बचत गट

पिछले कुछ दशकों में भारतीय महिलाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में खासकर जिन्हें पुरुष प्रधान क्षेत्र माना जाता उनमें स्वयं की मिसाल कायम की है। उन्होंने उन क्षेत्रों में पुरुषों को भी दो कदम पीछे छोड़ दिया है। फिर भी महिलाओं के लिये 33% का आरक्षण मिलने में लंबा अरसा बीत गया। इस मुद्दे का विरोध करनेवालों ने महिलाओं की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक क्षमता पर भी शंका जताई। इन आशंकाओं में भले ही कोई तथ्य न हो परंतु स्त्री-स्वतंत्रता के विषय मे पिछडापन जरुर है। ग्रामीण भागों की महिलाओं का जीवन आज भी चूल्हे-चौके और बच्चों तक ही सीमित है। उसे जानबूझकर शिक्षा से दूर रखा जाता है। पति की अनुमति के बिना घर से बाहर कदम रखने की स्वतंत्रता उसे आज भी नहीं है। महिलाओं को सक्षम बनाने की दृष्टि से जो प्रयत्न किये जा रहे हैं उनमें बचत गटों की भूमिका अहम है।

वस्तुत: बचत गटों की मुख्य भूमिका आर्थिक दृष्टि से महिलाओं को सबल बनाना थी, परंतु आज देखा जा रहा है कि इन बचत गटों के माध्यम से महिलाओं का नाजुक भाव विश्व भी समृद्ध हो रहा है।

पिछले दो दशकों में भारत के ग्रामीण भागों में बचतगटों का कार्य अत्यंत तीव्र गति से बढ़ा है। देश में आज बचत और पैसे को द्विगुणित करने के कई साधन उपलब्ध हैं। केवल शेयर बाजार में ही एक दिन में करोड़ों का खेल होता है। पैसों की आवक बढ़ने से शहरी जीवन का स्तर बढ़ा है। परंतु यह आर्थिक सुबत्ता एक वर्ग विशेष के लिये है। ग्रामीण भागों में आज भी स्थिति दयनीय है। बहुत बडी जनसंख्या आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रही है। कर्ज के कारण भूमिहीन और अल्प भू धारक किसानों की आत्महत्याओं का क्रम जारी है। दो वक्त की रोटी जुटाने के लिये मजदूरों को कडी मेहनत करनी पड रही है। घर का पुरुष अगर साहुकार के कर्ज के कारण कमजोर पड जाये तो। घर के हालातों को सुधारने के लिये महिलाओ को ही आगे आना पडता है। बचत गटों ने ऐसी ही महिलाओं को उन्नती का मार्ग दिखाया।
बचत गटों का कार्य बैंको, पतपेढ़ी संस्थाओं, सोसाइटियों से काफी अलग है। दस-बारह महिलाएं एकत्रित आकर बचत गट की शुरुवात करती है। हर महीने एक निश्चित रकम वे जमा करती है। गट की किसी महिला ओ अगर कर्ज चाहिये तो इन्ही पैसों से दिया जाता है और इस पर लगाये जानेवाले ब्याज का प्रतिशत भी गट की महिलाएं मिलकर तय करती है। अत: ब्याज की दर बहुत कम होती है। ब्याज के रुप में मिलनेवाली रकम अर्थात बचत गट की महिलाओं का फायदा होता है। साधे-सरल लगने वाले बचत गट के कारण ग्रामीण महिलाओं के जीवन में नई क्रांति निर्माण कर दी।

