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आदि शंकराचार्य: सनातन का पुनरुद्धार

आदि शंकराचार्य: सनातन का पुनरुद्धार

by हिंदी विवेक
in अध्यात्म, ट्रेंडींग, विशेष
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तत्पश्चात् गुरु की आज्ञा लेकर जब वे आगे बढ़े, तब उनके सामने केवल एक उद्देश्य था—वेदप्रतिष्ठा। इसी क्रम में उनका आगमन प्रयाग क्षेत्र में हुआ, जहाँ कुमारिल भट्ट उस समय विराजमान थे। परम्पराओं में कुमारिल भट्ट को ब्रह्मा का अंशावतार माना गया है ऐसा आचार्य, जिसने वेदों की रक्षा के लिए अपने जीवन को पूर्णतः समर्पित कर दिया।

आर्यभूमि का इतिहास पढ़ते समय मन बार-बार एक ही सत्य पर ठहर जाता है कि धर्म की धारा कभी एक जैसी नहीं बहती। वह कोई स्थिर जल नहीं है, बल्कि एक जीवंत प्रवाह है कभी निर्मल और तीव्र, तो कभी बाधाओं से घिरकर धीमा पड़ जाने वाला। समय के साथ उस पर धूल भी जमती है, उसमें विकृतियाँ भी प्रवेश करती हैं और अनेक बार उसका मूल स्वरूप पहचान में नहीं आता।

शंकराचार्य के जन्म से पूर्व भारत की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। वैदिक धर्म, जो कभी जीवन का सरल और गहन मार्ग था, वह कहीं कर्मकाण्डों की जटिलता में उलझ गया था, तो कहीं उसके मूल तत्त्वों को ही नकारा जाने लगा था। बौद्ध, जैन, चार्वाक, पाशुपत, कापालिक, शाक्त जैसे अनेक मत अपने-अपने विचारों के साथ समाज में फैल चुके थे। हर एक मत अपने को ही सत्य मानकर चल रहा था, और साधारण जन उनके बीच उलझता जा रहा था। एक ओर तर्क का आकर्षण था, दूसरी ओर परम्परा का आग्रह, और इनके बीच खड़ा सामान्य व्यक्ति दिशाहीन-सा हो गया था। ऐसा प्रतीत होता था मानो एक ही वृक्ष की अनेक शाखाएँ अलग-अलग दिशाओं में फैलकर अपने मूल को ही भुलाने लगी हों। उसी समय भीतर से एक भावना उठती है कि अब इस बिखराव को समेटने के लिए, इस प्रवाह को फिर से एक दिशा देने के लिए किसी के आने की आवश्यकता थी ऐसे किसी के, जो केवल ज्ञान ही न दे, बल्कि उस ज्ञान को जीवन में उतारकर दिखा सके।

ऐसे ही समय में आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ। केरल के कालटी ग्राम में नम्बूदरी ब्राह्मण कुल में उनके पिता शिवगुरु और माता आर्याम्बा के यहाँ यह दिव्य बालक उत्पन्न हुआ। घर का वातावरण अत्यन्त साधु-संस्कारयुक्त था, इसलिए प्रारम्भ से ही शंकर पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। बचपन से ही उनकी बुद्धि तीव्र थी जो कुछ सुनते, उसे तुरंत ग्रहण कर लेते। अल्प आयु में ही उन्होंने अक्षरज्ञान के साथ-साथ वेदाध्ययन प्रारम्भ कर दिया। सामान्यतः जिस आयु में बालक खेल में रमे रहते हैं, उस आयु में शंकर वेद, उपनिषद और शास्त्रों का अध्ययन कर रहे थे। कहा जाता है कि पाँचवें वर्ष में उनका उपनयन संस्कार हुआ और उसके बाद उन्होंने गुरुकुल में रहकर वेदाध्ययन पूरा किया। आठ वर्ष की आयु तक वे वेदों में निपुण हो चुके थे यह बात केवल पढ़ने की नहीं, समझने की थी।

