालत के लिए वही जिम्मेदार है। उसे यश-अपयश दोनों मिला है। अब भाजपा केंद्र और कई राज्यों में सत्ता में है। जनता की अपेक्षाएं और भरोसा भाजपानीत एनडीए के साथ है। सरकार को हर हाल में किसानों को समस्या रहित करने की दिशा में प्रयास करना ही होगा।

मोटे तौर पर किसानों की मुख्य समस्या खेती-किसानी की लागत बढ़ना, उत्पादन का लाभकारी मूल्य न मिलना, खेती लाभ की बजाय हानि का व्यवसाय होना, उत्पाद के संरक्षण और विपणन की समुचित व्यवस्था न होना है। किन्तु गत वर्षों में किसानों का भी वर्गीकरण हो गया है। अब उच्च, मध्यम और सीमांत किसानों का वर्ग विकसित हो गया है। यह अध्ययन का विषय है कि किसानों के लिए सरकारी योजनाओं का लाभ किसानों के किस वर्ग को मिल रहा है। किसानों के लिए सब्सिडी, सस्ती बिजली, कम ब्याज पर कर्ज, किसान क्रेडिट कार्ड, फसल बीमा जैसी अनेक योजनाएं लागू की गई हैं। कम या ज्यादा लेकिन इनका लाभ किसानों को मिल ही रहा है। लेकिन यह सवाल भी पूछा जाना वाजिब होगा कि इन योजनाओं का लाभ जरूरतमंद किसानों को मिल रहा है या संपन्न और अभिजात्य किसान ही सारा लाभ हड़प जाते हैं और सीमांत किसान बेचारा ही रह जाता है।

गत वर्षों में भूमि की कीमतें बेतहाशा बढ़ी हैं। अधिक जमीन वाले किसानों ने महंगी कीमत पर अपनी जमीनें बेचकर खेती की बजाय व्यापार और अन्य धंधे अपना लिए हैं। बड़े किसान राजनीति, व्यापार और रियल स्टेट में प्रभावी भूमिका में हैं। ये राजनेता, व्यापारी और रियल स्टेट जैसे व्यवसायी भी किसान बनकर ऋण लेते हैं, डिफाल्टर बनते हैं। कृषि ऋण का एक बड़ा हिस्सा इस तरह के छद्म किसानों का भी है। इसे भी गहराई से समझने की जरूरत है।

मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन को समाप्त करने के लिए जहां भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उपवास पर बैठे, वहीं भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने भी इंदौर (मालवा क्षेत्र) में मोर्चा सम्भाला। किसान संगठनों के प्रतिनिधियों और आम किसानों ने लाभकारी मूल्य दिलाने, दूध की कीमत बढ़ाने, स्वामीनाथन समिति की सिफारिशें लागू करने, नौकरशाही के दुष्चक्र से मुक्ति दिलाने, कर्जमुक्त करने आदि की मांग रखी। भाजपा महासचिव विजयवर्गीय को कहना पड़ा कि नौकरशाही के कारण ही किसान आंदोलन को विवश हुए। किसान आंदोलन में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण प्रसंग हिंसा और उपद्रव है। कांग्रेस की भूमिका नकारात्मक और विध्वंसात्मक रही। किसी भी नेता ने किसानों की मांगों को महत्व नहीं दिया, शांति की अपील नहीं की, बल्कि आंदोलन को उग्र करने में ही अपना समय लगाया। कांग्रेस की आतंरिक राजनीति, किसानों का हमदर्द की छवि बनने की मजबूरी में महाराजा ज्योतिरादित्य सिंधिया ने किसान सत्याग्रह किया है। राजनीतिक विश्लेषकों ने इस सत्याग्रह को सत्ताग्रह का नाम दिया है। कांग्रेस के लिए यह चुनावी तैयारी और कांग्रेस में पद की दावेदारी है।

स्थितियों को देखते हुए केंद्र और मध्यप्रदेश की सरकार ने कई निर्णय लिए हैं। केंद्रीय कैबिनेट ने तीन लाख तक का कर्ज लेने वाले किसानों को राहत पहुंचाने के लिए सरकार की ब्याज सब्सिडी स्कीम को एक साल और बढ़ाने का फैसला किया है। इस योजना के तहत तीन लाख तक का कर्ज लेने वाले किसानों के ब्याज का बोझ कम करने के लिए सरकार ५ फीसदी ब्याज के बोझ का वहन करती है। इसके अलावा किसानों को फसल कटाई के बाद अपनी उपज के भंडारण के लिए भी सात फीसदी की सस्ती दर पर कर्ज उपलब्ध होगा। यह व्यवस्था छह माह के लिए होगी। प्राकृतिक आपदा से प्रभावित किसानों को राहत पहुंचाने के लिए सरकार ने उनकी पुनर्गठित कर्ज राशि पर पहले साल के ब्याज पर दो प्रतिशत ब्याज सहायता देने का फैसला किया है।

इसी प्रकार मध्यप्रदेश शासन ने भी कैबिनेट की बैठक में यह निर्णय किया है कि कृषि उपज का लागत मूल्य निर्धारित करने और उन्हें लाभकारी मूल्य दिलाने के लिए कृषि लागत एवं विपणन आयोग बनाने, एक हजार करोड़ रूपये का कृषि मूल्य स्थिरीकरण कोष बनाने, किसान बाजार का निर्माण करने, ८ रूपये प्रति किलो की दर से प्याज, ५०५० रूपये प्रति क्विंटल की दर से अरहर और ५२२५ रूपये प्रति क्विंटल की दर से मूंग खरीदी और किसानों को अधिकाधिक नकद भुगतान दिलाने का प्रयास का निर्णय लिया है। केंद्र और मध्यप्रदेश की सरकार लगातार किसान हितैषी घोषणाएं और निर्णय कर रही हैं। लेकिन सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन घोषणाओं और निर्णयों का क्रियान्वयन है। किसी भी दल का शासन हो, क्रियान्वयन एजेंसी प्रशासनिक अमला ही होता है। इस अमले को किसान हितैषी, संवेदनशील और किसानोन्मुख बनाना भी आसान काम नहीं है। भाजापा सरकार के लगातार प्रयासों के बावजूद भी इसमें पूर्ण सफलता नहीं मिल पाई है। उपवास, सत्याग्रह, आंदोलन, धरना, प्रदर्शन राजनीतिक दृष्टि से तात्कालिक तौर पर तो लाभकारी हो सकते हैं, किन्तु सही मायने में इससे किसानों का कोई बड़ा हित या दीर्घकालिक लाभ शायद ही हो पाए। एक प्रयास जो सबसे ज्यादा जरूरी है वह है मौसम, पूंजी और सरकार पर किसानों (कृषि) की निर्भरता कम करना। बाजार और विपणन व्यवस्था को किसानों के अनुकूल बनाना। कृषि लागत को कम करना, कृषि आधारित उद्यम को प्रोत्साहित करना। कृषि के साथ उसके सहयोगी व्यवसाय जैसे – पशुपालन, मुर्गी पालन, मछली पालन आदि को प्रोत्साहित करना ताकि विषम परिस्थितियों में इन व्यवसायों से प्राप्त आमदनी सहारा बन सके। कृषि लाभ का व्यवसाय बने, इससे ज्यादा जरूरी है कृषि हानि का धंधा न बने।

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