सिनेमा अक्सर कलाकारों की निजी सोच और अनुभव के आधार पर समाज को आइना दिखाता है। सत्तर के दशक की लोकप्रिय अभिनेत्री ‘मुमताज’ ने हाल ही में एक साक्षात्कार में विवाह, धर्म और सामाजिक सोच को लेकर ऐसी बेबाक टिप्पणी की, जिसने संपूर्ण भारतीय समाज को एक आइना दिखाया है। एक मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर हिंदू परिवार व्यवस्था की भरपूर सराहना की और बहुविवाह जैसी प्रथाओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘किसी भी धर्म में स्त्री के अधिकारों और सम्मान से बड़ा कुछ नहीं हो सकता है।’
भारतीय सिनेमा का सत्तर का दशक परिवर्तन के दौर का साक्षी रहा है। तकनीक बदल रही थी, कहानियों का स्वरूप बदल रहा था, सिनेमा ब्लैक-एंड-व्हाइट से रंगीन दौर की जगमगाहट में प्रवेश कर रहा था और उसी समय पर्दे पर अभिनेत्री ‘मुमताज’ का उदय हुआ, जिसने अपने अभिनय, सौंदर्य और भावनात्मक अभिव्यक्ति से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनायी। ‘मुमताज’ ने अपने करियर में कई यादगार फिल्में दीं। उस दौर में उनकी लोकप्रियता इतनी अधिक रही कि निर्माता-निर्देशक उन्हें अपनी फिल्मों में लेने उत्सुक रहते। उनकी फिल्मों में भावनाओं की गहराई, नृत्य की लय और अभिनय की सहजता देखने को मिलती। यही कारण है जो आज नई पीढ़ी की अभिनेत्रियां भी उनके अभिनय को देखकर भावों के उतार-चढ़ाव की बारीकियां सीखने की बात कहती हैं।
‘मुमताज’ और उनकी बहन दोनों ने किया हिन्दू परिवार में विवाह
दरअसल, हाल ही में ‘मुमताज’ ने यूट्यूब चैनल ‘सितारों का सफर’ के लिए एक ‘साक्षात्कार’ किया है। स्वयं के जीवन से जुड़ी तमाम कहानियों के बीच वे अपने आप को ये कहने से रोक नहीं सकीं कि उन्होंने एक हिन्दू परिवार में विवाह किया है, न सिर्फ उन्होंने बल्कि उनकी बहन ने भी हिन्दू परिवार में ही विवाह किया। वास्तव में हिन्दू जीवन और परिवार आदर्श है। वे कहती है, “मैं दोनों धर्मों में विश्वास रखती हूं। मैंने एक हिंदू से शादी की है और मेरी बहन ने भी एक हिंदू से शादी की है। हम दोनों खुश हैं। मेरे पति मेरा बहुत ख्याल रखते हैं। मुझे समझ नहीं आता कि लोग हिंदू और मुस्लिम विभाजन की बात क्यों करते रहते हैं, मैं इसमें विश्वास नहीं करती।”
जब उनका करियर सफलता के शिखर पर था, तब उन्होंने एक ऐसा निर्णय लिया जिसने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को चौंका दिया। वर्ष 1974 में उन्होंने व्यवसायी मयूर माधवानी से विवाह कर लिया और फिल्मों से दूरी बना ली। मुमताज और मयूर माधवानी की दो बेटियां हैं; नताशा माधवानी और तान्या माधवानी। उन्होंने बताया कि यह निर्णय उनके परिवार की सलाह से लिया गया था। उनकी मां ने उन्हें समझाया कि माधवानी परिवार बहुत अच्छा है और वहां उन्हें सुखी जीवन मिलेगा।
‘मुमताज’ के अनुसार उनके परिवार में एक निश्चित समय पर विवाह करना जरूरी माना जाता था, इसलिए उन्होंने अपने सभी फिल्मी प्रोजेक्ट जल्द से जल्द पूरे किए। जिन फिल्मों में अधिक समय लगने वाला था, उनके लिए उन्होंने निर्माताओं को पैसे भी वापस कर दिए। फिल्मों से दूरी बनाने और उन्हें पूरा करने में उन्हें लगभग दो वर्ष लगे, क्योंकि पहले से किए गए अनुबंध पूरे करना जरूरी था। लेकिन आज वे इस निर्णय को अपने जीवन का सबसे संतुलित और सुखद फैसला मानती हैं।
मुसलमानों का बहुविवाह गलत
इस बातचीत के दौरान मुमताज ने कुछ मुस्लिम समाजों में प्रचलित बहुविवाह की प्रथा पर भी खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से इस प्रथा से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि हर स्त्री अपने पति से प्रेम करती है और उसे किसी और के साथ बांटना नहीं चाहती। ऐसे में यदि कोई पुरुष एक के बाद दूसरी, तीसरी या चौथी शादी करता है, तो यह रिश्तों की गरिमा के खिलाफ है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई पुरुष बार-बार विवाह करके अपनी पत्नी को छोड़ देता है, तो इससे वह किसी दूसरे धर्म के लोगों से बेहतर कैसे हो जाता है। उनके अनुसार विवाह का अर्थ जिम्मेदारी और प्रतिबद्धता है, न कि सुविधा के अनुसार रिश्ते बदल लेना।
उन्होंने कहा, “मैं हमेशा कहती हूं कि मैंने एक हिंदू से शादी की है, मेरी बहन ने भी और हम बहुत खुश हैं। मुसलमानों में, कई पुरुष तीन या चार बार शादी करके अपनी पत्नियों को छोड़ देते हैं। इससे मुसलमान हिंदुओं से बेहतर कैसे हो जाते हैं? किसी पुरुष को तीन या चार बार शादी करनी ही नहीं चाहिए। मैं खुद मुस्लिम हूं और मैं कहती हूं कि यह गलत है, एक पत्नी को रखना, फिर दूसरी से शादी करना, और फिर तीसरी से। क्या आपने कभी सोचा है कि रिश्ते में महिलाएं कितनी अधिकार जताने वाली होती हैं? यह एक ऐसा रिश्ता है जहां हर महिला अधिकार जताने वाली होती है। एक को छोड़कर दूसरी से शादी करना, यह कैसे सही है? क्या यह पाप नहीं है?”

