हनुमान अंश फिल्म आज की तथाकथित चमचमाती शैली से सैकड़ों मील दूर है। इस फिल्म की सादगी ही उसकी सामर्थ्य बन रही है। हम भारतीय जिन जीवनमूल्यों को लेकर जीते हैं, वे जीवनमूल्य इस फिल्म में विविध प्रसंगों के माध्यम से जीवंत किए गए हैं। उसमें किसी तरह का भड़कीलापन नहीं है, कृत्रिमता नहीं है, है तो केवल सहजता। हनुमान अंश फिल्म ने उसी सहजता से देश में धर्मजागरण आरंभ किया है। हमारा समाज हनुमान जैसा है— शक्ति का विस्मरण हो चुका है। हनुमान अंश होते हुए भी अपना बजरंगबलीपन भूल चुका है। इस समाज को धर्मशक्ति का स्मरण इस फिल्म के निमित्त हो रहा है, यह सुखद है।
भारत धर्मभूमि है, ऐसा भारत का वर्णन किया जाता है। धर्मभूमि भारत में एक ही समय में दो शक्तियाँ विचरती रहती हैं। एक है, आसुरी शक्ति और दूसरी है, दैवी शक्ति। इन दोनों शक्तियों के बीच का संघर्ष अनादिकाल से भारत में चला आ रहा है। यूरोप के ब्रिटेन, फ्रांस, स्पेन, इंग्लैंड, जर्मनी, रूस इन देशों के इतिहास पर एक सरसरी नज़र डाली जाए तो यह ध्यान में आएगा कि इन देशों में भी संघर्ष है। परंतु ये सारे संघर्ष राज्यसत्ता-केंद्रित संघर्ष हैं। भारत के धर्मसंघर्ष सत्ता-प्राप्ति के संघर्ष नहीं होते। यह संघर्ष मूल्य-प्रस्थापना का संघर्ष होता है।

आज के भारत का विचार किया जाए तो भारत में अराजकतावादी आसुरी शक्तियाँ बहुत बड़ी मात्रा में कार्यरत हैं। इन सारी शक्तियों का संघर्ष भारत के सनातन जीवनमूल्यों से है, सनातन परंपराओं से है। दिव्य सत्पुरुषों से है, महान धार्मिक ग्रंथों से है, साधु-संतों से है। ऐसे संघर्ष किसी एक बिंदु से प्रकट होते हैं। रामजन्मस्थान पर राम मंदिर एक ऐसा ही बिंदु है। उसका विरोध करने वाली शक्तियाँ कौन हैं, मंदिर बन जाने पर भी दर्शन के लिए न जाने वाले व्यक्ति कौन हैं, महाकुंभ की खिल्ली उड़ाने वाले कौन हैं, यह हमें मालूम है। ये सारी आसुरी शक्तियाँ हैं।
भारत की दैवी शक्ति, निरपेक्ष भाव से समाजसेवा करने वाली असंख्य संस्थाएँ, साधु-संत, उनके मठ और आश्रम, जैन मुनि, धम्म-प्रचार करने वाले बौद्ध भिक्षु, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और अन्य संस्थाएँ इत्यादि में समाहित है और इस धर्मशक्ति तथा आसुरी शक्तियों का संग्राम इस समय देश में चल रहा है। धर्मशक्ति स्वयं कभी संघर्ष आरंभ नहीं करती। उस पर आघात किए जाते हैं। उसके विषय में अत्यंत गंदी भाषा में टीका-टिप्पणी की जाती है। राजनीतिक क्षेत्र में इस धर्मशक्ति का चेहरा नरेंद्र मोदी हैं।
उनके विरुद्ध पिछले तीन-चार महीनों में कितनी गंदगी की गई, यह हमने देखा है।
ऐसे वातावरण में हनुमान अंश यह फिल्म नीम करोली बाबा नामक सत्पुरुष के जीवन पर आई है। फिल्म में उनकी संपूर्ण जीवनकथा चित्रित नहीं हुई है। आधा भाग यथासमय सिनेमाघरों में प्रदर्शित होगा। इस लेख में मुझे इस फिल्म की समीक्षा नहीं करनी है, वह मेरा विषय भी नहीं है। इस फिल्म ने फिल्म क्षेत्र में प्रचंड धूम मचाई है। उसने किस प्रकार धूम मचाई है, यह सभी पाठकों को मालूम है। फिल्म ने दो महीनों में कितनी कमाई की, इसके आँकड़े भी प्रकाशित हो चुके हैं। कौन-कौन से नए कीर्तिमान बनाए, यह भी बताया जाता है। ये बातें फिल्म व्यवसाय के रूप में महत्वपूर्ण होते हुए भी फिल्म का महत्व यहाँ समाप्त नहीं होता।
