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विहिंप और संतों ने राम मंदिर को लेकर प्रत्यक्ष आंदोलन चुनाव तक स्थगित कर दिया है। इसलिए भी कि केंद्र ने अविवादित और अधिग्रहीत 67 एकड़ जमीन मूल मालिक याने राम जन्म भूमि न्यास को लौटाने के लिए अदालत में आवेदन किया है। इससे विरोध-प्रतिरोध के बावजूद किसी बड़े हंगामे की उम्मीद नहीं है।

लोकसभा चुनावों के सरगर्म होते माहौल में श्रीराम मंदिर को लेकर प्रयागराज-कुंभ से लेकर अयोध्या तक घमासान की तैयारी चरम पर है। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आश्वासन के बाद अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि की चार मार्च को अयोध्या कूच की मुहिम फिलहाल जहां थम गई है, वहीं द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती 17 फरवरी को प्रयाग से अयोध्या कूच की तैयारी में हैं। मोदी सरकार ने पहले ही मंदिर निर्माण का संकल्प दोहराते हुए गेंद उच्चतम न्यायालय के पाले में डाल दी है। उधर, विहिंप और उसके समर्थक संत जो मंदिर आंदोलन के प्रतिनिधि माने जाते हैं, मोदी सरकार के फैसले पर अपनी मुहर लगा चुके हैं। कुंभ में आयोजित धर्म संसद में केंद्र सरकार की उच्चतम न्यायालय में प्रस्तुत याचिका का स्वागत करते हुए तय किया गया कि अयोध्या में राम मंदिर को लेकर नए चरण से आंदोलन नहीं होगा। ऐसे में लगता नहीं कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार अयोध्या में माहौल गरमाने या कोई संवैधानिक संकट खड़ा करने की छूट किसी को देगी।

शंकराचार्य के अनुसार अयोध्या कूच को राम आग्रह के लिए अयोध्या प्रस्थान नाम दिया गया है। यह सत्याग्रह की तर्ज पर ही होगा। शंकराचार्य के साथ अन्य संत प्रतापगढ़ और सुलतानपुर के रास्ते होते हुए 19 फरवरी को अयोध्या पहुंचेंगे। इसके बाद 20 फरवरी को विराट सभा का आयोजन किया जाएगा और 21 फरवरी को राम मंदिर का शिलान्यास करने की योजना है। शंकराचार्य के शिष्य अविमुक्तेश्वरानंद ने इस घोषणा के बाद अयोध्या में कहा कि 21 फरवरी को चार शिलाओं को स्थापित कर मंदिर का निर्माण शुरू किया जाएगा। उन्होंने विहिंप द्वारा किए गए शिलान्यास को शास्त्र सम्मत ढंग से न किए जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि मुख्य भूमि से 192 फुट दूर शिलान्यास हुआ था और जो शिलान्यास किया गया था वह राम जन्मभूमि का न होकर सिंह द्वार का था। उन्होंने कहा कि विहिंप ने अगर शिलान्यास किया था तो निर्माण भी शुरू करना चाहिए था क्योंकि शास्त्रों में भी लिखा है कि अंतराल ज्यादा होने पर उसकी महत्ता कम हो जाती है इसलिए उसका फिर से पूजा पाठ किया जाएगा और शिलान्यास करने के बाद ही मंदिर का निर्माण शुरू हो जाएगा।

सच्चाई तो यह है कि जिस अयोध्या में वह मंदिर निर्माण के दावे के साथ दाखिल होंगे, वहां उनके समर्थकों का टोटा है। स्वामी स्वरूपानंद की कांग्रेस से नजदीकी भी किसी से छिपी नहीं है। शंकराचार्य पद को लेकर स्वामी वासुदेवानंद से उनका विवाद भी जगजाहिर है। हालांकि स्वामी स्वरूपानंद मंदिर निर्माण को लेकर विहिंप की दावेदारी से इतर रामालय ट्रस्ट के माध्यम से अपना दावा ठोकते रहे हैं। शंकराचार्य ने लोकसभा चुनाव के समय इस मुद्दे को लेकर आंदोलन करने पर पूछे गए सवाल के जवाब में कहा कि चुनाव तो लगातार होते ही रहते हैं ऐसे में क्या हम इंतजार ही करते रह जाएंगे। अयोध्या के अधिसंख्य धर्माचार्य विहिंप और रामजन्मभूमि न्यास के साथ हैं। कुछ तटस्थ हैं पर वे स्वरूपानंद के साथ जाएंगे, इसमें संदेह है। ऐसे में यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि मंदिर निर्माण से जुड़ी उनकी ताजा कोशिश संतों को एक मंच पर लाने से कहीं अधिक विहिंप के लिए चुनौती पेश करने तक होगी।

