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महर्षि दयानंद का ‘सत्यार्थ प्रकाश’ एक अद्भुत ग्रंथ है। इसमें उन्होंने शैतान व्यक्ति से पाप करवाता है इस भ्रांति कोे उखाड़ फेंका। वे कहते हैं, जीव कर्म करने में स्वतंत्र व फल के भोगने में ईश्वर की व्यवस्था के अधीन है। यही सत्यार्थ का नया प्रकाश है।

आर्य जाति के प्रसिद्ध वैदिक विद्वान आचार्य नरेन्द्र भूषण जी, केरल ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के मलयालम अनुवाद का नाम ‘वेद-पर्यटन’ रखा। श्री स्वामी सत्यप्रकाश जी सरीखे विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार व विद्वान इस नाम पर मुग्ध थे। वे कहते थे कि यह नरेन्द्र भूषण जी की अद्भुत सूझ है, जो इस कालजयी ग्रंथ को ‘वेद-पर्यटन’ नाम दिया है।
इस लेख के लिए आज मैंने ‘सत्यार्थ-पर्यटन’ नाम चुना है। कभी इसी नाम से सत्यार्थ प्रकाश पर एक खोजपूर्ण मौलिक पुस्तक दूंगा। लेख को आरंभ करने से पूर्व मैं इस अमर ग्रंथ की रक्षा के लिए आजीवन सतत साधना करने वाले सब दिवंगत विद्वानों, शास्त्रार्थ महारथियों व लेखकों को आज श्रद्धा से स्मरण करता हूं। श्री स्वामी दर्शनानंद जी महाराज, रक्तसाक्षी पं. लेखराम जी से लेकर श्री पं. शांतिप्रकाश जी महाराज तक के सब पूज्य विद्वान जिन्होंने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पर किए गए प्रत्येक प्रहार का युक्तियुक्त सप्रमाण उत्तर दिया-वे सब विभूतियां हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज जिनके नेतृत्व में आर्यों ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की रक्षा के लिए समय-समय पर कई मोर्चे जीते, हम उन तेजस्वी महात्माओं के चिर ऋणी हैं।
प्रणवीर परमानंद आर्य जिसने मात्र 24 वर्ष की आयु में इस अमर ग्रंथ के लिए लाहौर में अपना शीश कटाया हम उसका पुण्य स्मरण करके स्वयं को धन्य मानते हैं। जिन गुणियों ने विभिन्न भाषाओं में सत्यार्थ प्रकाश को अनूदित किया हम उनके उपकार के लिए आभारी व ऋणी हैं।

1. ‘सत्यार्थ प्रकाश’ एक अद्भुत ग्रंथ- ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की भूमिका में महर्षि ने एक मूलभूत प्रश्न का उत्तर देकर युग को पलट कर रख दिया। सारे संसार में मतपंथों ने जाने अनजाने से यह भ्रांति फैला रखी है कि मनुष्य से शैतान पाप करवाता है। कुछ एक का कहना है कि संसार में सब कुछ ईश्वर की आज्ञा से ही होता है। इस प्रकार तो कोई भी पापी व धर्मात्मा नहीं कहला सकता। ऋषि ने यह लिख कर संसार की आंखें खोल दीं कि मनुष्य अपने प्रयोजन की सिद्धि, हठ, दुराग्रह और अविद्यादि दोषों से सत्य को छोड़ असत्य में झुका जाता है।

मनुष्य अपनी दीनता, हीनता, दुर्बलता, अल्पज्ञता व अज्ञान के कारण पाप करता है। जीव कर्म करने में स्वतंत्र व फल के भोगने में ईश्वर की व्यवस्था के अधीन है- यह कह कर शैतान का सिंहासन हिला कर रख दिया।

2. क्या आप जानते हैं कि इस्लाम जीव की कर्म करने की स्वतंत्रता को नहीं मानता? फल के भोगने में ईश्वर की व्यवस्था के अधीन नहीं हैं। जीव तकदीर की कड़ियों में जकड़ा हुआ है। यह हर्ष का विषय है कि डॉ. गुलाम जेलानी जैसे इस्लाम के शिरोमणि विद्वान साहित्यकार ने ऋषि के घोष को सुन कर, समझ कर और अपना कर इस्लाम का हुलिया ही बदल दिया हैं। ऋषि के इस वचन को ‘एक इस्लाम’ में सादर स्थान दिया गया है।

3. क्या आपको पता है कि सर सैय्यद अहमद ने शैतान विषयक ऋषि की समीक्षा को समझ कर एक कहानी लिखी है। एक मियां को स्वप्न में धूर्त शैतान मिल गया। उसने कस कर उसकी दाढ़ी पकड़ ली और दूसरे हाथ से थप्पड़ मार कर उसके गाल को लाल कर दिया। थप्पड़ जब मारा तो मियां की आंख खुल गई। देखा तो शैतान वहां था ही नहीं। अपनी ही दाढ़ी उसने कस कर पकड़ रखी थी। अपने ही गाल पर थप्पड़ मारा था। वे लिखते हैं शैतान तो अपने ही भीतर है। मन के दुर्भाव, हठ, दुराग्रह, अविद्यादि दोष ही पाप का कारण हैं। यही शैतान है।

