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जंतर-मंतर पर लोकतंत्र, रांची में सन्नाटा!

जंतर-मंतर पर लोकतंत्र, रांची में सन्नाटा!

by हिंदी विवेक
in ट्रेंडींग, युवा
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लोकतंत्र की असली परीक्षा उस समय भी न्याय के पक्ष में खड़े रहने में होती है, जब सामने वाली सत्ता अपनी विचारधारा की हो। दरअसल, आज झारखंड के रांची में JPSC-JSSC परीक्षाओं में कथित धांधली और अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन कर रहे छात्रों पर पुलिस कार्रवाई ने देश के तथाकथित ‘लिबरल’ और वामपंथी विमर्श को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल सिर्फ लाठीचार्ज का नहीं है। सवाल उस राजनीतिक चयन का है, जिसमें एक जगह छात्रों पर कार्रवाई लोकतंत्र की हत्या बन जाती है और दूसरी जगह वही कार्रवाई अचानक प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई दिखाई देने लगती है।

रांची में रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की निष्पक्षता को लेकर छात्र लंबे समय से आंदोलनरत हैं। आंदोलन 18वें दिन तक पहुंच चुका है और सरकार तथा प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच बातचीत के कई दौर के बावजूद समाधान नहीं निकला। सोमवार को विधानसभा घेराव के दौरान स्थिति तनावपूर्ण हुई। पुलिस ने पानी की बौछार, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया।
Jharkhand protesters defy barricades, stage sit-in near assembly; cops use force - Rediff.com

छात्रों का सवाल सत्ता से है, राजनीति से नहीं

यह समझना जरूरी है कि किसी छात्र आंदोलन को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता, क्‍योंकि उसके प्रभाव के परिणाम स्‍वरूप कहीं सत्‍ता हाथ से न निकल जाए! क्‍योंकि छात्र इस आन्‍दोलन के माध्‍यम से जो मूल प्रश्न उठा रहे हैं, वह यही है कि परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों की जांच पारदर्शिता के साथ होनी चाहिए। वे हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा झारखंड सरकार जिसमें कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) शामिल हैं, आज पूछ रहे हैं कि क्‍या सोरेन सरकार के रहते युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों का पारदर्शी समाधान होगा या नहीं?

फिर यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण है तो पुलिस बल प्रयोग की आवश्यकता क्यों पड़ी? वस्‍तुत: यही प्रश्न जंतर-मंतर पर भी पूछे गए थे। वहां प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर आंदोलन कर रहे छात्रों के समर्थन में विपक्ष के बड़े नेता पहुंचे। राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारी छात्रों से मुलाकात की, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग की और छात्रों के साथ खड़े होने का सार्वजनिक संदेश दिया। जंतर-मंतर के प्रदर्शन को लेकर विपक्षी नेताओं की सक्रियता इतनी स्पष्ट थी कि संसद के भीतर और बाहर भी उसका राजनीतिक प्रभाव दिखाई दिया, तो फिर रांची में वही राजनीतिक नैतिकता इतनी कमजोर क्यों पड़ जाती है?

जंतर-मंतर का आक्रोश क्या रांची की सीमा पर खत्म हो जाता है?

वास्‍तव में आज यही वह सवाल है जिसे हर कोई देशभक्‍त उठा रहा है। वे पूछ रहे हैं कि झारखंड में छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के समय वही लोग क्यों दिखाई नहीं दे रहे, जोकि दूसरे मामलों में लोकतंत्र, अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सबसे आगे खड़े दिखाई देते हैं। निश्‍चित ही ये प्रश्‍न लोकतांत्रिक है, क्या छात्र के अधिकार का मूल्य इस बात से तय होगा कि वह किस सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहा है?

यदि केंद्र सरकार के खिलाफ छात्र प्रदर्शन करे तो वह लोकतंत्र की आवाज है, किंतु किसी विपक्ष शासित राज्य सरकार के खिलाफ वही छात्र प्रदर्शन करे तो वह कानून-व्यवस्था की समस्या है! यह दृष्टिकोण लोकतंत्र को कमजोर करता है। लोकतंत्र में सरकार केंद्र की हो या राज्य की, विरोध करने वाला छात्र और उसकी समस्‍याएं, समान होती हैं। वह भाजपाई, कांग्रेसी या वामपंथी नहीं होतीं।

