भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि यह इस राष्ट्र की संप्रभुता, आंतरिक सुरक्षा और सांस्कृतिक अखंडता की सबसे बड़ी परीक्षा हैं। लोकतंत्र का सबसे मूलभूत सिद्धांत यह है कि देश की नीति और सत्ता का निर्धारण केवल और केवल उस देश के वैध नागरिक करेंगे। लेकिन विडंबना यह है कि पिछले कुछ दशकों से भारत की इस पावन भूमि को सुनियोजित षडयंत्र के तहत घुसपैठियों की शरणस्थली बना दिया गया है।
गृह मंत्रालय और विभिन्न आधिकारिक मंचों पर यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया जा चुका है कि भारत में 10 करोड़ से अधिक अवैध घुसपैठिए शरणार्थी बनकर नहीं, बल्कि देश की सीमाओं को अवैध रूप से भेदकर घुसे हैं। ये लोग देश के संसाधनों को दीमक की तरह अंदर से खोखला कर रहे हैं, मुफ्त राशन, आवास और सरकारी योजनाओं का अनुचित लाभ उठा रहे हैं और सबसे खतरनाक बात यह है कि भारतीय लोकतंत्र के सबसे पवित्र अंग यानी मतदाता सूची में सेंध लगाकर चुनावों के परिणामों को बदल रहे हैं।
इस गंभीर और राष्ट्रघाती संकट से निपटने के लिए चुनाव आयोग ने जब देश भर में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) की प्रक्रिया शुरू की, तो इसे एक राजनीतिक विवाद के चश्मे से देखने की बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से समझा जाना चाहिए।
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SIR कोई अचानक प्रकट हुई प्रक्रिया नहीं है; भारत में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण का यह क्रम 1960 से समय-समय पर चलता रहा है। वर्ष 2003 में भी मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने के लिए इसी प्रकार के कदम उठाए गए थे। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने जिस दृढ़ इच्छाशक्ति और प्रशासनिक पारदर्शिता के साथ मतदाता सूची को साफ करने का ऐतिहासिक कार्य किया है, उसने देश के लोकतंत्र को बचाने की दिशा में एक नया मार्ग प्रशस्त किया है।
जब पश्चिम बंगाल और देश के अन्य सीमावर्ती राज्यों में SIR की यह प्रक्रिया कड़ाई से लागू की गई, तो इसके चौंकाने वाले और आँखें खोल देने वाले आंकड़े सामने आए। अकेले बंगाल में 30 लाख से ऊपर अवैध घुसपैठियों और अपात्र लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे गए। इस सफाई का सीधा और तीव्र परिणाम बंगाल के चुनावों में देखने को मिला, जहाँ दशकों से अवैध वोटरों के सहारे अपनी राजनीति की फसल काट रहा राजनीतिक तंत्र पूरी तरह ध्वस्त हो गया।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग ने फॉर्म 6 के साथ एक अनिवार्य घोषणा-पत्र (Declaration) की व्यवस्था की। इस घोषणा-पत्र की कसौटी बहुत स्पष्ट थी इसमें 2003 की मतदाता सूची के संदर्भ, माता-पिता या दादा-दादी के अभिलेखों का विवरण मांगा गया था। जैसे ही यह कसौटी सामने आई, देश भर में हड़कंप मच गया क्योंकि लगभग 3 करोड़ ऐसे लोग सामने आए जो यह डिक्लेरेशन फॉर्म भरने से बचते नजर आए।
इसके अलावा, 2003 से 2026 के बीच करोड़ों लोग स्थानांतरित हुए और लाखों मतदाताओं की मृत्यु भी हुई, लेकिन इन 3 करोड़ संदिग्ध मतदाताओं का कोई वैध आधार या दस्तावेज नहीं मिला। यही कारण है कि जब इतनी बड़ी संख्या में फर्जी और अवैध नाम वोटरलिस्ट से बाहर हुए, तो कांग्रेस समेत उन सभी विपक्षी पार्टियों के पैरों तले जमीन खिसक गई जो लंबे समय तक सत्ता में रहते हुए इन अवैध मतदाताओं को पाल-पोसकर मोटा करती रही हैं।
यहीं से एक बहुत बड़ा और अनुत्तरित प्रश्न देश के सामने खड़ा होता है— यदि चुनाव आयोग द्वारा केवल एक डिक्लेरेशन और फॉर्म 6 की सामान्य जाँच से 3 करोड़ अपात्र और संदिग्ध लोग सामने आ रहे हैं, तो पूरे देश में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) क्यों नहीं लागू किया जा रहा है? यदि सही मायनों में, वैज्ञानिक और पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से देशव्यापी NRC की प्रक्रिया लागू कर दी जाए, तो यह संख्या 7 से 10 करोड़ तक पहुँच सकती है।

क्या हम एक ऐसे बारूद के ढेर पर बैठे हैं जहाँ इतनी बड़ी आबादी जो भारत की नागरिक ही नहीं है, वह न केवल इस देश के चुनावों में वोट डालती है बल्कि हमारी नीतियों और सरकारों को भी प्रभावित करती है?
