| भारत के स्व क्षरण से क्या हानि हुई और स्व जागरण से क्या लाभ होगा इसकी चर्चा इस लेख में की गई है। यह लेख हिंदी विवेक द्वारा प्रकाशित स्व-75 ग्रंथ में मा. मनमोहन वैद्य जी द्वारा लिखे गए लेख का संक्षिप्त रूप है। |
भारत के सिवा दुनिया में शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहां के समाज के मन में हम कौन हैं? हमारे पुरखे कौन थे? हमारा इतिहास क्या रहा है? इस के बारे में कोई सम्भ्रम या भिन्न-भिन्न मत होंगे। पर भारत में, जो दुनिया का सबसे प्राचीन राष्ट्र है और जहां सब से समृद्ध समाज रहने के बावजूद हमारी इस विषय पर सहमति नहीं है। इसका एकमात्र कारण यही दिखता है कि हम एक समाज और एक राष्ट्र के नाते अपने स्व को पहचानना और उसे आत्मसात् करना नहीं चाहते। कुछ उदाहरण देखें।
द्वितीय विश्वयुद्ध के विनाश के उपरांत ब्रिटेन, जर्मनी और जापान ने नई शुरूआत की थी। सैकड़ों वर्षों के संघर्ष के बाद 1948 में इजराइल ने भी अपने राष्ट्र को पुनः प्राप्त किया था। भारत ने भी शतकों की ग़ुलामी और शोषण के उपरांत और देश विभाजन के बाद 1947 में स्वाधीनता प्राप्त की थी। लगभग एकसाथ नए सिरे से शुरुआत करने वाले इन देशों को आज हम देखते हैं तो भारत की तुलना में इन चारों देशों की स्थिति बहुत अच्छी दिखती है। क्या कारण रहा होगा?
एक सामाजिक चिंतक के अनुसार जब तक एक समाज के नाते हम कौन है यह तय नहीं करते, हम अपनी दिशा और प्राथमिकताएं तय नहीं कर सकते। यही अंतर हैं भारत और इन देशों की विकास यात्रा में, जो कि करीब एक साथ ही शुरू हुई थी।
अपने ‘स्वदेशी समाज नाम के ऐतिहासिक निबंध में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर लिखते हैं कि हमें सब से पहले हम जो हैं, वह बनना पड़ेगा। यह अद्भुत संयोग ही है कि आज जब हमारा देश स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मनाने जा रहा है तब एक ऐसा कालखंड आया है जब एक राष्ट्र के नाते भारत अपने स्व के आधार पर अपनी एक नई पहचान बनाने के लिए प्रयासरत है – परंतु इसका भी विरोध क्यों होता है इसपर विचार होना चाहिए।
भारत के आधुनिक इतिहास में हमें दिखता हैं कि भारत की यह पहचान, भारत का यह स्व जो सदियों पुराना है, सर्वविदित है, सुस्पष्ट है; उसे ही नकारा गया। इसे नकारने को लिबरल, बौद्धिक और प्रगतशील कहलाने का फैशन चल पड़ा है। स्पष्ट दिखता है कि भारत ने चूंकि अपनी विकास यात्रा की दिशा अपने स्व के आलोक में तय नहीं की इसलिए भारत का उसकी क्षमता के आधार पर जितना विकास अब तक होना चाहिए था वह हम नहीं कर सके। भारत के इस स्व के प्रकट होने के कई अवसर आए परंतु दुर्भाग्य से उन्हें लगातार नकारा गया।