उनके भीतर वैराग्य भी उतनी ही जल्दी जाग गया था। यह वैराग्य किसी बाहरी प्रभाव से नहीं, बल्कि भीतर की समझ से उत्पन्न हुआ था। उन्हें संसार का आकर्षण बाँध नहीं पाता था। माता आर्याम्बा का उनके जीवन में विशेष स्थान था, क्योंकि पिता का देहावसान शीघ्र ही हो गया था। ऐसे में माता ही उनका आधार थीं, और उसी कारण संन्यास का विषय उनके लिए सरल नहीं था।

मगरमच्छ वाला प्रसंग इसी संदर्भ में अत्यन्त महत्वपूर्ण हो जाता है। लगभग आठ वर्ष की आयु में जब वे नदी में स्नान करने गए, तभी अचानक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया। उस संकट की घड़ी में उन्होंने अपनी माता से संन्यास लेने की अनुमति माँगी। यह केवल एक भावुक क्षण नहीं था, बल्कि भीतर के वैराग्य का प्रकट होना था। माता के लिए यह निर्णय अत्यन्त कठिन था, पर पुत्र की स्थिति देखकर उन्होंने अनुमति दे दी। जैसे ही अनुमति मिली, कहा जाता है कि मगरमच्छ ने उनका पैर छोड़ दिया। इस घटना के बाद उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और घर छोड़ दिया। यह कोई सामान्य त्याग नहीं था—एक बालक का अपनी माता से दूर होकर अज्ञात मार्ग पर निकल पड़ना, केवल इसलिए कि वह सत्य की खोज करना चाहता है यह बात अपने आप में बहुत कुछ कह देती है।

इसके पश्चात् उनका आगमन ओंकारेश्वर में हुआ, जहाँ उन्हें गोविन्द भगवत्पाद का सान्निध्य प्राप्त हुआ। यह प्रसंग उनके जीवन का अत्यन्त महत्वपूर्ण मोड़ था। नर्मदा तट की उस शान्त, साधनामयी भूमि में जब वे अपने गुरु के समक्ष उपस्थित हुए, तब गुरु ने उनसे एक सरल किन्तु गम्भीर प्रश्न किया “कः त्वम्?” यह प्रश्न केवल परिचय का नहीं, अपितु आत्मतत्त्व के उद्घाटन का था।

उस समय शंकर ने जो उत्तर दिया, वह उनके अन्तर्बोध का साक्षात् प्रकटीकरण था। उन्होंने अपने को देह, इन्द्रिय, मन और अहंकार से पृथक् करते हुए कहा

मनः बुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायु:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

अर्थ:
मैं मन, बुद्धि, अहंकार और चित्त नहीं हूँ। न ही मैं कान, जीभ, नाक और आँख जैसी इन्द्रियाँ हूँ। न मैं आकाश हूँ, न पृथ्वी, न अग्नि और न वायु। मेरा वास्तविक स्वरूप चिदानन्द है मैं शिवस्वरूप हूँ।

न च प्राणसंज्ञो न वै पंचवायु:
न वा सप्तधातुर्न वा पंचकोश:।
न वाक्पाणिपादं न चोपस्थपायु:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

अर्थ:
मैं प्राण नहीं हूँ, न ही पंचवायु हूँ। न मैं शरीर की सप्त धातुएँ हूँ और न पंचकोश। न मैं वाणी हूँ, न हाथ-पैर, न ही शरीर के अन्य अंग। मैं चिदानन्द स्वरूप शिव हूँ।

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहो

मदो नैव मे नैव मात्सर्यभाव:।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्ष:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

अर्थ:
मुझमें न राग है, न द्वेष; न लोभ है, न मोह; न अहंकार है, न ईर्ष्या। मैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इनसे भी परे हूँ। मेरा स्वरूप चिदानन्द है मैं शिव हूँ।

न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञा:।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

