ललही छठ, जिसे हल छठ, हरछठ, हल षष्ठी या बलराम जयंती के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण व्रत-त्योहार है। यह भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। 2026 में यह पर्व 2 सितंबर को मनाया जा रहा है। यह त्योहार मुख्य रूप से उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था, इसलिए इसे बलराम जयंती भी कहा जाता है।

इस व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य, शांति और परिवार की समृद्धि की कामना करना है। पुत्रवती महिलाएं विशेष रूप से इस व्रत को रखती हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से यह व्रत रखने से बच्चों के सभी संकट दूर होते हैं, उन्हें तरक्की मिलती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। हल से जुड़े होने के कारण इसे किसानों का त्योहार भी माना जाता है। इस दिन हल से जोते गए अनाज या सब्जियों का सेवन वर्जित होता है।
व्रत कथा
प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी, जो दूध-दही बेचकर जीवनयापन करती थी। गर्भवती होने और प्रसवकाल निकट होने के बावजूद वह काम में लगी रही। प्रसव पीड़ा होने पर भी वह दूध-दही बेचने निकल पड़ी। रास्ते में झरबेरी की झाड़ियों में उसने एक सुंदर बालक को जन्म दिया। लालच में उसने बच्चे को वहीं छोड़कर दूध-दही बेचने चली गई। उस दिन हल छठ का व्रत था, जिसमें केवल भैंस के दूध का सेवन किया जाता है। ग्वालिन ने मिश्रित दूध को भैंस का बताकर झूठ बोला और सब बिक गया।
इधर एक किसान के बैल अनियंत्रित होकर भाग गए और हल बच्चे से टकरा गया, जिससे बच्चे का पेट फट गया। किसान ने झरबेरी के कांटों से टांके लगा दिए। ग्वालिन जब लौटी तो बच्चे को मृत पाया। उसने अपना पाप समझा और गांव की व्रती महिलाओं से क्षमा मांगी। महिलाओं के आशीर्वाद से बच्चा जीवित हो गया। तब से ग्वालिन ने झूठ न बोलने का प्रण लिया और भक्तिपूर्वक यह व्रत करने लगी। यह कथा सत्यता, भक्ति और संतान की सुरक्षा का संदेश देती है।
पूजा विधि और नियम
| सुबह महुए की दातुन से दांत साफ करके स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। गोबर से स्थान लीपकर तालाब जैसा बनाएं। उसमें झरबेरी, पलाश और काश की शाखाएं गाड़ें। भगवान बलराम, छठ माता, शीतला माता की पूजा करें। भैंस का दूध, दही, घी, महुआ, सात प्रकार के अनाज (गेहूं, चावल, मक्का, चना, मूंग, अरहर, ज्वार), मिट्टी के कुल्हड़ आदि चढ़ाएं। कथा सुनें और आरती उतारें। व्रत निराहार या केवल भैंस के दूध-दही और तालाब में उगने वाले साग-अनाज तक सीमित रखा जाता है। यह पर्व न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि सत्य, मातृत्व और परिवार की रक्षा का प्रतीक भी है। आज भी लाखों महिलाएं संतान की लंबी आयु के लिए इसे श्रद्धा से मनाती हैं। |

