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आषाढ़ी वारी भक्ति का महापर्व

आषाढ़ी वारी भक्ति का महापर्व

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग, सामाजिक
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पंढरपुर वारी भारतीय आध्यात्मिक चेतना, संत परम्परा और सांस्कृतिक विरासत का ऐसा अमूल्य प्रतीक है, जो हमें सिखाती है कि प्रेम ही धर्म है, सेवा ही साधना है और नामस्मरण ही ईश्वर तक पहुंचने का सबसे सरल मार्ग है।

भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परम्पराओं में महाराष्ट्र की पंढरपुर वारी का विशिष्ट स्थान है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि भक्ति, सेवा, समानता, अनुशासन और सामाजिक समरसता का जीवंत महापर्व है। लगभग आठ शताब्दियों से चली आ रही यह परम्परा आज भी उतनी ही प्रासंगिक और प्रेरणादायी है, जितनी अपने प्रारम्भिक काल में थी। प्रतिवर्ष लाखों वारकरी सैकड़ों किलोमीटर की पदयात्रा कर भगवान श्री विठ्ठल-रुक्मिणी के दर्शन के लिए पंढरपुर पहुंचते हैं। इस यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें जाति, धर्म, भाषा, वर्ग और आर्थिक स्थिति का कोई भेदभाव नहीं होता। सभी एक-दूसरे को माऊली कहकर सम्बोधित करते हैं, जो प्रेम, सम्मान और समानता का प्रतीक है।

Millions of devotees embark on spiritual journey for Ashadhi ...

‘वारी’ का अर्थ है निश्चित समय पर श्रद्धा और नियमपूर्वक तीर्थयात्रा करना। भगवान श्री विठ्ठल की उपासना प्राचीन काल से होती रही है, परंतु 13 वीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर महाराज, संत नामदेव महाराज, संत एकनाथ महाराज और संत तुकाराम महाराज ने वारकरी सम्प्रदाय को संगठित स्वरूप प्रदान किया।

इन संतों ने भक्ति को कर्मकांडों की सीमाओं से निकालकर जन-जन तक पहुंचाया तथा नामस्मरण, सेवा, कीर्तन और समरसता को जीवन का आधार बनाया। उनके प्रयासों से वारी केवल धार्मिक आयोजन न रहकर आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जागरण का व्यापक आंदोलन बन गई। महाराष्ट्र में आषाढ़ी वारी का आरम्भ प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में होता है। इस वारी की दो प्रमुख पालकियां संत ज्ञानेश्वर महाराज की आलंदी तथा संत तुकाराम महाराज की देहू से प्रस्थान करती हैं। संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी आलंदी से निकलकर पुणे, सासवड, जेजुरी, वाल्हे, लोणंद, तरडगांव, फलटन, बरड, नातेपुते, मालशिरस, वेलापुर, बांडीशेगांव, पिराची कुरोली और वाखड़ी होते हुए पंढरपुर पहुंचती है।

वहीं संत तुकाराम महाराज की पालकी देहू से आकुर्डी होते हुए पुणे पहुंचती है और वहां से संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी के साथ उसी मार्ग पर आगे बढ़ते हुए पंढरपुर पहुंचती है। लगभग 250 से 300 किलोमीटर की यह पदयात्रा 18 से 21 दिनों में पूर्ण होती है। मार्ग में हजारों श्रद्धालु पालकियों पर पुष्पवर्षा, भजन-कीर्तन और जयघोष के साथ स्वागत करते हैं।

आध्यात्मिक साधना एवं आत्मशुद्धि ...

