हिंदी विवेक
  • Login
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
No Result
View All Result
हिंदी विवेक
No Result
View All Result
मोदी के राष्ट्रहित के आह्वान में भी राजनीति क्यों?

मोदी के राष्ट्रहित के आह्वान में भी राजनीति क्यों?

by हिंदी विवेक
in राजनीति
0

आज पूरी दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं ने मानव सभ्यता को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है। खाड़ी देशों में लंबे समय से चल रहे संघर्ष और युद्ध की विभीषिका ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे तक प्रभावित किया है।

कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखलाओं का बाधित होना, डॉलर के मुकाबले विभिन्न देशों की मुद्राओं का कमजोर होना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उत्पन्न असंतुलन ने लगभग हर राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित किया है। भारत भी इन परिस्थितियों से अछूता नहीं रह सकता।

India Energy Security: Congress Slams PM Modi Over Fuel Use

भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है और सोने का भी विश्व के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से ईंधन के संयमित उपयोग और सोने की खरीद को सीमित करने का आह्वान केवल एक आर्थिक सलाह नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में किया गया दूरदर्शी चिंतन है।

दुर्भाग्य यह है कि मोदी की मितव्ययिता की अपील पर पूरे देश को एकजुट होकर गंभीरता से विचार करना चाहिए था, उस विषय को भी राजनीतिक विवाद का हथियार बना दिया गया। कुछ विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री की इस अपील को जनता में भय फैलाने वाला कदम बताया, तो कुछ ने इसे सरकार की विफलताओं को छिपाने का प्रयास कहा, जबकि वस्तुतः यह अपील राष्ट्र को भविष्य की संभावित चुनौतियों के प्रति सचेत करने और समय रहते आत्मानुशासन अपनाने का संदेश है।

यह राजनीति का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी का प्रश्न है। जब विश्व के बड़े-बड़े राष्ट्र आर्थिक संकटों से जूझ रहे हों, तब भारत के प्रधानमंत्री यदि नागरिकों को संयम एवं मितव्ययिता का सूत्र देते हैं तो उसे राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दृष्टि से देखा जाना चाहिए। यह पहला अवसर नहीं है, जब प्रधानमंत्री ने देश की तरक्की को बनाए रखने की सामूहिक चिन्ता करते हुए मितव्ययिता एवं संयम की अपील की हो।

भारत की संस्कृति मूलतः संयम प्रधान रही है। भारतीय जीवन-दर्शन में संयम को केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। हमारे ऋषियों, मुनियों और महापुरुषों ने सदैव आवश्यकता और विलासिता के बीच अंतर करना सिखाया। महावीर, बुद्ध, गांधी और विनोबा भावे जैसे महापुरुषों ने त्याग और संयम को ही मानवता की सबसे बड़ी शक्ति बताया।

भारतीय संस्कृति कहती है कि जितना आवश्यक हो उतना ही उपभोग करो, क्योंकि असीमित उपभोग अंततः संकट को जन्म देता है। यही कारण है कि भारतीय सभ्यता हजारों वर्षों तक टिकाऊ और संतुलित बनी रही। आज जब पूरी दुनिया उपभोक्तावाद के दुष्परिणाम भुगत रही है, तब भारत की यही संयम आधारित संस्कृति समाधान का मार्ग दिखा सकती है।

सोने के प्रति भारतीय समाज का आकर्षण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर गहरा रहा है। विवाह, पारिवारिक उत्सव, धार्मिक परंपराएं और सामाजिक प्रतिष्ठा में सोने का विशेष स्थान है, लेकिन यह भी एक कठोर सत्य है कि भारत का अधिकांश सोना आयातित होता है। हर वर्ष अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सोने के आयात पर खर्च होता है। यह सोना उत्पादन या औद्योगिक विकास में उपयोग होने के बजाय घरों और लॉकरों में बंद होकर निष्क्रिय पड़ा रहता है।

Gold rate today: Gold prices down from life-time highs - what's making gold  so volatile? - Times of India

ऐसे समय में जब विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा हो और रुपये की कीमत लगातार गिर रही हो, तब सोने की खरीद में संयम बरतने की अपील आर्थिक दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक है। यह किसी की परंपराओं के विरोध में नहीं, बल्कि देश की आर्थिक मजबूती के पक्ष में उठाया गया कदम है।

इसी प्रकार ईंधन के उपयोग में संयम भी समय की आवश्यकता है। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित तेल पर निर्भर है। खाड़ी देशों में युद्ध और अस्थिरता के कारण तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। इसका सीधा प्रभाव पेट्रोल, डीजल, परिवहन, उद्योग और महंगाई पर पड़ता है। यदि नागरिक ईंधन के अनावश्यक उपयोग को सीमित करें, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करें, ऊर्जा बचत को जीवनशैली का हिस्सा बनाएं, तो इससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी।

संयम का अर्थ केवल त्याग नहीं होता, बल्कि दूरदर्शिता और जिम्मेदारी भी होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील इसी जिम्मेदारी की भावना से प्रेरित प्रतीत होती है। उन्होंने किसी प्रकार की जबरदस्ती या प्रतिबंध की बात नहीं की, बल्कि नागरिकों से स्वैच्छिक सहयोग की अपेक्षा की। यह लोकतांत्रिक नेतृत्व की पहचान है।