संतों के बीच आम स्वीकृति की बुनियाद पर नरेंद्र गिरि का दावा भी बहुत ठोस नहीं है। तीन साल पूर्व अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष बनने के बाद वे तीन-चार बार रामनगरी का दौरा कर चुके हैं पर उनके किसी भी दौरे में यह नहीं प्रतीत हुआ कि यहां के संत उन्हें शीर्ष धर्माचार्य के तौर पर स्वीकार करते हैं। गिरि के अनुसार, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की कुंभ यात्रा के दौरान योगी ने कहा कि अखाड़े अभी अयोध्या न कूच करें। जल्द ही वह इस मुद्दे पर प्रयागराज आकर वार्ता करेंगे। मुख्यमंत्री ने बड़े हनुमान मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद उन्हें यह कह कर आश्वस्त किया कि मंदिर को लेकर वह भी गंभीर हैं। इसलिए अब परिषद की बैठक चार मार्च महाशिवरात्रि के स्नान पर्व के बाद आयोजित की जाएगी, जिसमें मंदिर मुद्दे को लेकर वार्ता होगी। हालांकि अदालत में राम मंदिर के पैरोकार एवं नाका हनुमानगढ़ी के महंत रामदास के अनुसार अयोध्या कूच जैसी घोषणाएं स्वयं को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए हैं, पर ऐसा करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि इससे देश में संवैधानिक संकट खड़ा हो सकता है।

केंद्र सरकार की 67 एकड़ जमीन की वापसी की याचिका पर राम जन्म भूमि मंदिर के पुजारी सत्येंद्र दास ने कहा कि केंद्र सरकार अविवादित 67 एकड़ अधिग्रहीत भूमि को वापस ले सकती है लेकिन जब तक गर्भगृह की विवादित जमीन पर फैसला नहीं होता मंदिर निर्माण नहीं शुरू हो सकता। उन्होंने कहा, ’कोर्ट लगातार तारीख देकर मंदिर-मस्जिद केस की सुनवाई टाल रहा है।’ बाबरी मस्जिद के दूसरे पक्षकार हाजी महबूब ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, ’यह राजनीतिक खेल जिससे 1990 जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। न्यास को जमीन देने की मंशा सरकार ने जाहिर कर दी है जबकि अधिग्रहण के मकसद में साफ कहा गया है कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा, उसे इसका हिस्सा आवंटित किया जाएगा।’ उन्होंने कहा कि विवादित भूखंड को छोड़ कर कहीं भी मंदिर निर्माण किया जाए हमें ऐतराज नहीं है पर विवादित 2.77 एकड़ सुरक्षित रहना चाहिए।

राम जन्म भूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य डॉ. राम विलास वेदांती ने कहा कि 67 एकड़ जमीन की वापसी की याचिका केंद्र सरकार का देर से उठाया गया पर अच्छा कदम है। उन्होंने कहा, ’यह याचिका 2014 में जब भाजपा की सरकार बनी उसी समय दायर होनी चाहिए थी। अब तक मंदिर का निर्माण भी चलता रहता और कोर्ट का फैसला भी आ गया होता। अब अगर कोर्ट में याचिका पर निर्णय होकर अविवादित जमीन न्यास को वापस मिल जाती है तो मंदिर निर्माण शुरू कर दिया जाएगा।’

विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने कहा, ’हम सरकार द्वारा उठाए गए कदम का स्वागत करते हैं।’ उन्होंने कहा, ’तत्कालीन सरकार ने 1993 में कुल 67.703 एकड़ जमीन अधिग्रहीत कर ली थी। इसमें राम जन्मभूमि न्यास की जमीन भी शामिल थी।’ उन्होंने कहा कि ’विवादित ढांचा वाली जमीन सिर्फ 0.313 एकड़ की है। इसके अलावा राम जन्मभूमि न्यास सहित बाकी जमीन विवादित स्थल पर नहीं है। हमें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस अर्जी पर जल्द से जल्द फैसला लेगा।’  केंद्र सरकार की याचिका के मुताबिक 0.313 एकड़ जमीन, जिस पर विवादित ढांचा स्थित था, उसी को लेकर विवाद है। बाकी जमीन अधिग्रहीत जमीन है। जबकि बाकी पक्षों का मानना है कि विवादित स्थल 2.77 एकड़ जमीन पर है जिसे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तीन पक्षकारों में बराबर-बराबर बांट दिया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 2003 में पूरी अधिग्रहीत जमीन 67.7 एकड़ पर यथास्थिति बनाने का आदेश दिया था। केंद्र ने कोर्ट में कहा कि वह गैर-विवादित 67 एकड़ जमीन इसके मालिक राम जन्मभूमि न्यास को लौटाना चाहती है। दरअसल सरकार की मंशा संवैधानिक मर्यादा और दायरे का ध्यान रखते हुए गैरविवादित जमीन को राम जन्मभूमि न्यास को दिए जाने के उपलब्ध न्यायिक विकल्प को आजमाने की है।

उधर, हिंदू महासभा और कमलेश कुमार तिवारी द्वारा उच्चतम न्यायालय में दाखिल एक अन्य याचिका ने लैंड एक्वीजिशन एक्ट की वैधता पर ही सवाल उठा दिया है। याचिका में कहा गया है कि राज्य सूची के विषयों की आड़ में राज्य की भूमि केंद्र अधिग्रहीत नहीं कर सकता है। जिस एक्ट के तहत 1993 में तब केंद्र की नरसिंहराव सरकार ने 67.7 एकड़ जमीन अधिग्रहीत की, वह एक्ट बनाना संसद के अधिकार क्षेत्र में नहीं था। याचिका में कहा गया है कि भूमि और कानून व्यवस्था राज्य सूची के विषय हैं। केंद्र को कानून बनाकर राज्य की भूमि अधिग्रहीत करने का अधिकार नहीं है। जब अधिग्रहण ही अवैध तो जमीन वापस देने में क्या परेशानी?

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश विधान सभा में राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के चर्चा का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राम जन्मभूमि एक आस्था से जुड़ा विषय है और न्यायालय को भी जन आस्था का सम्मान करते हुए 24 घंटे के भीतर इस पर अपना फैसला सुना देना चाहिए। जहां तक जमीन के बंटवारे का प्रश्न है तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय पहले ही कह चुकी है कि जहां रामलला जी विराजमान हैं, वही राम जन्मभूमि है तो विवाद वहीं समाप्त हो चुका है और बंटवारे का कहीं विवाद ही नहीं है। इससे पहले भी योगी ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि अगर कोर्ट उन्हें राम मंदिर विवाद सौंप दें तो वे 24 घंटे के अंदर इसका हल निकाल देंगे। सच भी यही है कि शीर्ष न्यायालय को अब इस मामले की सबरीमाला, कर्नाटक विधान सभा मामलों जैसी नियमित सुनवाई करके फैसला सुनाना चाहिए क्योंकि देश एक बार फिर अप्रिय हालात से नहीं गुजरना चाहता।

योग गुरु रामदेव कहते हैं,  ’मैं गहरे तौर पर मानता हूं कि अयोध्या में निश्चित रूप से मंदिर बनना चाहिए। यदि अयोध्या में नहीं तो फिर आप कहां बनाएंगे? जाहिर है कि यह मक्का, मदीना या वेटिकन सिटी में तो नहीं बन सकता।’ उन्होंने कहा, ’यह निर्विवाद सत्य है कि अयोध्या भगवान राम का जन्म स्थान है। केवल हिंदू ही नहीं राम मुस्लिमों के भी पूर्वज थे। राम मंदिर का मुद्दा राष्ट्रीय गौरव का है। वोट बैंक की राजनीति से इसका कोई लेनादेना नहीं है।’ … तो इन वक्तव्यों के निहितार्थ न्यायालय को भी समझना होगा।

 

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