अर्थ:
मैं न पुण्य हूँ, न पाप; न सुख हूँ, न दुःख। न मैं मंत्र हूँ, न तीर्थ, न वेद, न यज्ञ। मैं न खाने वाला हूँ, न खाने की वस्तु, न खाने की क्रिया। मैं चिदानन्द स्वरूप शिव हूँ।

न मे मृत्युशंका न मे जातिभेद:
पिता नैव मे नैव माता न जन्म।
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

अर्थ:
मुझे मृत्यु का भय नहीं है, न कोई जातिभेद है। न मेरा कोई पिता है, न माता, न जन्म। न कोई अपना है, न पराया, न गुरु है, न शिष्य। मैं चिदानन्द स्वरूप शिव हूँ।

अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो
विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय:
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

अर्थ:
मैं निर्विकल्प हूँ, निराकार हूँ और सर्वत्र व्याप्त हूँ। मुझमें कोई बन्धन नहीं, इसलिए मुझे मुक्ति की आवश्यकता भी नहीं। मैं जानने योग्य वस्तु भी नहीं, बल्कि स्वयं चैतन्य हूँ मैं चिदानन्द स्वरूप शिव हूँ।

यह उत्तर किसी कण्ठस्थ शास्त्रीय उद्धरण के समान नहीं था, अपितु प्रत्यक्ष अनुभूति का निर्झर था। अल्पायु में ऐसी आत्मबोधपूर्ण वाणी सुनकर गुरु ने तत्काल उनके असाधारण स्वरूप को पहचान लिया। ओंकारेश्वर में उनके द्वारा प्राप्त शिक्षा केवल ग्रन्थाध्ययन तक सीमित नहीं रही, अपितु वह साधना, अनुभूति और आत्मानुभव से समन्वित थी। नर्मदा तट की उस साधना-भूमि में ही उनके भीतर अद्वैत का भाव दृढ़ हुआ, जो आगे चलकर उनके समस्त जीवनकार्य का आधार बना।

तत्पश्चात् गुरु की आज्ञा लेकर जब वे आगे बढ़े, तब उनके सामने केवल एक उद्देश्य था—वेदप्रतिष्ठा। इसी क्रम में उनका आगमन प्रयाग क्षेत्र में हुआ, जहाँ कुमारिल भट्ट उस समय विराजमान थे। परम्पराओं में कुमारिल भट्ट को ब्रह्मा का अंशावतार माना गया है ऐसा आचार्य, जिसने वेदों की रक्षा के लिए अपने जीवन को पूर्णतः समर्पित कर दिया। दूसरी ओर आदि शंकराचार्य को शिवावतार के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टि से जब इन दोनों का मिलन होता है, तो वह केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं रह जाता, बल्कि वह एक गहरी आध्यात्मिक परम्परा का संगम प्रतीत होता है जैसे सृष्टि और संहार की शक्तियाँ एक ही उद्देश्य में एकत्रित हो गई हों, धर्म की पुनः स्थापना के लिए।

जब शंकराचार्य वहाँ पहुँचे, तब उन्होंने जो दृश्य देखा, वह भीतर तक छू लेने वाला था। कुमारिल भट्ट प्रायश्चित्त में स्थित थे अग्नि के बीच, स्थिर, निर्विकार। यह कोई बाहरी तप नहीं था, यह भीतर की दृढ़ता का प्रमाण था। कहा जाता है कि उन्होंने बौद्धों के मध्य रहकर उनके सिद्धान्तों को जाना, उन्हें परखा और फिर उनका खण्डन किया, किन्तु उस प्रक्रिया में अपने गुरु के प्रति जो दोष लगा, उसे वे सहज भाव से स्वीकार कर रहे थे। उस समय उनके भीतर कोई क्लेश नहीं था, केवल एक संतोष था कि जो करना था, वह कर चुके।

