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सऊदी अरब के नेतृत्व में कई अरब देशों ने कतर के साथ राजनीतिक सम्बंध तोड़ दिए हैं। ये पूरे देश अमेरिकी समर्थक रहे हैं। अतः इसे अमेरिकी लॉबी में फूट माना जा रहा है। इससे मध्यपूर्व में नए समीकरण बनेंगे। इसके परिणाम घातक ही होंगे। अप्रवासी भारतीयों के समक्ष नौकरी का संकट पैदा हो सकता है और कतर से होनेवाली गैस आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

मध्यपूर्व अर्थात खाड़ी देश हमेशा अशांत रहते हैं। खाड़ी देशों का इतिहास ही रहा है कि वहां हमेशा लड़ाइयां होती रहती हैं। वे एक दूसरे के खिलाफ लड़ते अवश्य हैं। न कोई मिला तो दो सम्प्रदाय आपस में भिड़ते हैं। यह भी न बना तो एक देश में ही लोग आपस में झगड़ते रहते हैं। इसे आप गृहयुद्ध कह सकते हैं। जब तेल नहीं था, तब पानी व भूख अर्थात गरीबी उन्हें आपस मे लड़वाती थी, अब तेल व गैस आने से आर्थिक सम्पन्नता उन्हें लड़वा रही है। गरीबी वे सह नहीं पाते थे और अब सम्पन्नता पचा नहीं पा रहे हैं। इसी कारण वे महाशक्तियों की कठपुतलियां बन चुके हैं।

हाल में खाड़ी में उत्पन्न नया संकट इसका गवाह है। सऊदी अरब से लगे और फारस की खाड़ी से सटे छोटे से परंतु अमीर देश कतर से उनके ही अरब साथियों ने राजनयिक सम्बंध तोड़ दिए हैं। सऊदी अरब के नेतृत्व में खाड़ी सहयोग संगठन (जीसीसी) के देशों- संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, मिस्र, लीबिया (तोब्रुक), यमन, मॉरिटियाना, कोमोरोस, सोमालीलैण्ड और मालदीव ने कतर मध्यपूर्व अर्थात खाड़ी देश हमेशा अशांत रहते हैं। खाड़ी देशों का इतिहास ही रहा है कि वहां हमेशा लड़ाइयां होती रहती हैं। वे एक दूसरे के खिलाफ लड़ते अवश्य हैं। न कोई मिला तो दो सम्प्रदाय आपस में भिड़ते हैं। यह भी न बना तो एक देश में ही लोग आपस में झगड़ते रहते हैं। इसे आप गृहयुद्ध कह सकते हैं। जब तेल नहीं था, तब पानी व भूख अर्थात गरीबी उन्हें आपस मे लड़वाती थी, अब तेल व गैस आने से आर्थिक सम्पन्नता उन्हें लड़वा रही है। गरीबी वे सह नहीं पाते थे और अब सम्पन्नता पचा नहीं पा रहे हैं। इसी कारण वे महाशक्तियों की कठपुतलियां बन चुके हैं।

सऊदी अरब के नेतृत्व में खाड़ी सहयोग संगठन (जीसीसी) के देशों- संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, मिस्र, लीबिया (तोब्रुक), यमन, मॉरिटियाना, कोमोरोस, सोमालीलैण्ड और मालदीव ने कतर से सम्बंध विच्छेद कर दिए हैं। इनमें यूएई, मिस्र ही प्रमुख देश हैं। लीबिया तो तीन टुकड़ों में बंटा है और इसमें से एक टुकड़े पर तोब्रुक की सत्ता है। यह सऊदी प्रभाव वाला हिस्सा है। यमन पर हमला कर सऊदी ने वहां अपनी कठपुतली सरकार बनाई है। इसलिए यमन के समर्थन के कोई माने नहीं हैं। वहां के हौथी उनके साथ नहीं हैं। मॉरिटियाना, कोमोरस, सोमालीलैण्ड अफ्रीकी खंड से जुड़े हैं और इतने छोटे हैं कि सऊदी का समर्थन करने के अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। आश्चर्यजनक है, इस संकट में मालदीव का कूद पड़ना। कभी भारत की मदद पर निर्भर यह देश अब सऊदी से निकटता पा रहा है और मुस्लिम होने के नाम पर रियायतें ऐंठ रहा है। अमेरिका की शह पर यह कार्रवाई की गई है।

