वाडा से ‘गृह गुरुकुल’ आंदोलन की शुरुआत देश के लिए नया सामाजिक मॉडल
वाडा (जिला पालघर) | प्रतिनिधि : देश में बढ़ते शहरी पलायन, परिवार व्यवस्था के टूटन और सांस्कृतिक जड़ों से दूर होती नई पीढ़ी की पृष्ठभूमि में, पालघर जिले के वाड़ा में एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहल की गई। दिनांक 19 मार्च 2026 को गुढ़ीपाड़वा और चैत्र नवरात्र के अवसर पर एकतारा गुरुकुल द्वारा आयोजित ‘त्रिकर्म उत्सव’ के दौरान 172 गाँवों के 1008 परिवारों ने ‘गृह गुरुकुल’ खड़ा करने का सामूहिक संकल्प लिया। यह पहल देश के लिए एक नए सामाजिक मॉडल के रूप में सामने आ रही है।

इस भव्य कार्यक्रम में सांसद डॉ. हेमंत विष्णू सवरा, वरिष्ठ नेता बाबाजी काठोले, वाडा नगर पंचायत अध्यक्षा रीमा गंधे, संस्कार भारती के अखिल भारतीय कार्यकर्ता संजय गोडसे, वाडा इंडस्ट्रियल असोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद खोसला, गोवर्धन इको विलेज के प्रतिनिधि अभिमन्यु प्रभुजी, साथ ही एकतारा गुरुकुल के निदेशक आकाश नारायण बिस्वास और कार्यक्रम व्यवस्था प्रमुख मिलिंद वाडेकर उपस्थित थे। इस अवसर पर 172 गाँवों के सरपंच, पुलिस पाटील, मीडिया प्रतिनिधि और हजारों ग्रामीण बड़ी संख्या में शामिल हुए।

कार्यक्रम में सांसद डॉ. हेमंत सवरा ने एकतारा गुरुकुल की इस पहल की प्रशंसा करते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक के युग में भारतीय परंपराओं को संरक्षित रखने के लिए ऐसी पहलों की अत्यंत आवश्यकता है। परंपराएँ, रीति-रिवाज और संस्कार ही भारत की पहचान हैं और उनका संरक्षण होना अत्यावश्यक है।
इस उत्सव का प्रमुख आकर्षण रहा ‘गृह गुरुकुल अभियान’ परिवार को पुनः शिक्षा, संस्कार और कुल-परंपरा से जोड़ने वाला केंद्र बनाने पर आधारित है। “परिवार ही पहला गुरुकुल होता है” इस संकल्पना से 172 गाँवों और 1008 परिवारों ने मिलकर जीवन-मूल्यों के पुनर्जागरण का संकल्प किया।
कार्यक्रम के आयोजक आकाश नारायण बिस्वास ने कहा, “जब तक माता-पिता स्वयं गुरु नहीं बनते, तब तक घर प्राथमिक गुरुकुल नहीं बन सकता। घर गुरुकुल नहीं रहेगा, तो नई पीढ़ी अपनी जड़ों से दूर हो जाएगी और जिससे पलायन, भूमि विवाद और परिवार का विघटन बढ़ेगा। ‘गृह गुरुकुल’ इस पर एक प्रभावी समाधान बन सकता है।”
इस संदर्भ में कुडळी श्रृंगेरी शारदा पीठ के शंकराचार्य श्री श्री अभिनव शंकर भारती ने वीडियो संदेश के द्वारा कहा कि भारतीय संस्कृति कुल-परंपरा पर आधारित है और कुलदेवता, कुलगुरु, कुलविद्या, कुलाचार तथा कुलवृत्ति इन घटकों का संरक्षण करने से सर्वांगीण विकास प्राप्त होता है। एकतारा गुरुकुल द्वारा उठाया गया ‘गृह गुरुकुल’ कदम अत्यंत प्रशंसनीय है, ऐसा उन्होंने कहा।
कार्यक्रम का विशेष आकर्षण रहा ‘माँ की आँचल’ नामक भव्य स्वागत द्वार, जिसे 172 गाँवों की लगभग 450 माताओं की साड़ियों से बनाया गया था। यह दृश्य मातृशक्ति की एकता और सांस्कृतिक जागृति का प्रभावशाली प्रतीक बना।

कार्यक्रम में गाँव देवी सजावट प्रतियोगिता में कोने गाँव को प्रथम (₹25,000) तथा भोपिबली गाँव को द्वितीय (₹15,000) पुरस्कार मिला। इसी प्रकार सबसे बड़े संयुक्त परिवार सम्मान में श्रीराम भास्कर अंबावणे परिवार को प्रथम, जयवंत मोतीराम अंबावणे परिवार को द्वितीय और पालकर बंधु परिवार को तृतीय स्थान से सम्मानित किया गया। कुलवृक्ष प्रतियोगिता में 150 विद्यार्थियों ने भाग लिया, जबकि 35 महिलाओं ने गुढ़ीपाड़वा फैशन शो में पारंपरिक वेशभूषा में प्रस्तुति दी।
एकतारा गुरुकुल के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत भरतनाट्यम, तबला वादन, गायन, तारपा नृत्य और नाट्य प्रयोग ने उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया। गुरुमाता अरुणा देवी बिस्वास के संगीत प्रस्तुति ने कार्यक्रम को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान की। सहभागी कलाकारों ने “हम केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज-निर्माण के लिए प्रस्तुति देते हैं” ऐसा संदेश दिया।
172 गाँवों की भागीदारी और 1008 परिवारों का संकल्प इस पहल को देशभर में लागू किए जाने योग्य एक विस्तारशील मॉडल के रूप में सामने ला रहा है। परिवार को पुनः संस्कार और शिक्षा का केंद्र बनाने की इस संकल्पना से अनेक सामाजिक समस्याओं का जड़ से समाधान मिल सकता है, ऐसा विशेषज्ञों ने मत व्यक्त किया है।
वाड़ा का त्रिकर्म उत्सव केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक जागरण और राष्ट्र-निर्माण की ओर ले जाने वाला आंदोलन बन रहा है। “राष्ट्र-निर्माण की शुरुआत घर से होती है” यह संदेश देता ‘गृह गुरुकुल अभियान’ देश को नई दिशा देने की क्षमता दर्शा रहा है।
-आकाश नारायण बिस्वास