शंकराचार्य उनके समीप पहुँचे। एक युवा संन्यासी, आँखों में जिज्ञासा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट उद्देश्य और सामने एक वृद्ध आचार्य, जिनकी साधना अपने अंतिम चरण में थी। शंकराचार्य ने प्रणाम कर अपनी इच्छा व्यक्त की शास्त्रार्थ की। उस क्षण कुमारिल भट्ट ने जो कहा, वह बहुत सरल था, पर उसका अर्थ बहुत गहरा था “अब यह कार्य मुझसे नहीं होगा, तुम मण्डन मिश्र के पास जाओ।” यह केवल शब्द नहीं थे, यह विश्वास था, यह आश्वासन था कि जो कार्य उन्होंने आरम्भ किया, उसे यह बाल संन्यासी पूर्ण करेगा।

उस समय का वह क्षण केवल देखा नहीं जाता, अनुभव किया जाता है। जैसे एक दीपक, जिसने अन्धकार में जलकर अपना कर्तव्य निभाया, अब अपनी ज्योति दूसरे दीपक को सौंप रहा हो। कुमारिल भट्ट के भीतर एक तृप्ति थी और शंकराचार्य के भीतर एक निश्चय। यह मिलन किसी प्रकार का औपचारिक आदान-प्रदान नहीं था, यह परम्परा का प्रवाह था एक से दूसरे में सहज रूप से आगे बढ़ता हुआ।

परम्परा में जब कहा जाता है कि एक ब्रह्मा का अंश है और दूसरा शिव का, तो उसका आशय केवल दैवीयता से नहीं, बल्कि उनके कार्य से भी जुड़ा है। एक ने ज्ञान की रक्षा की, दूसरे ने उसी ज्ञान को पुनः प्रकाशित किया। उस दृष्टि से यह मिलन एक सेतु के समान है जहाँ से शंकराचार्य का कार्य आगे बढ़ता है और एक नई गति प्राप्त करता है।

शंकराचार्य कुमारिल भट्ट समीप पहुँचे, प्रणाम किया और शास्त्रार्थ की इच्छा प्रकट की। यह सुनकर कुमारिल भट्ट ने बड़ी शान्ति से कहा “अब मुझसे यह कार्य नहीं होगा।” उनके स्वर में न दुर्बलता थी, न ही कोई खेद; बल्कि एक प्रकार की पूर्णता थी।

उन्होंने आगे कहा यदि वास्तव में तत्त्व की प्रतिष्ठा करनी है, तो मण्डन मिश्र के पास जाओ। वही इस कार्य के योग्य हैं।” यह वचन केवल मार्गदर्शन नहीं था, बल्कि एक प्रकार से उत्तरदायित्व का हस्तांतरण था। उस क्षण को यदि मन में चित्रित करें तो ऐसा लगता है मानो एक दीपक, जिसने अपना कार्य पूरा कर लिया है, अपनी ज्योति दूसरे दीपक को सौंप रहा हो। कुमारिल भट्ट ने स्वयं शास्त्रार्थ न करते हुए भी यह सुनिश्चित कर दिया कि वैदिक परम्परा की धारा रुकने न पाए।

इसके पश्चात् शंकराचार्य मण्डन मिश्र के गृह पहुँचे। वहाँ का वातावरण अत्यन्त सजीव था यज्ञ की वेदियाँ, वेदपाठ की ध्वनि, और कर्मकाण्ड की सुदृढ़ परम्परा। शास्त्रार्थ का आरम्भ हुआ तो वह किसी सभा का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक गम्भीर चिन्तन-प्रक्रिया थी। मण्डन मिश्र कर्ममीमांसा के पक्ष में अत्यन्त दृढ़ थे, और शंकराचार्य अद्वैत वेदान्त के आधार पर अपने विचार रख रहे थे। कई दिनों तक यह संवाद चलता रहा। बीच में भारती—जिन्हें शारदा भी कहा जाता है निर्णायक के रूप में उपस्थित थीं। वे केवल सुन नहीं रहीं थीं, बल्कि हर तर्क को परख भी रही थीं।