एक जिम्मेदार प्रधानमंत्री का कर्तव्य केवल संकट आने पर कदम उठाना नहीं होता, बल्कि संकट के संकेतों को पहचानकर समय रहते जनता को तैयार करना भी होता है। आज जब दुनिया के कई देशों में आर्थिक अस्थिरता के कारण भारी महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक तनाव देखने को मिल रहे हैं, तब भारत अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति में है।
यह केवल संयोग नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पिछले वर्षों में अपनाई गई आर्थिक नीतियों, बुनियादी ढांचे के विस्तार, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भर भारत अभियान और वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत स्थिति का परिणाम है।

यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वव्यापी संकटों के बावजूद भारत ने अपने नागरिकों पर अत्यधिक आर्थिक बोझ नहीं पड़ने दिया। महामारी से लेकर युद्धजनित परिस्थितियों तक भारत सरकार ने लगातार राहत योजनाएं चलाईं, गरीबों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया, किसानों और मध्यम वर्ग को विभिन्न प्रकार की सहायता दी तथा अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने के लिए अनेक कदम उठाए। वैश्विक मंदी और युद्ध के वातावरण में भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना हुआ है। यह प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व और दूरदर्शिता का प्रमाण है।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देशहित के ऐसे विषयों पर भी कुछ राजनीतिक दल संकीर्ण राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रहे। लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सभी को है, लेकिन हर विषय को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू में तौलना राष्ट्रहित के विरुद्ध है। यदि प्रधानमंत्री जनता से संयम की अपील करते हैं तो विपक्ष को चाहिए कि वह भी जनता को जागरूक करे, न कि भय और भ्रम का वातावरण बनाए।

राजनीति तब तक स्वस्थ मानी जाती है जब तक वह राष्ट्रहित से जुड़ी रहे, लेकिन जब राजनीति केवल विरोध के लिए विरोध करने लगे और राष्ट्रीय संकटों को भी अवसर की तरह देखने लगे, तब वह लोकतंत्र को कमजोर करती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि पूरा देश एक परिवार की तरह सोचते हुए राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि माने। संकट के समय संयम, अनुशासन और सहयोग ही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। भारत ने इतिहास में अनेक बार यह सिद्ध किया है कि जब भी राष्ट्र पर संकट आया, भारतीय समाज ने अद्भुत त्याग और एकता का परिचय दिया। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर युद्धकाल तक, भारतीय जनता ने अपने निजी हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को महत्व दिया है। आज फिर वही समय है जब हमें समझना होगा कि अनावश्यक उपभोग, दिखावे की प्रवृत्ति और अंधाधुंध विलासिता अंततः देश की आर्थिक मजबूती को कमजोर करती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। यह केवल सोना न खरीदने या ईंधन बचाने का संदेश नहीं, बल्कि आत्मसंयम, आत्मअनुशासन और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का संदेश है। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर भी यही रहा है कि व्यक्ति अपने आचरण से समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाए। यदि हम संयम को जीवन का हिस्सा बना लें तो अनेक आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान स्वतः संभव हो सकता है।

आज दुनिया जिस अनिश्चितता और संकट के दौर से गुजर रही है, उसमें भारत अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में खड़ा है। इसका श्रेय देश की जनता की सामर्थ्य के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को भी जाता है। ऐसे समय में आवश्यकता राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सकारात्मक सोच की है। संयम केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का आधार है। यदि हम इस भावना को समझ सकें, तो न केवल वर्तमान संकटों का सामना कर पाएंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर सकेंगे।

– ललित गर्ग

Share this:

  • Share on X (Opens in new window) X
  • Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
  • Share on LinkedIn (Opens in new window) LinkedIn
  • Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
  • Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
Tags: #reach#worldgoldnewsindiamodijimodinewsviral

हिंदी विवेक

Next Post
कांग्रेस-विपक्ष के खेमे में कट्टरपंथी और अलगाववादी शक्तियाँ

कांग्रेस-विपक्ष के खेमे में कट्टरपंथी और अलगाववादी शक्तियाँ

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हिंदी विवेक पंजीयन : यहां आप हिंदी विवेक पत्रिका का पंजीयन शुल्क ऑनलाइन अदा कर सकते हैं..

Facebook Youtube Instagram

समाचार

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लोकसभा चुनाव

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

लाइफ स्टाइल

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

ज्योतिष

  • मुख्य खबरे
  • मुख्य खबरे
  • राष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • क्राइम
  • क्राइम

Copyright 2024, hindivivek.com

Facebook X-twitter Instagram Youtube Whatsapp
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वाक
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण
  • Privacy Policy
  • Terms and Conditions
  • Disclaimer
  • Shipping Policy
  • Refund and Cancellation Policy

copyright @ hindivivek.org by Hindustan Prakashan Sanstha

Welcome Back!

Login to your account below

Forgotten Password?

Retrieve your password

Please enter your username or email address to reset your password.

Log In

Add New Playlist

No Result
View All Result
  • परिचय
  • संपादकीय
  • पूर्वांक
  • ग्रंथ
  • पुस्तक
  • संघ
  • देश-विदेश
  • पर्यावरण
  • संपर्क
  • पंजीकरण

© 2024, Vivek Samuh - All Rights Reserved

0