हिंदू परिवारों में विवाह है स्थायी और पवित्र बंधन
मुमताज ने कहा कि उनके अनुभव में अधिकांश हिंदू परिवारों में विवाह को स्थायी और पवित्र बंधन माना जाता है। आमतौर पर लोग एक ही बार विवाह करते हैं और जीवन भर उसी रिश्ते को निभाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कभी-कभी दूसरी शादी की घटनाएं भी होती हैं, लेकिन इसे सामान्य या आसान विकल्प नहीं माना जाता। उनके अनुसार रिश्तों को निभाने की यह सोच परिवार को स्थिरता देती है और स्त्रियों को सुरक्षा का भाव भी प्रदान करती है।
उन्होंने कहा कि हर स्त्री अपने पति को प्रेम करती है और वह उसे बांटना नहीं चाहती, ये क्या बात हुई, एक लियाओ, दो लियाओ, तीन लियाओ या चार लियाओ? उन्होंने कहा, “इस लिहाज से हिंदू बेहतर लगते हैं, वे आमतौर पर एक ही बार शादी करते हैं। कभी-कभी वे दो बार भी शादी कर सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे आसानी से एक व्यक्ति को छोड़कर दूसरे के पास चले जाते हैं। यह गलत है।”

मुस्लिम होते हुए भी हिंदू देवी-देवताओं में आस्था
धर्म के बारे में बात करते हुए मुमताज ने यह भी बताया कि वे जन्म से मुस्लिम हैं, लेकिन उनके मन में हिंदू देवी-देवताओं के प्रति गहरी श्रद्धा है। उन्हें विशेष रूप से भगवान शिव और भगवान श्रीकृष्ण में आस्था है। उनके घर की सीढ़ियों के पास भगवान गणेश की मूर्ति रखी है, जिसे वे प्रतिदिन प्रणाम करती हैं। उनका कहना है, “मेरे प्रिय भगवान शंकर और भगवान कृष्ण हैं। मैं मुस्लिम होते हुए भी उनमें गहरी आस्था रखती हूं।”
उन्होंने आगे बताया कि घर पर उनकी दिनचर्या में धार्मिक अनुष्ठान शामिल हैं। “जब भी मैं घर की सीढ़ियों से नीचे उतरती हूं, तो वहां भगवान गणेश की मूर्ति होती है, जो मेरे प्रिय हैं और मैं उनके चरणों में प्रणाम करती हूं। मैं भगवान शंकर में भी आस्था रखती हूं। बचपन से ही मुझे सुंदर और दिव्य प्रतीकों की ओर आकर्षण रहा है, इसलिए मुझे भगवान शिव का स्वरूप अत्यंत आकर्षक और आध्यात्मिक लगता है। मुझे लगता है कि वह सबसे सुंदर देवता हैं। इसलिए मैं उन्हें पूजती हूं। ये दो देवता हैं जिनमें मैं विशेष रूप से विश्वास करती हूं।”
निजी जीवन में संतोष और संतुलन
मुमताज ने अपने वैवाहिक जीवन के बारे में भी बड़ी सहजता से बात की। उन्होंने कहा कि उनके पति उनका बहुत ध्यान रखते हैं और उन्हें जीवन में किसी चीज की कमी महसूस नहीं होती। उनके अनुसार जीवन की असली सफलता सिर्फ पेशेवर उपलब्धियों तक सीमित नहीं मानी जानी चाहिए, वह वास्तव में परिवार की खुशियों में छिपी होती है। यही कारण है कि फिल्मों की चमक-दमक से दूर होकर भी वे अपने निर्णय से संतुष्ट हैं।
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