अमेरिका के दुश्मन ईरान के साथ कतर के रिश्ते बन रहे हैं इसलिए अमेरिका उससे नाराज है। ईरान से कतर के अच्छे रिश्ते बनना सऊदी अरब को भी पसन्द नहीं है। सऊदी के पास विश्व का सब से बड़ा तेल भंडार है, जबकि कतर के पास सबसे बड़ा तरल प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का भंडार। ईरान में भी तेल प्रचुर मात्रा में है। इस तरह ईरान और कतर एक हो गए तो खाड़ी में तेल और गैस के मामले में वे सऊदी को संकट में डाल देंगे। सऊदी को संकट में डालने का मतलब है अमेरिका के खाड़ी के सहयोगी देशों को संकट में डालना। अक्सर इस्लाम के दो पंथों- शिया और सुन्नी- में लड़ाइयां होती रहती हैं। लेकिन यहां तो सऊदी और कतर दोनों वहाबी हैं। दोनों इस्लाम के कट्टरवाद के समर्थक हैं। एक ही धार्मिक विचारधारा के दो लोगों के बीच जब संघर्ष होता है तब वह अमूमन आर्थिक ही होता है। स्वार्थ से जुड़ा होता है। इस मामले में भी सऊदी और कतर दोनों के आर्थिक हित आपस में टकरा रहे हैं।

यह भी आश्चर्यजनक लग सकता है कि कतर में तो अमेरिका का सब से बड़ा फौजी अड्डा है, फिर अमेरिका कतर के खिलाफ क्यों खड़ा हो गया? इसके पीछे भी अमेरिका के आर्थिक हित ही हैं; क्योंकि कतर-ईरान गठजोड़ के माध्यम से अमेरिका फारस की खाड़ी पर अपना वर्चस्व खोना नहीं चाहता। कतर का फौजी अड्डा हटाया भी जा सकता है क्योंकि सऊदी लगा हुआ ही है या अन्य किसी स्थान पर वह स्थानांतरित हो सकता है। इससे अमेरिका को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ेगा। इससे नुकसान कतर का ही हो सकता है। वहां तो जीवनावश्यक वस्तुओं का तुरंत टोटा पड़ जाएगा; क्योंकि उसे उपलब्ध एकमात्र जमीनी मार्ग सऊदी होकर ही जाता है। ८० फीसदी चीजें उसे इसी मार्ग से मिलती हैं। उसका समर्थक ईरान खाड़ी के दूसरे छोर पर है। ईरान को इस तरफ आने के लिए खाड़ी पार करनी होगी। रूस कतर के साथ है; लेकिन वह भी काफी दूर है। तुर्की आज भले कतर का साथ दे रहा हो परंतु वह भी पलट सकता है। कुवैत इस संकट में तटस्थ भूमिका निभा रहा है; मध्यस्थता की कोशिश कर रहा है, लेकिन लड़ाई की स्थिति में कुवैत उसके साथ कभी नहीं आएगा। निष्कर्ष यह है कि फारस की खाड़ी के जिस दक्षिणी तट पर कतर है, उस तट के लगभग सारे देश उसके विरोध में खड़े हो गए हैं। उत्तरी तट पर उसका एकमात्र मित्र ईरान है।

कतर ने १२ वर्ष बाद पहली बार इस वर्ष अप्रैल में ईरान के साथ गैस फील्ड विकसित करने का समझौता किया है। यह विश्व का सब से बड़ा गैस फील्ड है। कतर अब तक सऊदी का अनुगामी देश रहा है। वह इस तरह स्वयंनिर्णय करे, यह सऊदी को कतई मंजूर नहीं है। कतर के इस संघर्ष के तात्कालिक कारण अब भी बहुत स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन न्यूयार्क टाईम्स के अनुसार इस वर्ष अप्रैल में कतर का इराक और सीरिया के सुन्नी और शिया दोनों बागियों के साथ हुआ समझौता कारण बना है। इस समझौते के पीछे दो कारण थे। एक- पिछले १६ माह से बंधक बनाकर रखे २६ कतरी नागरिकों को शियाओं से मुक्त कराना और दूसरा- सीरिया में शिया और सुन्नी दोनों बागियों से दोस्ती कर वहां से नागरिकों को बाहर करना। इससे सीरिया के अकेले मदाया गांव से २००० लोगों को बचाया गया। सऊदी अरब व यूएई का कहना है कि इस समझौते में कतर ने शिया बागियों को ७०० मिलियन ऑलर की रकम अदा की। ईरान और मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थकों को हथियार दिलवाने का भी कतर पर आरोप है। तालिबान का सम्पर्क कार्यालय कतर की राजधानी दोहा में है, जिस पर कतर का कहना है कि अमेरिका के कहने पर ही खोला गया था, लेकिन अब अमेरिकी दोहरी चाल चल रहे हैं।