अन्ततः वह समय आया जब मण्डन मिश्र को यह स्वीकार करना पड़ा कि शंकराचार्य के तर्क अधिक सुसंगत हैं। परन्तु यहीं शारदा ने बात को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि अभी निर्णय पूर्ण नहीं हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे मण्डन मिश्र की अर्धांगिनी हैं, अतः आधा पक्ष उनका भी है। इसके बाद उन्होंने ऐसे प्रश्न उठाए जो सीधे गृहस्थ जीवन से जुड़े थे काम, दाम्पत्य, और व्यवहार के सूक्ष्म पक्ष। यह केवल प्रश्न नहीं थे, बल्कि यह परीक्षा थी कि ज्ञान कितना व्यापक है।

उस समय शंकराचार्य ने कोई उतावलापन नहीं दिखाया। उन्होंने शांत भाव से समय माँगा। परम्परा में यहीं परकाय प्रवेश का प्रसंग आता है। कहा जाता है कि उन्होंने योगबल से एक मृत राजा के शरीर में प्रवेश किया, कुछ समय तक वहाँ रहकर लौकिक जीवन का अनुभव प्राप्त किया और फिर लौटकर अपने शरीर में प्रवेश किया। इसके बाद जब उन्होंने शारदा के प्रश्नों का उत्तर दिया, तो उसमें एक प्रकार की पूर्णता थी—न केवल शास्त्र का आधार, बल्कि अनुभव की दृढ़ता भी।

तब शारदा संतुष्ट हुईं और उन्होंने उनकी विजय स्वीकार की। इसके पश्चात् मण्डन मिश्र ने संन्यास ग्रहण कर लिया और सुरेश्वराचार्य के रूप में शंकराचार्य के साथ हो गए। इस पूरे प्रसंग को केवल विजय-पराजय के रूप में नहीं देखा जा सकता। यहाँ जो दिखता है, वह यह है कि जहाँ सत्य स्पष्ट हो जाता है, वहाँ व्यक्ति अपने पूर्व आग्रहों को छोड़ने में संकोच नहीं करता। यही उस युग की परम्परा की शक्ति थी और यही इस प्रसंग की वास्तविक गहराई भी है।

काशी का वह प्रसंग जितना सुना जाता है, उतना ही भीतर उतरता जाता है। काशी की उन संकरी गलियों में प्रातःकाल का समय था। शंकराचार्य अपने शिष्यों के साथ गंगास्नान के लिए जा रहे थे। सामने से एक चाण्डाल अपने कुत्तों के साथ आ रहा था। उस समय जैसा व्यवहार समाज में प्रचलित था, वैसा ही सहज भाव से उनके मुख से भी निकला हटो।”

परन्तु जो उत्तर मिला, वह साधारण नहीं था। चाण्डाल ने अत्यन्त शांत स्वर में पूछा हे आचार्य, आप किसे हटने को कह रहे हैं? इस देह को, जो पंचभूतों से बनी है, या उस आत्मा को, जो सर्वत्र एक ही है?” यह प्रश्न जैसे सीधे भीतर जाकर ठहर गया। जिस अद्वैत सिद्धान्त को वे अब तक शास्त्रों में कहते और समझाते आए थे, वही उस क्षण उनके सामने जीवित रूप में खड़ा हो गया।

उसी क्षण भीतर एक परिवर्तन हुआ। भेद का जो सूक्ष्म संस्कार रह जाता है, वह भी जैसे टूट गया। परम्परा में यह भी कहा गया है कि वह चाण्डाल कोई साधारण व्यक्ति नहीं था, स्वयं भगवान शिव ही उस रूप में आकर आचार्य की परीक्षा ले रहे थे। इस भाव को समझते ही शंकराचार्य का मन पूर्णतः विनम्र हो गया। उन्होंने तत्काल उस चाण्डाल को प्रणाम किया और उसे गुरु के रूप में स्वीकार किया।

