कृष्ण जन्मो भयो आज बधाई गाओ री…..के साथ ही पूरा देश भगवान कृष्ण के जन्म का उत्सव मनाता है। इसके बाद दही-हांडी का उत्सव मनाया जाता है, जो बेहद रोचक व रोमांचक होता है।
गोपी पुकारे, सुनो री यशोदा,
कान्हा ने मेरो मटका फोड़ा।
सखियां मिलकर जाल बिछाए,
पर कान्हा तो हाथ न आए।
छोटी सी मटकी, ऊंचा है टांगा…
कोई भी त्यौहार भारतीय संस्कृति का जीवंत उदाहरण है, जिसमें एक है दही-हांडी का उत्सव। दही-हांडी केवल एक उत्सव नहीं है बल्कि ये एक साथ कई संदेशों को देती हैं। जिसमें एकता, साहस, एकसाथ काम का नियोजन व साथ में इसका आनंद आदि शामिल है। कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर समन्वय दही हांडी में झलकता है। उनकी नटखट लीलाएं, थोड़ी शोखियां, चंचलता, भोलापन , थोड़ी चतुराई आदि को बहुत सुंदर ढंग से दर्शाया जाता है। यह त्योहार महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात और कुछ अन्य राज्यों में विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है।

दही हांडी के बारे में दंतकथाएं प्रचलित हैं, बालक कृष्ण मक्खन और दही खाना बेहद पसंद करते थे। वे अपने गोप-मित्रों के साथ मिलकर घरों की ऊंची जगहों पर लटके दही के मटके तोड़कर खाया करते थे। यही बाललीला आज दही हांडी के रूप में जीवित है। त्योहार के दिन ऊंची जगह पर एक मटका लटकाया जाता है, जिसमें दही, मक्खन, गुड़ और कभी-कभी पुरस्कार की राशि भी रखी जाती है। युवा गोविंदा दल मानव -पिरामिड बनाकर उस मटके तक पहुंचने और उसे तोड़ते हैं।
दही-हांडी का दृश्य देखने के लिए सैकड़ों लोग सड़कों पर जमा होते हैं। ढोल-नगाड़ों की थाप पर गोविंदा दल एक-दूसरे के कंधों पर चढ़कर कई स्तरों का पिरामिड बनाते हैं। कभी-कभी यह पिरामिड सात-आठ मंजिला तक ऊंचा हो जाता है। सबसे ऊपर वाला व्यक्ति मटके को तोड़ता है और चारों ओर दही-मक्खन की बौछार हो जाती है। भीड़ जयघोष से गूंज उठती है। यह दृश्य सिर्फ खेल नहीं, बल्कि सामूहिक शक्ति और विश्वास का प्रदर्शन है।
महाराष्ट्र में दही हांडी का सबसे भव्य रूप देखने को मिलता है। मुम्बई, ठाणे, पुणे और नासिक जैसे शहरों में दर्जनों दल प्रतिस्पर्धा करते हैं। कई दल पेशेवर स्तर पर तैयार होते हैं। वे महीने भर अभ्यास करते हैं। दही हांडी केवल पुरुषों का उत्सव नहीं रह गया है। अब महिला दल भी इसमें सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। महिला गोविंदा दल अपनी हिम्मत और कौशल से सबको प्रभावित करते हैं। यह सामाजिक बदलाव का संकेत है कि परम्पराएं समय के साथ नए रूप ले रही हैं।
इस त्योहार का सांस्कृतिक महत्व बहुत गहरा है। यह सिखाता है कि कठिन लक्ष्य अकेले नहीं, बल्कि मिलकर प्राप्त किए जा सकते हैं। दही हांडी हमें याद दिलाती है कि जीवन में चुनौतियां आती रहती हैं। कभी-कभी लक्ष्य ऊंचा लगता है, लेकिन विश्वास, अभ्यास और साथियों के सहयोग से उसे हासिल किया जा सकता है। जब मटका टूटता है और दही चारों ओर बिखरता है, तो सिर्फ खुशी नहीं, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक विरासत जीवित होती है। जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता रहेगा।
स्निग्धा अवतंस