इससे पूर्व भी कतर और अन्य अरब देशों के बीच तनातनी चलती रही है। उस समय भी कतर पर दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का आरोप लगाया गया था। लेकिन यह गतिरोध दस माह में ही दूर हो गया। लेकिन इस बार की गुत्थी जल्दी सुलझने की उम्मीद नहीं है। अमेरिका ने भी हस्तक्षेप से हाथ खींच लिए हैं। वैसे भी राष्ट्रपति ट्रम्प सनकी व्यक्ति माने जाते हैं। उनकी सऊदी यात्रा के बाद ही खाड़ी में यह बवंडर खड़ा हो गया।

कतर से राजनयिक सम्बंध तोड़ देने से अरब देशों में मौजूद कतरी नागरिकों के लिए संकट पैदा हो गया है। उन्हें तुरंत अपने देश लौटना होगा। इससे कई के पारिवारिक रिश्ते बिगड़ जाएंगे, कई की नौकरी चली चला जाएगी, कई को बीच में अपनी पढ़ाई रोक देनी होगी। कतरी हवाई सेवा पर भारी असर होगा। उन्हें अरब देश का आकाश छोड़कर अन्य मार्गों से अपनी हवाई सेवा चलानी होगी। इसी तरह वहां पहुंचने वाले विमानों को भी अरब देशों की हवाई सीमा से हटकर जाना होगा। कतरी बैंकों से अरब बैंक अब कारोबार नहीं करेंगे। इससे भारी पूंजी फंसी रहेगी। कृषि उपज वहां नहीं के बराबर है। सारा खाने-पीने का सामान आयात होता है। सऊदी का जमीनी मार्ग बंद हो जाने से उसे जल या हवाई मार्ग से आयात करना होगा, जिससे जीवनावश्यक वस्तुओं की किल्लत पैदा हो जाएगी। लेकिन गैस की आपूर्ति पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। अबू धाबी स्थित डाल्फिन एनर्जी की पाइपलाइन यूएई व ओमान होकर जाती है।

भारत पर इस संघर्ष का विशेष तात्कालिक असर नहीं पड़ेगा। तेल व गैस की कीमतों पर असर आ सकता है। भारत की चिंता केवल वहां कार्यरत भारतीय आप्रवासियों को लेकर है। कतर की जनसंख्या करीब २४ लाख है, जिनमें ८८ प्रतिशत विदेशी हैं। इनमें कोई २५ प्रतिशत संख्या भारतीयों की है। भारत कतर से अपनी कुल गैस जरूरत का कोई ९० फीसदी हिस्सा खरीदता है। फिलहाल इस पर कुछ असर जरूर पड़ सकता है। भारत से कतर जानेवाली व वहां से आने वाली विमान सेवाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अब उन्हें लम्बा रास्ता तय कर जाना होगा। भारत की समस्या यह है कि अरब संकट में हमें हमेशा तटस्थ भूमिका अदा करनी पड़ती है। हम किसी एक ओर झुक नहीं सकते। अतः हमें केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा और वहां से होने वाली आपूर्ति पर ही ध्यान रखना होता है। इस संघर्ष में ईरान और रूस प्रसन्न हैं; क्योंकि अमेरिकी लॉबी में फूट पड़ गई है। लिहाजा, अमेरिकी लॉबी उस हर किसी को दंडित करने पर उतारू है, जो ईरान के करीब जाएगा। लेकिन इससे मध्यपूर्व में एक और सीरिया बनने के हालात पैदा हो गए हैं। इससे विश्व के लिए नया संकट पैदा होगा।

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