उसी अनुभूति से “मनीषा पंचकम्” के श्लोक निकले

ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्रविस्तारितं
सर्वं चैतदविद्यया त्रिगुणया अशेषं मया कल्पितम्।
इत्येवं यस्य दृढा मतिः सुखतरे नित्ये परे निर्मले
चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम॥

अर्थ:
जो यह जान ले कि सब ब्रह्म ही है और भेद केवल अज्ञान का है वह चाहे चाण्डाल हो या ब्राह्मण, वही मेरे लिए गुरु है यही मेरी दृढ़ भावना है।

ब्रह्मैवेदं जगदखिलं न च किञ्चित् पृथक् तत्त्वतो
ब्रह्माद्यन्तविहीनमेकमनघं शुद्धं निराकारकम्।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं
चाण्डालोऽस्तु स तु द्विजोऽस्तु गुरुरित्येषा मनीषा मम।।

अर्थ:
यह सम्पूर्ण जगत ब्रह्म ही है, इससे अलग कुछ नहीं। जो इस सत्य को जान ले, वही पूज्य है उसकी जाति का कोई महत्व नहीं।

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं
यशश्चारुचित्रं धनं मेरुतुल्यम्।
मनश्चेन न लग्नं गुरोरङ्घ्रिपद्मे
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥

अर्थ:
यदि मन गुरु के चरणों में स्थिर न हो, तो रूप, धन, यश सब व्यर्थ है।

न मे द्वेषरागौ न मे लोभमोहो
मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः।
न धर्मो न चार्थो न कामो न मोक्षः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

मैं न राग-द्वेष से बंधा हूँ, न लोभ-मोह से मैं चिदानन्दरूप शिव हूँ।

यः सर्वत्रात्मानमेवाभिपश्येत्
सर्वं चात्मनि पश्यति बुद्धिमान् यः।
तस्य नास्ति विभेदः कदाचन
एषा मनीषा मम॥

अर्थ:
जो सबमें एक ही आत्मा को देखता है, उसके लिए कोई भेद नहीं रहता यही मेरी मान्यता है।

शंकराचार्य कैसे बनते हैं? योग्यता, प्रक्रिया और परंपरा

इस पूरे प्रसंग में सबसे गहरी बात यही है कि यहाँ शास्त्र का ज्ञान व्यवहार में उतरता हुआ दिखाई देता है। जहाँ एक चाण्डाल को गुरु के रूप में स्वीकार किया गया और वह भी इस भाव से कि स्वयं भगवान ही उस रूप में सामने आए थे। यही वह क्षण है जहाँ अद्वैत केवल विचार नहीं रहता, बल्कि जीवन का सत्य बन जाता है।

इसके बाद उनकी दिग्विजय यात्रा अपने पूरे विस्तार के साथ सामने आती है। अब वे जहाँ भी जाते हैं, वहाँ केवल उपदेश नहीं देते, बल्कि उस समय समाज में फैले हुए मतभेदों से सीधे सामना करते हैं। बौद्ध, जैन, चार्वाक, कापालिक, पाशुपत, तांत्रिक इन सबका प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई देता था। कहीं वेदों का निषेध था, कहीं केवल कर्मकाण्ड का आग्रह, तो कहीं तंत्र के नाम पर विचित्र आचरण। ऐसे में सामान्य व्यक्ति के लिए धर्म का स्वरूप समझना कठिन हो गया था।
शंकराचार्य का ढंग अलग था। वे पहले सुनते थे, फिर प्रश्न उठाते थे और फिर बात को मूल तक ले जाते थे। बौद्ध आचार्यों से चर्चा में वे शून्यवाद की सीमा बताते, जैन मत के साथ संवाद में अनेकांतवाद की अपूर्णता पर प्रकाश डालते, और चार्वाक जैसे मतों के सामने प्रत्यक्ष के अतिरिक्त प्रमाणों की आवश्यकता समझाते। उनका खण्डन किसी को नीचा दिखाने के लिए नहीं होता था, बल्कि बात को स्पष्ट करने के लिए होता था। धीरे-धीरे जहाँ-जहाँ वे गए, वहाँ लोगों को यह समझ आने लगा कि बात केवल मत की नहीं, तत्त्व की है।