हम जानते हैं कि 1905 में बंगाल के विभाजन के विरुद्ध हुए जन आंदोलन का उद्घोष वंदेमातरम् गीत बना था। वंदेमातरम् ने हजारों युवकों, क्रांतिकारियों को स्वाधीनता के आंदोलन में कूदने की, देश पर मर मिटने की प्रेरणा दी। वंदेमातरम् भारत के स्व का सहज प्रस्फुटन था। कांग्रेस के अखिल भारतीय अधिवेशनों में इसका गौरवपूर्ण गान होता था। पंडित ओंकारनाथ ठाकुर, पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर जैसे दिग्गज गायक इसे स्वरबद्ध कर कांग्रेस के अधिवेशनों में गाते थे। हिंदू-मुसलमान सभी इससे समान रूप से प्रेरणा पाते थे। फिर अचानक 1921 से यह केवल हिंदुओं का गीत और साम्प्रदायिक कैसे हो गया? इसके पीछे की मानसिकता को समझना आवश्यक है। 1905 से 15 वर्षों तक जो देशभक्ति का स्वाभाविक प्रस्फुटन था वह अचानक साम्प्रदायिक कहकर कैसे और क्यों नकारा गया, यह समझना आवश्यक है।
एक और उदाहरण देखें। स्वतंत्र भारत के ध्वज का सर्वप्रथम नमूना विवेकानंद शिष्या भगिनी निवेदिता ने 1905 में बनाया। उन्होंने दधीचि ऋषि के तपस्वी देहत्याग से बना वज्र चिह्न अंकित ध्वज बनाया। 1906 के कांग्रेस अधिवेशन में भगवे कपड़े पर पीले वज्रचिह्न वाला ध्वज प्रदर्शित हुआ था।
इसके पश्चात विविध ध्वजों के विभिन्न नमूने प्रस्तावित हुए। 1921 में भारत के सभी समुदायों का प्रतिनिधिक चरखांकित तिरंगा ध्वज बनाया गया। 1929 में मास्टर तारासिंह के नेतृत्व में एक सिख प्रतिनिधि मंडल महात्मा गांधी जी से मिला और उन्होंने अलग-अलग समुदायों के प्रतिनिधिक ध्वज की कल्पना का विरोध किया और सभी के बीच रही एकता को दर्शानेवाला राष्ट्रीय ध्वज बनाने पर ज़ोर दिया और कहा, यदि अलग-अलग समुदाय के प्रतिनिधित्व का ही विचार करना है तो सिख समुदाय का पीला रंग ध्वज में जोड़ा जाए। इस पर समग्र विचार कर सुझाव देने के लिए कांग्रेस कार्यकारी समिति ने एक ध्वज समिति का गठन किया। इसमें पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, मास्टर तारासिंह, पट्टाभि सीतारामैय्या(संयोजक), काका कालेलकर और डॉक्टर हार्डीकर थे। ध्वज समिति ने राज्य कांग्रेस समिति और सामान्य व्यक्तियों से प्रचलित राष्ट्रीय ध्वज के लिए आपत्ति और सुझाव मांगे।
सब की बातें सुनकर ध्वज समिति का सर्वसम्मत निर्णय रहा कि भारत का ध्वज विशिष्ट, कलात्मक और गैर साम्प्रदायिक हो। यह सर्वानुमति से तय किया गया कि वह एक ही रंग का हो और यदि कोई एक रंग जो सबसे विशिष्ट है तथा सभी भारतवासियों को समान रूप से स्वीकार्य है और जो भारत जैसे प्राचीन राष्ट्र के साथ दीर्घकाल से जुड़ा है वह भगवा या केसरी रंग है। इसलिए आयताकृति भगवे कपड़े पर नीले रंग में चरखा भारत का ध्वज होगा, यह निर्णय ध्वज समिति ने सर्वानुमति से लिया। यह निर्णय क्यों नहीं स्वीकार हुआ? वह कौन सी मानसिकता थी जिसने भारत का यह स्वाभाविक और सुविचारित स्व नकारा? यह तथ्य भी विचार करने योग्य है।
