बचत गट

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पिछले कुछ दशकों में भारतीय महिलाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में खासकर जिन्हें पुरुष प्रधान क्षेत्र माना जाता उनमें स्वयं की मिसाल कायम की है। उन्होंने उन क्षेत्रों में पुरुषों को भी दो कदम पीछे छोड़ दिया है। फिर भी महिलाओं के लिये 33% का आरक्षण मिलने में लंबा अरसा बीत गया।

क्या हम ‘पेस्तन काका’ को खो देंगे?

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 पारसी समाज पिछले कई दशकों में तेजी से सिकुड़ता जा रहा है। इस समाज की जनसंख्या अब ऐसे घटती जा रही है कि अगले कुछ ही बरसों में ‘पेस्तन काका’ क्या पु. ल. देशपांडे जी (विख्यात मराठी साहित्यकार) की किताबों में ही पाये जाएँगे? ऐसा भय कहीं दिखाई दे रहा है।

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