तंत्र के क्षेत्र में भी उन्होंने हस्तक्षेप किया। जहाँ साधना के नाम पर अनुशासन टूट रहा था, वहाँ उन्होंने मर्यादा की बात कही। इस प्रकार उनका कार्य केवल शास्त्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यवहार तक पहुँच गया।
इन यात्राओं में वे अकेले नहीं थे। उनके साथ उनके शिष्य भी थे, और यही उनकी शक्ति भी थी। पद्मपाद, जो प्रारम्भ से उनके साथ जुड़े, उन्होंने गुरु की बात को गहराई से समझा और आगे बढ़ाया। सुरेश्वराचार्य जो पहले मण्डन मिश्र के रूप में जाने जाते थे शास्त्रार्थ के बाद उनके प्रमुख शिष्यों में सम्मिलित हुए और अद्वैत वेदान्त को विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके अतिरिक्त हस्तामलक और तोटकाचार्य जैसे शिष्य भी उनके साथ जुड़े, जिनमें प्रत्येक की अपनी विशेषता थी।

ये शिष्य केवल साथ चलने वाले नहीं थे, बल्कि जहाँ-जहाँ जाते, वहाँ वही बात अपने ढंग से लोगों तक पहुँचाते थे। कई स्थानों पर शंकराचार्य स्वयं आगे बढ़ जाते, और उनके शिष्य वहाँ रुककर उस परम्परा को आगे बढ़ाते। इस प्रकार कार्य एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अनेक लोगों के माध्यम से फैलने लगा।
चारों दिशाओं में मठों की स्थापना भी इसी सोच का परिणाम थी। इन मठों में उनके शिष्यों को आचार्य के रूप में स्थापित किया गया, ताकि यह धारा आगे भी चलती रहे। इस प्रकार उनकी दिग्विजय यात्रा केवल एक आचार्य की यात्रा नहीं रही, बल्कि एक परम्परा का विस्तार बन गई जहाँ गुरु और शिष्य मिलकर एक ही कार्य को आगे बढ़ाते हैं।

और जब इन सब घटनाओं जन्म से लेकर दिग्विजय, शास्त्रार्थ, मठ-स्थापना और समाज को एक सूत्र में बाँधने के प्रयास को एक साथ रखकर देखा जाता है, तब मन सच में ठहर जाता है। बार-बार यही प्रश्न उठता है कि यह सब केवल बत्तीस वर्ष की आयु में कैसे संभव हुआ। केरल के एक छोटे से ग्राम से निकलकर आदि शंकराचार्य ने सम्पूर्ण भारत का भ्रमण किया नर्मदा तट से लेकर काशी, प्रयाग, बद्रीनाथ, श्रृंगेरी, द्वारका और पुरी तक। उन्होंने केवल यात्रा नहीं की, बल्कि जहाँ-जहाँ गए वहाँ विचार का पुनर्संयोजन किया। ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् और गीता पर भाष्य लिखकर उन्होंने वेदान्त को एक सुसंगत रूप दिया। यह कार्य साधारण नहीं है आज भी वे भाष्य दार्शनिक आधार माने जाते हैं।

उस समय की स्थिति को यदि ध्यान में रखें, तो बात और स्पष्ट होती है। अनेक मत बौद्ध, जैन, चार्वाक, तांत्रिक परम्पराएँ समाज को अलग-अलग दिशाओं में ले जा रहे थे। वैदिक धर्म कहीं कर्मकाण्ड में उलझ गया था, तो कहीं उसकी प्रामाणिकता पर ही प्रश्न उठ रहे थे। ऐसे समय में शंकराचार्य ने केवल विरोध नहीं किया, बल्कि एक वैचारिक आधार प्रस्तुत किया अद्वैत वेदान्त का। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि मूल सत्य एक है, और उसी से सब कुछ जुड़ा है। यही वह सूत्र था, जिसने बिखराव को समेटने का कार्य किया।