लोगों में बचत करने की प्रवृत्ति विकसित करना बचत गट का महत्वपूर्ण तत्व है। इसके अलावा भूमिहीन और गरीब महिलाओं को स्वयंरोजगार का प्रशिक्षण और कर्ज प्रदान करना, गरीबी हटाना, महिलाओं का सामाजिक स्तर सुधारणा, साक्षरता और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना इत्यादि विभिन्न उद्देश्य है। भारत के बचत गट का स्वरुप भी ऐसा ही है। पहले कुछ सामाजिक और आर्थिक संस्थाओं के माध्यम से स्वयं सहायता गट या कर्ज व्यवस्थापन गट चलाये जाते थे। 1891-92 में नाबार्ड ने बडे पैमाने पर बचत गटों की शुरुवात की थी। 1993 में भारतीय रिजर्व बैंक ने बचत गटों के खाते बैंक में शुरु करने की अनुमति दी। गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश राजस्थान, तमिलनाडु और केरल इत्यादि राज्योें में बचत गटों का कार्य जोरशोर से शुरु हुआ। नाबार्ड से संबंधित 560 बैंक शासकीय, प्रशासकीय संस्थाएं और तीन हजार से अधिक और सरकारी संस्थाएं बचत गटों से संबंधित हैं। बचत गट की संकल्पना हालांकि स्त्री-पुरुष दोनों से संबंधित हैं परंतु इनके केन्द्र स्थान में महिलाएं ही हैं।

साहूकारों से लिये गये कर्ज का ब्याज गले में पडे फांसी के फंदे की तरह वे होता है। बैंक से कर्ज लेने पर भी 12-15 प्रतिशत ब्याज देना पडता है। इन दोनों ही मामले में एक डर बना ही रहता है कि न जाने कब साहूकार या बैंक के लोग कर्ज वसूलने दरवाजे पर पहुंच जायें। इस परिस्थिति के कारण अपमान, अवहेलना या मानसिक तनाव भी बहुत होता है। बचत गट का कर्ज अपने हक का कर्ज है। इसका ब्याज भी बचत गट की महिलाओं द्वारा तय होता है और अगर भुगतान करने में देश हुई या कोई मुश्किल दिखी तो सभी महिलाये समझदारी से काम लेती हैं।

भारत में मुख्यत: गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा चलाये जानेवाले और बैंकों के द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त करनेवाले बचतगट अधिक हैं। कुछ महिलाएं एकत्रित होकर स्वत: बचत गट का निर्माण करती हैं। उसके नियम तय करती हैं, महीने का हिसाब रखती हैं। उन्हीं में से एक महिला की गट प्रमुख के रुप में नियुक्ति की जाती है। कुछ सामाजिक संस्थाएं इस तरह के स्वयंनिर्मित बचत गटों का मार्गदर्शन करती हैं। उनके लिये उद्योगो का प्रशिक्षण, व्यक्तित्व विकास कार्यक्रम इत्यादि उपक्रम चलाते हैं। बचत गटों के लिये चलाई जानेवाली सरकारी योजनाओं की जानकारी देती हैं। और अन्य महिलाओं को बचत गट शुरु करने का प्रोत्साहन देती है। कुछ व्यक्ति और संस्थाएं अलग तरह से इनकी मदद करती हैं। उदाहरणार्थ बचत गटों के द्वारा बनाये गये समानों को बेचने के लिये बाजार उपलब्ध कराना, महिलाओं के लिये कार्यशाला का आयोजन, उनकी बनाई हुई वस्तुओं की प्रदर्शनी लगाना, विक्रय संबंधी मार्गदर्शन करना इत्यादि कार्य शामिल हैं।

बचत गट का प्राथमिक उद्देश्य आर्थिक विकास होता है। केवल बचत करके यह पूर्ण नहीं होता। महिलाओं को उनके पैरों पर खडा करने के लिये अर्थार्जन के विविध विकल्पों की आवश्यकता होती है। ऐसे विकल्पों को उपलब्ध करवाते समय उन महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक परिस्थिती, उस परिसर की भौगोलिक परिस्थिती वहां का जीवन, प्रमुख व्यवसाय, इत्यादि अनेक बातों का विचार किया जाता है। जब हाथ में पैसा आता है तो घर संवारने का बल अपने आप आ जाता है। अपनी जिंदगी की छोटी-छोटी परेशानियों से मायूस हो जानेवाली महिलायें कितनी भी बडी मुश्किलों का सामना करने को तैयार हो जाती हैं।