1947 में स्वाधीनता के पश्चात संविधान द्वारा समृद्धि, शांति और पराक्रम को दर्शाता धर्मचक्रांकित तिरंगा हमारा राष्ट्रध्वज स्वीकारा गया। यह हमारा राष्ट्रध्वज है। उसका सम्मान तथा संरक्षण करना और अपने कर्तृत्व से उसका गौरव बढ़ाना हम सभी भारतीयों का कर्तव्य है। यह निर्विवाद सत्य है।
इसी तरह स्वाधीनता के पश्चात भारत की शिक्षा में जो मूलभूत सुधार अपेक्षित था वह भी नहीं किया गया। आध्यात्मिकता ही भारतीय चिंतन का आधार है। उसी के प्रकाश में शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए। परंतु कांग्रेस के शासन काल में, उन्हीं के द्वारा नियुक्त शिक्षा आयोगों की अनुशंसाओं को लागू नहीं किया गया। शिक्षा आयोग का गठन करने वाले कांग्रेस के ही नेता थे। फिर भी उस आयोग की अनुशंसा को लागू करने से रोकने वाले कौन लोग थे, कौन सी मानसिकता थी? आज भी उस दिशा में जब प्रयास होते हैं तो शिक्षा का भगवाकरण के नाम पर विरोध किया जाता है। इसके पीछे की मानसिकता क्या है? इसका विश्लेषण होना आवश्यक है।
भारत की सभी भाषाओं की जननी संस्कृत है, यह निर्विवाद तथ्य है और संस्कृत ही है जो सभी भारतीय भाषा-भाषियों को सरलता से समझ में आती है। जैसे मलेशिया में तमिल भाषी भारतीय बड़ी संख्या में हैं। वहां के हिंदू स्वयंसेवक संघ के प्रचारक श्री रामचंद्रन तमिल भाषी है। संघ शिक्षा वर्ग के दोनों वर्षों का उनका प्रशिक्षण तमिलनाडु प्रांत में हुआ। तृतीय वर्ष के लिए(25 दिन) वे नागपुर गए। वहां सभी बौद्धिक हिंदी में ही होते थे जो उन्हें कुछ भी समझ में नहीं आता था। बाद में जब तमिल भाषी शिक्षार्थियों के लिए तमिल में उनका अनुवाद होता था तभी वे उसे समझते थे। उन्होंने मुझे बताया कि 25 में से केवल एक ही बौद्धिक उद्बोधन वे सीधा (बिना अनुवाद के) समझ सके क्योंकि वह संस्कृत में हुआ था। संस्कृत भाषा सभी भाषाओं से नजदीक है, इसका यह ज्वलंत प्रमाण है। भारत रत्न डॉक्टर बाबासाहेब आम्बेडकर समेत तत्कालीन अनेक नेताओं का यह स्पष्ट मत था कि भारत में सभी को संस्कृत की शिक्षा दी जाए। भारत के ज्ञान का सारा खजाना संस्कृत में है और सभी भारतीय भाषाएं संस्कृत से नजदीक हैं, संस्कृत से ही निकली हैं। भारतीय एकात्मकता के बोध के लिए भी यह उपयुक्त है। परंतु किस मानसिकता के कारण इस महती सुझाव को नहीं स्वीकारा गया?