‘सेलेक्टिव आक्रोश’ लोकतंत्र का सबसे खतरनाक चेहरा है

वास्तविक समस्या यही है और बहुत दुखद भी है कि भारत में राजनीतिक विमर्श तेजी से ‘कौन सही है’ से ‘किसके खिलाफ सही है’ में बदलता जा रहा है। सत्ता में अपना दल हो तो पुलिस की कार्रवाई ‘कानून-व्यवस्था’ है और विरोधी दल की सरकार हो तो वही कार्रवाई ‘तानाशाही’ है। अपने समर्थक प्रदर्शन करें तो वे ‘युवा शक्ति’ हैं, दूसरे पक्ष के समर्थक सड़क पर उतरें तो वे ‘राजनीतिक भीड़’ बन जाते हैं।

यह दोहरा मापदंड! मीडिया, सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और सोशल मीडिया के प्रभावशाली चेहरों की विश्वसनीयता भी इसलिए आज प्रश्‍नों के दायरे में है। जंतर-मंतर पर छात्रों के समर्थन में खड़ा होना लोकतांत्रिक अधिकार है और रांची में छात्रों के पक्ष में खड़ा होना…?

Ranchi Protest: 5 घंटे की बैठक बेनतीजा, झारखंड विधानसभा की ओर बढ़े अभ्यर्थी; पुलिस ने चलाया वाटर कैनन

लाठी किसी भी सरकार की हो, सवाल वही रहना चाहिए

रांची से सामने आए वीडियो में पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। छात्रों ने चोटों, लाठी के निशानों और कुछ प्रदर्शनकारियों के घायल होने के समाचार हैं। किंतु सभी को समझना होगा कि JPSC और JSSC जैसी परीक्षाएं सरकारी नौकरियों की परीक्षा होने के साथ इनके पीछे हजारों-लाखों परिवारों की उम्मीदों से भी जुड़ी होती हैं।

एक युवा वर्षों तक तैयारी करता है, आर्थिक और मानसिक दबाव झेलता है और अंततः परीक्षा की निष्पक्षता पर ही उसका भविष्य टिका होता है।यदि परीक्षा में धांधली, पेपर लीक या चयन प्रक्रिया में अनियमितता के आरोप लगते हैं तो सरकार का पहला दायित्व छात्रों को राजनीतिक विरोधी समझना नहीं, बल्कि उनके संदेह का पारदर्शी समाधान करना होना चाहिए। यही शासन की विश्वसनीयता की पहली शर्त है।

हैशटैग की राजनीति से बाहर निकलने का समय

‘लोकतंत्र खतरे में है’ जैसे नारे तभी सार्थक हैं, जब लोकतंत्र की रक्षा का सिद्धांत सत्ता और दल से ऊपर हो, अन्‍यथा ऐसे नारे सिर्फ राजनीतिक हथियार बनकर रह जाते हैं। आज असली सवाल यह है कि क्या भारत में विरोध का अधिकार सत्ता बदलते ही बदल जाता है?

यदि जंतर-मंतर पर छात्रों पर बल प्रयोग गलत था, तो रांची में भी गलत है। यदि रांची में पुलिस कार्रवाई को उचित ठहराने के लिए कानून-व्यवस्था का तर्क दिया जा सकता है, तो यही तर्क दूसरी सरकारों के मामलों में भी समान रूप से लागू होना चाहिए। लोकतंत्र कोई ऐसा तराजू नहीं है जिसका एक पलड़ा अपने राजनीतिक पक्ष के लिए भारी और दूसरे के लिए हल्का रखा जाए।

वास्‍वत में रांची का घटनाक्रम उन सभी लोगों के लिए आईना है जो खुद को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और छात्र अधिकारों का प्रहरी बताते हैं। यह आईना उन तमाम सार्वजनिक चेहरों के लिए भी है जोकि हर घटना पर नैतिकता का प्रमाण-पत्र बांटते हैं। ध्‍यान रहे, यहां किसी एक दल को निर्दोष घोषित करने का प्रश्न नहीं है। प्रश्न सिद्धांत का है। सरकार यदि गलत है तो उसके खिलाफ आवाज उठनी चाहिए। प्रदर्शनकारी यदि हिंसा करते हैं तो उसकी भी आलोचना होनी चाहिए। पुलिस यदि जरूरत से अधिक बल प्रयोग करती है तो उसका जवाब मांगा जाना चाहिए और यदि परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी के आरोप हैं तो उनका निष्पक्ष निपटारा होना चाहिए।

जंतर-मंतर पर लोकतंत्र और रांची में कानून-व्यवस्था यह सुविधा के अनुसार बदली जाने वाली शब्दावली नहीं हो सकती। यदि लोकतंत्र सचमुच सबका है तो उसका आक्रोश भी सबके लिए होना चाहिए। वरना ‘सेलेक्टिव आक्रोश’ धीरे-धीरे उस विश्वास को खा जाएगा, जिस पर लोकतंत्र खड़ा है।

 

– डॉ. मयंक चतुर्वे।

 

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