व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया में अनुभव सबसे बडा प्रशिक्षक होता है। अनुभव से व्यवहारज्ञान बढता है। और व्यवहार ज्ञान से आत्मविश्वास। जिन महिलाओं ने कभी बैंक की पहली सीढ़ी पर भी कदम नहीं रखा वे बचत गट में आने के बाद बैंक के सारे कार्य करने लगीं।
बचत गट में महिलाओं को जो प्रशिक्षण मिलता है उससे उनका सर्वांगीण विकास होता है। बचत गट महिलाओं को न सिर्फ आर्थिक आधार प्रदान करता है वरन उनकी भावनात्मक और मानसिक स्तर की उन्नति के लिये भी प्रयत्नशील है। उनमें आत्मविश्वास जागृत करता है। इससे भी आगे जाकर कुछ महिलाएं दूसरों के लिये आदर्श बनती हैं। वे गट का नेतृत्व करती हैं। गट की महिलाओं के लिये उनका निर्णय अंतिम निर्णय होता है। इससे गांव की अन्य महिलाओं को भी घर से बाहर निकलकर कार्य करने और निर्णय लेने का बल मिलता है। गांव के लोगों के बीच उनका स्थान ऊंचा होता है और यह सम्भाव उन्हे उनके कार्यों के कारण ही मिलता है।

पुणे खेड शिवापुर के श्रीरामनगर के सिद्धांत बचत गट की आशाताई गोगावले ऐसी ही महिलाओं में से एक है। पिता व पति की मृत्यू के बाद वृद्ध मां और छोटे बच्चे की जिम्मेदारी आशाताई पर आ गई। संकुचित और शांत स्वभाव की आशाताई को घर से बाहर कदम रखना ही पडा। इसी दौरान उन्हे बचत गट का साथ मिला। शुरुवात में उन्होंने 25 रुपयों से ही बचत गट प्रारंभ किया। बचत गट के कार्यों और बैठकों के लिये कई बार उन्हे देर रात तक घर से बाहर रहना पडता था। लोग उनके बारे में कई तरह की बातें करते थे। आज वे गरीबी रेखा के नीचे के सिद्धांत बचतगट की अध्यक्षा हैं। अपने बचत गट के लिये उन्होंने यूरिया ब्रिगेड का कारखाना शुरु किया। इसके लिये। जमीन प्राप्त करने हेतु गांव वासियों को समझाया। अब इस प्रकल्प के कारण हजारों रुपयों का व्यवसाय हो रहा है। उन्होंने बचत गट की महिलाओं को रोजगार के विभिन्न अवसर प्रदान किये। इस प्रकल्प के लिये उन्हे पुरस्कार भी मिले। अब आशाताई और अन्य महिलाओं का उद्देश्य इस प्रकल्प का विस्तार करना और इसे लाभ प्राप्त करवाना है।

स्त्री को सक्षम बनाने की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया की की शुरुवात उसके अंदर निहित उत्साह और उसकी क्षमता की उसे ही पहचान करवाने से होती है। उसका उत्साह अनजाने ही व्यक्त होने लगता है। वह गा सकती है, नृत्य कर सकती है, व्यासपीठ पर खडे होकर लोगों के सामने भाषण दे सकती है, अभिनय भी कर सकती है। समूह गान के लिये बचत गट की महिलाओं ने ही गीत भी रचे हैं। और उन्हे लयबद्ध भी किया है।

प्रत्येक स्त्री सुंदर है। उनके सौंदर्य मापन का नाप उनकी आंतरिक क्षमता है। हर स्त्री अच्छी गृहिणी, अच्छी मैनेजर, शिक्षिका और केयर टेकर है। जिन कार्यों को करने के लिये दूसरों को पैसे देने पडते है उन्हे वह निशुल्क और आनंद से करती है। उनकी सुंदरता की पहचान करना ही बचत गट का मुख्य उद्देश्य है। स्त्री अपनी जिम्मेदारियां भुलाकर स्वतंत्र नहीं होना चाहती। उसे स्वतंत्रता चाहिये अपने विचार व्यक्त करने की, अपनी क्षमता परखने की सुंदर बनने की

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