महान साधु-संतों के जीवन पर फिल्में नई नहीं हैं। ज्ञानदेव, तुकाराम, स्वामी समर्थ, साईबाबा, रामकृष्ण परमहंस, ऐसे असंख्य सत्पुरुषों पर फिल्में आ चुकी हैं, आगे भी आएँगी। सिद्धपुरुषों को सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसलिए चमत्कार उनके जीवन का अभिन्न अंग होता है। हनुमान अंश फिल्म में ऐसे अनेक चमत्कार हैं। इसलिए यह फिल्म चल रही है, ऐसा नहीं है। केवल चमत्कार को विषय बनाकर कल को किसी ने ज्ञानदेवों पर फिल्म बनाई तो वह फिल्म सिनेमाघरों में नहीं चलेगी।
हनुमान अंश फिल्म आने से पहले नीम करोली बाबा के जीवन पर सुभोद भावे की भूमिका वाली एक फिल्म मई महीने में प्रदर्शित हुई थी। सिनेमाघरों में वह तीन-चार दिन ही रही। वह कब आई और कब चली गई, यह लोगों को पता भी नहीं चला। बहुत पैसा खर्च करके यह फिल्म तैयार की गई थी। बाबा के जीवन के चमत्कार इस फिल्म में थे। परंतु उससे दर्शकों ने सिनेमाघरों में भीड़ नहीं की।
हनुमान अंश फिल्म की सफलता का कारण क्या? मेरे मत में, वह कारण यह है कि हम जिन जीवनमूल्यों को लेकर जीते हैं, वे जीवनमूल्य इस फिल्म में विविध प्रसंगों के माध्यम से जीवंत किए गए हैं। उसमें किसी तरह की भड़कीलापन नहीं है, कृत्रिमता नहीं है, है तो केवल सहजता। फिल्म में ऐसे अनेक प्रसंग हैं। एक प्रसंग पार्वतीबाई के घर अपने भक्तों को लेकर बाबा अचानक खाने चले जाते हैं। पार्वतीबाई ने खिचड़ी और कढ़ी बनाई होती है। वह उसके पति के लिए और उसके लिए इतनी ही होती है। बाबा के साथ और चार-पाँच लोग हैं, उन्हें भी खाना खिलाना था।
पार्वतीबाई सबका स्वागत करती है। गाँव का घर होने के कारण मेज़-कुर्सियाँ नहीं होतीं। इसलिए सब ज़मीन पर बैठते हैं। इस प्रसंग में पार्वतीबाई का अभिनय हिंदी फिल्म की नामवंत अभिनेत्री को भी लज्जित करने वाला है। घर की उसकी चिंता, स्वयं से ही बड़बड़ाना, चूल्हे के पास बैठने की स्थिति और अभिनय और इतना-सा भोजन सबको कैसे परोसा जाए, इस चिंता में वह थाली में कढ़ी और भात परोसती जाती है, परंतु बर्तन में भोजन कहीं समाप्त नहीं होता, यह चमत्कार है। उसका अनुभव आने पर उसके चेहरे पर उभरे भाव परदे पर जाकर ही देखने चाहिए।

ऐसा ही एक प्रसंग नीम करोली बाबा और उनकी पत्नी के संवाद का है। दांपत्य जीवन के ऐसे संवाद हर घर में चलते हैं और यहाँ भी पत्नी का अभिनय, उसकी बेचैनी और पृष्ठभूमि में बजने वाला गीत ‘ज़िद पे आई पार्वती’ यह हृदय स्पर्शी है। लोग फिल्म देखने क्यों जाते हैं, इसके ये कुछ प्रमुख कारण हैं। तीन-चार बार फिल्म देखने वाली महिलाएँ मुझे मिलीं। वे बहुत कुछ बोलीं नहीं, परंतु मुझे विश्वास है कि वे अपना प्रतिबिंब फिल्म में देख रही होंगी।

हनुमान अंश फिल्म जिन परिस्थितियों में जन्मी है, उन परिस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए। लेख के आरंभ में वर्णित परिस्थिति देश में है। लोग इन परिस्थितियों से तंग आ चुके हैं। रोज़ चलने वाली गाली-गलौज, आरोप-प्रत्यारोप, छोटी-छोटी बातों पर आंदोलन, यह सब लोगों को अब अच्छा नहीं लगता। सोशल मीडिया का धूम और उसके साथ भयानक हिंसा से भरी फिल्में, आधुनिक तकनीक का उपयोग करके तर्कशास्त्र में न बैठने वाले प्रसंग और कर्णकर्कश संगीत— इनसे भी अब वितृष्णा हो चली है। हनुमान अंश फिल्म इन सबसे सैकड़ों मील दूर है। उसमें हिंसाचार नहीं है, अटपटे-विचित्र गीत नहीं हैं। जो गीत हैं, वे भक्तिगीत हैं और वे लोकसंगीत पर आधारित हैं। लोककलाओं का जन्म सामान्य मनुष्य की प्रतिभा से होता है। सामान्य मनुष्य अपना प्रतिबिंब फिल्म में देखता है। इसलिए वह सुखी होता है और अच्छा संस्कार लेकर सिनेमाघर के बाहर निकलता है।