बंगाल में तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियां जो एक खास 28% मुस्लिम वोट बैंक के बल पर अजेय होने का दावा करती थीं और जिनके नेताओं द्वारा बंगाल को देश से अलग करके ‘ग्रेटर बंगाल’ बनाने और प्रधानमंत्री बनने जैसी विभाजनकारी और खतरनाक मानसिकता को बढ़ावा दिया जाता था, उनका यह पूरा प्रभाव इसी अवैध वोटर तंत्र पर टिका हुआ था।
लेकिन आज स्थिति यह है कि जब चुनाव आयोग ने इस राष्ट्रविरोधी तंत्र पर प्रहार किया, तो कांग्रेस और उसके वैचारिक सहयोगी बौखला गए। कांग्रेस पार्टी, जो देश की मुख्य विपक्षी पार्टी रही है और 2014 से पहले लंबे समय तक सत्ता में काबिज रही, आज उसी घुसपैठिए समर्थक तंत्र की ढाल बनकर खड़ी हो गई है।
कई राज्यों में कांग्रेस 40 से 50 वर्षों से सत्ता से बाहर है चाहे वह तमिलनाडु हो जहाँ वह 50 साल से सत्ता से बाहर है, या अन्य क्षेत्र वहाँ की राजनीति में सक्रिय लेफ्ट और अर्बन नक्सलवादी इकोसिस्टम के लोग आज चुनाव आयोग, न्यायपालिका जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार सवाल खड़े कर रहे हैं। कांग्रेस को चलाने वाले यही लेफ्ट-इकोसिस्टम के लोग SIR के नाम पर देश को अराजकता की आग में झोंकना चाहते हैं, जिसके खिलाफ आम लोगों को खड़ा होना होगा।
स्थिति तब और अधिक खतरनाक हो जाती है जब तथाकथित संगठन और राजनीतिक दल देश की सर्वोच्च संस्थाओं, चुनाव आयोग और न्यायपालिका के खिलाफ खुलकर मैदान में उतर आते हैं। कॉकरोच जनता पार्टी जैसे तत्व और कांग्रेस समर्थित मानसिकता के लोग 10 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन करने का ऐलान किया था। यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं है, बल्कि देश के संविधान, लोकतंत्र और चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाओं के खिलाफ खुला विद्रोह है।
विदेशी ताकतों के इशारे पर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनीयता पर बट्टा लगाकर ये लोग देश को गृहयुद्ध और अराजकता की आग में झोंकने की साजिश रच रहे हैं और खुलेआम देश को गृहयुद्ध में झोंकने की धमकियां दे रहे हैं।
यह देश के हर जागरूक नागरिक को सोचने पर मजबूर करता है कि क्या विदेशी नागरिकों, रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों को इसलिए भारत में वोट देने का अधिकार मिलना चाहिए क्योंकि वे किसी राजनीतिक दल के वोटर हैं? क्या देश की सुरक्षा और संप्रभुता को दाँव पर लगाकर केवल तुष्टिकरण की राजनीति की जानी चाहिए? जब भी देश में राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न उठता है, तो विपक्ष वोट बैंक की राजनीति के भय से देश की सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा से समझौता करने से भी नहीं हिचकिचाता।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम राजनीतिक दलों के संकुचित चश्मे को उतारकर राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखें। SIR जैसी प्रक्रियाएं समय की मांग हैं। मतदाता सूची की शुचिता केवल चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह इस बात की गारंटी है कि भारत का भाग्य केवल भारत का सच्चा नागरिक ही तय करेगा।
यदि समय रहते देशव्यापी एनआरसी लागू नहीं किया गया और इन करोड़ों घुसपैठियों को देश से बाहर नहीं खदेड़ा गया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। राष्ट्रहित से बड़ा कोई दल या नेता नहीं हो सकता और भारत की एकता, अखंडता तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए मतदाता सूची की पवित्रता बनाए रखना आज के समय की सबसे बड़ी अनिवार्यता है।
– दीपक कुमार द्विवेद्वी