उनकी दिग्विजय यात्रा में केवल शास्त्रार्थ नहीं थे, बल्कि संवाद थे विचारों का परीक्षण था। मण्डन मिश्र जैसे आचार्य का उनके साथ जुड़ना और आगे चलकर सुरेश्वराचार्य बनना, यह दिखाता है कि यह केवल वाद-विवाद नहीं था, बल्कि सत्य की स्वीकृति थी। पद्मपाद, हस्तामलक, तोटकाचार्य जैसे शिष्य उनके साथ जुड़े और उन्होंने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। चारों दिशाओं में मठों की स्थापना श्रृंगेरी (दक्षिण), द्वारका (पश्चिम), बद्रीनाथ (उत्तर), पुरी (पूर्व) यह केवल धार्मिक केन्द्र नहीं थे, बल्कि वैचारिक स्थिरता के आधार थे, जिनसे यह परम्परा निरंतर चलती रहे।

जब यह सब देखते हैं, तो यह भी स्पष्ट होता है कि उन्होंने जो किया, वह केवल अपने समय तक सीमित नहीं रहा। उनके द्वारा स्थापित वैचारिक और संस्थागत आधार ने आगे आने वाले समय में भारतीय समाज को एक पहचान दी। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं लगता कि उन्होंने वैदिक परम्परा को एक नई सुसंगति और शक्ति दी, जिससे वह आगे भी टिक सकी।

उनका तिरोधान भी उतना ही शांत बताया जाता है—कुछ परम्पराएँ केदारनाथ का उल्लेख करती हैं, कुछ कांची का पर एक बात समान है, उन्होंने कोई प्रदर्शन नहीं किया। जैसे जीवन भर बिना शोर के कार्य किया, वैसे ही अंत भी बिना किसी दावे के हुआ।

धीरे-धीरे यह भी समझ में आता है कि उन्होंने जो किया, उसी ने आगे के समय के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया। भारत ने आगे अनेक आक्रमण देखे, अनेक परिवर्तन हुए परन्तु भीतर जो वैचारिक एकता बनी रही, वह अचानक नहीं बनी थी। उसके पीछे ऐसे ही कार्यों की नींव थी। इस दृष्टि से देखें तो उनका कार्य केवल अपने समय का नहीं, बल्कि आने वाले समय की रक्षा का भी कार्य था।

और तब यह बात मन में और स्पष्ट होती है कि उनकी जन्मजयंती केवल स्मरण का दिन नहीं है। यह केवल इतना नहीं कि हम उन्हें याद करें और आगे बढ़ जाएँ। यह दिन जैसे भीतर से यह कहता है कि जिनके कारण यह परम्परा आज भी जीवित है, उनके प्रति कृतज्ञ होना भी आवश्यक है।

कृतज्ञता केवल शब्दों से नहीं होती। वह तब होती है जब हम समझते हैं कि उन्होंने क्या किया, और जो उन्होंने संभाला, उसे आगे भी बनाए रखने का प्रयास करते हैं। उनकी परम्परा केवल इतिहास की बात नहीं है वह आज भी उतनी ही जीवंत है, जितनी तब थी।

और शायद यही सबसे महत्वपूर्ण बात है उन्होंने जो धारा फिर से प्रवाहित की, वह हमारे पास पहुँची है। अब उसे बनाए रखना, समझना और आगे बढ़ाना यही उनके प्रति सच्चा सम्मान है, यही उनकी जन्मजयंती का वास्तविक अर्थ है।

 

✍️दीपक कुमार द्विवेदी

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Tags: #AdiShankaracharyaJayanti #Shankaracharya2026 #SpiritualWisdom #IndianPhilosophy #CelebrateHeritage

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