जगह-जगह हरिपाठ, अभंग-कीर्तन, प्रवचन, महाप्रसाद, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, पेयजल व्यवस्था तथा वारकरियों की सेवा के लिए अनेक सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाएं समर्पित भाव से कार्य करती हैं। आषाढ़ी एकादशी के दिन सभी पालकियां पंढरपुर विठोबा मंदिर पहुंचती हैं। परम्परा के अनुसार श्रद्धालु भगवान श्री विठ्ठल-रुक्मिणी के दर्शन से पूर्व पवित्र भीमा (चंद्रभागा) नदी में स्नान करते हैं और तत्पश्चात मंदिर में दर्शन कर अपनी वारी को पूर्णता प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त कार्तिकी, माधी और चैत्री एकादशी पर भी वारी निकाली जाती है, पर आषाढ़ी और कार्तिकी वारी का विशेष महत्व माना जाता है।

आज जिस पालकी परम्परा का भव्य स्वरूप दिखाई देता है, उसका औपचारिक प्रारम्भ सन् 1685 में संत तुकाराम महाराज के पुत्र नारायण महाराज ने किया। बाद में संत ज्ञानेश्वर महाराज सहित अन्य संतों की पालकियां भी इस परम्परा का हिस्सा बनीं। आज यह परम्परा महाराष्ट्र की सांस्कृतिक धरोहर और भारतीय संत परम्परा की अमूल्य विरासत मानी जाती है।

वारी का मूल आधार आध्यात्मिक साधना है। वारकरी सम्प्रदाय का विश्वास है कि ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग आडम्बर नहीं बल्कि नामस्मरण, सेवा, विनम्रता और निष्काम भक्ति है। यात्रा के दौरान प्रतिदिन काकड़ आरती, हरिपाठ, अभंग-कीर्तन, भजन और संतवाणी का सामूहिक गायन होता है। ढोल, मृदंग, वीणा, झांझ और चिपलियों की मधुर ध्वनि के बीच ज्ञानोबा-तुकाराम, राम कृष्ण हरी और जय हरी विठ्ठल के जयघोष वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।

पंढरपुर वारी महाराष्ट्र की संत परम्परा का जीवंत स्वरूप  है। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, संत नामदेव, संत एकनाथ, संत चोखामेला, संत जनाबाई, संत सावता माली, संत गोरा कुम्भार और संत नरहरी सोनार जैसे संतों ने अपने अभंगों और जीवन से समाज को प्रेम, समानता, सेवा और भक्ति का संदेश दिया। वारी उन्हीं आदर्शों को व्यवहार में उतारने का सशक्त माध्यम है।

Pandharpur Wari & Ringan from Mumbai 2026

वारी का सबसे प्रेरणादायक पक्ष उसका अनुशासन और सेवा-भाव है। हजारों दिंडियां निश्चित समय और सुव्यवस्थित व्यवस्था के साथ आगे बढ़ती हैं। वारकरी सामूहिक भोजन करते हैं. स्वच्छता बनाए रखते हैं, एक-दूसरे की सेवा करते हैं और मानव सेवा को ईश्वर सेवा मानते हैं। लाखों लोगों का बिना किसी भेदभाव के एक साथ चलना सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है।

महाराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान के रूप में भी वारी का विशेष महत्व है। अभंग, कीर्तन, भारूड, लोकसंगीत और संत साहित्य की परम्परा इसी यात्रा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रही है। गांव-गांव में पालकियों का स्वागत, संत साहित्य का पाठ और सामूहिक भक्ति महाराष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना को सशक्त बनाते हैं। आज वारी महाराष्ट्र की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय और वैश्विक पहचान प्राप्त कर चुकी है। कर्नाटक, गोवा, तेलंगाना, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित अनेक राज्यों में वारकरी परम्परा से प्रेरित होकर पालकी यात्राएं, हरिपाठ, नामस्मरण और विठ्ठल भक्ति के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त अरब अमीरात, सिंगापुर और न्यूजीलैंड सहित अनेक देशों में बसे मराठी समाज द्वारा भी आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर विठ्ठल-रुक्मिणी पूजन, पालकी यात्रा और अभंग-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। इससे भारतीय संत परम्परा और वारी की वैश्विक पहचान निरंतर सशक्त हो रही है।

प्रेम कुमार चौबे

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