दुनिया के सभी शिक्षाविद मानते हैं कि बालक की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। नए विषय समझने के लिए और बालक के मानसिक, बौद्धिक विकास के लिए शिक्षा मातृभाषा में होना आवश्यक है। अच्छी अंग्रेजी भाषा सीखने के लिए सभी विषय अंग्रेजी में सीखना आवश्यक नहीं है। दुनिया के केवल 9% लोग ही अपनी मातृभाषा से अलग अन्य भाषा में शिक्षा प्राप्त करते हैं। भारत ऐसे कुछ देशों में आता है। सभी विषयों की शिक्षा अंग्रेजी में देने के नाम पर अपने यहां अंग्रेजी का वर्चस्व इतना बढ़ा दिया गया कि मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त करने वालों के मन में हीनता का भाव निर्मित होता है। यह भारत के स्व भाव के विपरीत है।
बहुत दीर्घकाल तक भारत सम्पन्न था, विश्व व्यापार में भारत का सहभाग सर्वाधिक था। हम अनाज नहीं बेचते थे। चमड़ा, धातु, लकड़ी, पत्थर की बनी वस्तुएं, कपड़ा, मसाले, हीरे आदि के व्यापार के लिए भारतीय दुनिया भर में जाते रहे हैं। इसलिए भारत कृषि प्रधान देश था कहने के स्थान पर, भारत उद्योग प्रधान देश था कहना अधिक उचित होगा। ये सारे उद्योग घर-परिवार में होते थे और ये परिवार ग्रामीण भारत में रहते थे। भारत के ग्राम समृद्ध होते थे। लेकिन यूरोप के प्रभाव के कारण भारत ने स्वाधीनता के पश्चात् शहर केंद्रित विकास की दिशा पकड़ ली। शहरों में भीड़, स्पर्धा, अपराध और आपसी सम्बंधों का बिखराव बढ़ता गया और ग्राम उपेक्षित, पिछड़े, सुविधा विहीन होने लगे। शहर में बसना प्रतिष्ठा का और ग्रामीण भाग में बसना पिछड़ेपन का लक्षण माना गया। यांत्रिक युग के कारण अधिकाधिक लाभ कमाने के मोह के मकड़जाल में मनुष्य फंसता चला गया।
भारतीय जीवन की विशेषता यह रही है कि भारत ने भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक विकास दोनों को समान महत्व दिया है, किसी एक को नहीं। ईशावास्य उपनिषद में एक श्लोक में स्पष्ट कहा है कि, जो केवल भौतिक समृद्धि के पीछे दौड़ता है वह गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। उसी श्लोक में आगे कहा है कि, जो केवल आध्यात्मिक साधना में रत रहता है वह और गहरे अंधकार में प्रवेश करता है। उपनिषद आगे कहता है कि, भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति दोनों को साथ-साथ साधना ही जीवन है। इन दोनों को एक साथ साधने का योग्य परिवेश ग्रामीण जीवन में है। ग्राम में आय कम है पर व्यय भी कम है। इसलिए अच्छा जीवन जीने तथा कमाने के लिए बहुत दौड़ भाग नहीं करनी पड़ती है। कमाने के साथ-साथ आध्यात्मिक साधना के लिए पर्याप्त समय और योग्य परिवेश-वातावरण ग्रामीण जीवन में हैं। संविधान को स्वीकार करते समय भी 19 से 22 नवंबर 1948 की चर्चा में संविधान सभा ने यही अपेक्षा व्यक्त की थी कि जल्द ही हम ग्राम स्वराज के पथ पर अग्रसर होंगे परंतु पश्चिम के समाजवाद और पूंजीवाद के द्वंद्व में फंसकर हम अपना समावेशी और पर्यावरण पूरक विकास का रास्ता भूल गए। ग्रामीण भारत में शहरों की सभी सुविधाएं दिए जाने का आग्रह पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर अब्दुल कलाम का भी था। समृद्ध, सुखी, निरामय और आध्यात्मिक साधना में रत ऐसा जीवन जीना ही जीवन है यह भारत का विशिष्ट विचार रहा है, और भारत की पहचान भी। यही भारत के स्व की अभिव्यक्ति है। यह दिशा हम ने क्यों नहीं ली?