हनुमान अंश फिल्म ने सहज ही देश में धर्मजागरण किया है। रामजन्मभूमि मुक्ति आंदोलन ने धर्मजागरण यानी अस्मिता जागरण की एक लहर देश में पैदा की। उसका परिणाम धर्मशक्ति जागरण में हुआ। धर्मजागरण का यह कार्य हनुमान अंश वाली पीढ़ी ने किया। हनुमान की कथा ऐसी कही जाती है कि वह जन्मते ही महाबली थे। उनकी शक्ति से ऋषियों को कष्ट हुआ। उन्होंने उसे शक्ति-विस्मरण का श्राप दिया। क्षमा याचना करने के बाद ऋषियों ने आश्वासन दिया कि योग्य समय पर शक्ति का जागरण होने पर शक्ति वापस आ जाएगी। सीतामाई की खोज— वह योग्य काल आया और जाम्बुवंत ने हनुमान को शक्ति की याद दिलाई और हनुमान बजरंगबली बने।
हमारा समाज हनुमान जैसा है— शक्ति का विस्मरण हो चुका है। हनुमान अंश होते हुए भी अपना बजरंगबलीपन भूल चुका है, यह समाज है, उसे उसकी शक्ति का बोध कराना पड़ता है। वह एक बार करा देने से चलता नहीं। रामजन्मभूमि मुक्त हुई, अब सब समाप्त हो गया, ऐसा नहीं है। शक्ति जागरण की कोई काल-सीमा नहीं है। हनुमान अंश फिल्म ने यह काम आरंभ किया है। प्रत्येक सिनेमाघर दर्शकों से भरा होता है और दर्शकों में युवा, स्त्री, बच्चों की भरमार अधिक होती है। हरिभजन सिखाने वाली यह फिल्म नहीं है, धर्मजागरण करने वाली यह फिल्म है।

नीम करोली बाबा की शिक्षा तीन शब्दों में व्यक्त होती है। प्रेम, सेवा और परमेश्वर का स्मरण। उनका कोई ग्रंथ नहीं है, कोई प्रवचन नहीं है, कोई उपदेश नहीं है। वे निरपेक्ष प्रेम करते हुए जिए। निरपेक्ष सेवा करते हुए उन्होंने जीवन की यात्रा की और 24 घंटे रामनाम का जप चालू रखा। शब्दों में अपार सामर्थ्य होता है। उसके लिए शब्दों को जीना पड़ता है। शब्दों को जीने का जीवंत उदाहरण मतलब नीम करोली बाबा। हम मानव हैं, इसलिए एक हैं। अत: कोई भी भेदभाव नहीं रखना चाहिए, सब एक समान हैं। इस पर उन्होंने प्रवचन नहीं दिए, बल्कि उन्होंने जीकर दिखाया।
पूर्वजन्म की पुण्याई और तपस्या से जो शक्तियाँ प्राप्त हुईं, उनका उपयोग लोककल्याण के लिए ही किया। लोगों को बहकाने के लिए नहीं किया। ऐसे ढोंगी बाबा आज भी देश में बहुत हैं, उनमें से कुछ जेल में हैं, कुछ कल की जेल के रास्ते पर हैं। नीम करोली बाबा का रास्ता जनहृदयों की ओर जाता है।
हनुमान अंश इस फिल्म के कारण देश में धर्मजागरण हो रहा है। सत्वशक्ति का जागरण हो रहा है। सात्विक शक्तियाँ जाग रही हैं, ये शुभ संकेत हैं। आसुरी शक्तियों से निर्णायक संघर्ष का कालखंड बहुत वेग से निकट आ रहा है, ऐसे समय में कोई कहे कि अयोध्या के राम के मन में भी ऐसा विषय आया होगा कि इस धर्मशक्ति जागरण उत्सव में हमारे हनुमान भी अंशरूप में सम्मिलित होने चाहिए। हनुमान अंश फिल्म यह उसका रूप हो सकती है।
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नीम करोली बाबा
नीम करोली बाबा (महाराज जी) भारत के प्रसिद्ध आध्यात्मिक संत और हनुमानभक्त के रूप में जाने जाते हैं।
मूल नामः लक्ष्मीनारायण शर्मा
जन्मः १९०० के आसपास, उत्तर प्रदेश
मुख्य संदेशः प्रेम, सेवा, भक्ति और मानवता की सेवा।
उन्होंने हनुमानभक्ति को विशेष महत्व दिया और अनेक स्थानों पर हनुमान मंदिरों तथा आश्रमों के निर्माण की प्रेरणा दी।
उनका प्रमुख आश्रम कैंची धाम, उत्तराखंड में है।
उनकी सादगी और आध्यात्मिक शिक्षाओं के कारण भारत के साथ-साथ विदेशों में भी अनेक अनुयायी बने।
निधनः ११ सितंबर १९७३, वृंदावन।
– रमेश पतंगे