स्वदेशी समाज में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर कहते हैं कि वेल्फेर स्टेट पश्चिम की कल्पना है, भारतीय नहीं। परम्परा से भारतीय समाज राज्यशक्ति पर कभी अवलम्बित नहीं था। वह समाज जो अपनी आवश्यकताओं के लिए राज्य पर कम से कम अवलम्बित है, वही स्वदेशी समाज है। परम्परा से केवल न्याय, विदेश सम्बंध और सुरक्षा के विषय ही राज्य के अधीन होते थे। बाकी सभी विषय जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार, अर्थोत्पादन, संगीत, कला, मंदिर, कथा, मेले आदि सभी समाज के अधीन रहते थे।
विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता ने कहा कि जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक अपने ही पास न रखकर समाज को देते हैं उस समाज में ऐसे एकत्रित पारिश्रमिक की पूंजी के आधार पर समाज सम्पन्न समृद्ध बनता है और समाज सम्पन्न-समृद्ध बना तो समाज का हर एक व्यक्ति सम्पन्न-समृद्ध बनता है। परंतु जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक समाज को न देकर अपने ही पास रखते हैं, उस समाज में कुछ व्यक्ति तो सम्पन्न-समृद्ध बनते हैं पर समाज दरिद्र रहता है।
समाज को अपनेपन के भाव से देना, जो समाज का ही है उसे लौटाना यानी जीवन सार्थक होना; ऐसा माना गया है। इसीलिए विवेकानंद केंद्र की प्रार्थना में कहा गया है –
जीवने यावदादानं स्यात् प्रदानं ततोऽधिकम् ।
इत्येषा प्रार्थनास्माकं भगवन् परिपूर्यताम् ॥
(अर्थ-जीवन में हम जितना स्वीकार करते हैं उससे अधिक लौटा सकें, यह हमारी प्रार्थना हे भगवन! आप पूर्ण करो।)
समाज से हमें बहुत मिलता है, उसे वापस लौटाना ही धर्म कहा गया है। रिलीजन या उपासना इससे अलग हैं। उपासना धर्म के लिए होती है। धर्म का अर्थ है, प्रत्यक्ष आचरण करना, समाज को लौटाना। समाज को देना लहरीळीूं है जबकि समाज को लौटाना धर्म है। भगिनी निवेदिता के अनुसार सामाजिक पूंजी को समृद्ध करना ही धर्म है, और धर्म भेदभाव नहीं करता है। वह सभी को जोड़े रखता है, सहायता करता है, साथ बांधे रखता है। यही स्वदेशी समाज का आधार है।
स्वाधीनता के समय भारत के निर्माताओं के मन में यह धर्म भाव स्पष्ट रहा होगा। इसीलिए भारत की लोकसभा में ‘धर्मचक्र प्रवर्तनाय’लिखा है। राज्य सभा में ‘सत्यं वद धर्मं चर’, उच्चतम न्यायालय का बोधवाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ और भारत के राष्ट्रध्वज पर जो चक्र अंकित है वह धर्मचक्र है। चक्र घूमने के लिए ही होता है। समाज को लौटाने का प्रत्येक छोटा सा प्रयास धर्मकार्य है, और ऐसे छोटे-छोटे प्रयासों से धर्मचक्र चलता है, गतिमान होता है, प्रवर्तमान रहता है।
लोकसभा, राज्यसत्ता, उच्चतम न्यायालय, राष्ट्रध्वज जैसे प्रमुख स्थानों पर जिस धर्म का स्पष्ट महत्वपूर्ण उल्लेख है, उस धर्म की कहीं कोई चर्चा नहीं है, बल्कि धर्म की बात करना साम्प्रदायिक माना जाने लगा है। और जिस सेक्युलरिज्म को चर्चा करने के पश्चात भारतीय संविधान में स्थान नहीं देने का सर्वानुमति से निर्णय लिया गया फिर भी उसे चुपके से किसी भी प्रकार की चर्चा-बहस किए बिना संविधान की प्रस्तावना में (जो कि अपरिवर्तनीय है, ऐसा संविधान ही कहता है) जबरदस्ती से समाविष्ट किया गया। उस सेक्युलरिज्म जैसे अभारतीय शब्द के अर्थ को परिभाषित किए बिना ही उसका धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।
ये सब किस मानसिकता की उपज है? इसका विचार करना होगा। उस अभारतीय मानसिकता से उबरकर शुद्ध भारतीय विचार को प्रतिष्ठित करने से ही अबतक नकारा गया भारत का स्व पूर्णार्थ से, अपने पुरुषार्थ से पूर्ण प्रकाशमान होगा तभी भारत अपने स्व-गौरव के साथ मज़बूती से अपना वैश्विक कर्तव्य पूर्ण करने के लिए तत्पर होगा।
डॉ. मनमोहन वैद्य
अ.भा.कार्यकारिणी सदस्य
रा. स्व. संघ