4. ऋषि ने ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के प्रथम समुल्लास में ईश्वर एक है, सर्वव्यापक है, सृष्टिकर्ता है, वह कण-कण में व्याप्त है। जगत की रचना करने (जन्म देने) वाला, पालन व संहार करने वाला है ऐसा लिखा है। मत पंथों के लोगों ने परमात्मा को जीव से कहीं दूर अति दूर आसमान पर बिठा रखा था। अब सारे संसार में अंग्रेजी का बोलबाला है….. (सर्वव्यापक) शब्द का प्रयोग सब मतवादी करते हैं। सर सैय्यद अहमद खां ने तो ऋषि का घोष सुन कर लिख दिया कि अल्लाह चाहे भी तो हमें नहीं छोड़ सकता। यह एक वाक्य लिख कर इस्लाम के रक्षक ने इस्लाम को झकझोर दिया। इससे पहले कभी भी किसी मुसलमान विद्वान को यह क्यों न सूझा कि अल्लाह चाहे भी तो हमें नहीं छोड़ सकता? इस विषय में यह अथर्ववेद के एक मंत्र का चमत्कार है। “नहीं छोड़ सकता” को बार-बार पढ़िये। अल्लाह जो चाहे कर सकता है इस मान्यता को भी सर सैय्यद ने तलाक दिलवा दिया। यह ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की कृपा है।

5. जब जगत् मिथ्या है। एक ब्रह्म ही की सत्ता है। शेष सब भ्रम है। न जीव है और न प्रकृति तो फिर दर्शनकार की घोषणा का क्या बना कि जन्माद्यस्य यत: ब्रह्म वह है जो सृष्टि को जन्म देता है, पालनकर्ता है व संहार करता है। यदि एक ब्रह्म ही होता तो किसको जन्म दिया? किसका पालन और किस का संहार?

6. वह प्रभु सर्वव्यापक है। सर्वज्ञ है व सर्वशक्तिमान है। ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के इन तीन शब्दों ने विश्व में हलचल पैदा कर दी। ब्रह्म के सिवाय जब है ही कुछ नहीं तो वह ब्रह्म व्यापक किसमें? सब को जानता है या सब कुछ जानता है इसका अर्थ क्या हुआ। ‘सर्व’ शब्द ही निरर्थक ठहरा।

7. एक शंकराचार्य जी ने ….. (वैदिक गणित) ग्रंथ लिखश है। गणित शब्द गिनती से बना है। गणित तो संख्या से आरंभ होता है। जब ब्रह्म के सिवाय है ही कुछ नहीं तो शंकराचार्य जी की गिनती किसकी? किसके लिए? सत्य यह है कि ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का चिंतन बेजोड़ है। कल्याणकारी है। सार्वभौमिक है और काल की सीमा से मुक्त हैं।

8. संसार में दु:ख ही दु:ख नहीं। सुख-दु:ख से कहीं अधिक है। यह ‘सत्यार्थ प्रकाश’ की एक निराली देन है। यह ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का अमूल्य रत्न है। निराशावाद, हताशावाद व दीनता हीनता की दलदल से बचाने वाला ऋषि का यह वाक्य अमूल्य है।

9. परमेश्वर की कर्म करने की आज्ञा को जो कोई तोड़ेगा, वह सुख नहीं पा सकता। इस दार्शनिक वाक्य का मर्म आज वैज्ञानिकों से और डाक्टरों से पूछिए। जटिल रोगों का कारण आज कुछ न करना, निठल्ले पड़े रहना बताया जा रहा है।

10. ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में ऋषि ने अग्निहोत्र के प्रसंग में जो कुछ लिखा है, वह सब प्रकार के प्रदूषणों का समाधान है। घृल सामग्री की आहुतियों से जल-वायु-प्रदूषण की रोकधाम व निवारण। वेद-गान से भाव प्रदूषण व ध्वनि प्रदूषण का निवारण। मलमूत्र का विसर्जन तो प्रत्येक प्राणी करता ही है। इससे दुर्गंध व सड़ांध पैदा होती है। इस कारण यह एक पाप है। यह मानवता के विरूद्ध एक पाप है। क्या ‘सत्यार्थ प्रकाश’ से पहले किसी पीर, फकीर के उपाय सोचे जा रहे हैं। आज सत्यार्थ-पर्यटन का फल समस्त संसार चख रहा है, और चखेगा।

11. कभी सारे विश्व में एक धर्म था। एक भाषा थी। ऋषि के इस विचार को आर्य समाज ने पिछले कुछ वर्षों में प्रचारित करना छोड़ दिया। आज बाइबिल पुकार रही है कि सृष्टि में एक ही धर्म था। ऋषि के विचारों को कौन झुठला सकता है?

12. ऋषि ने सृष्टि के आदि में अमैथुनी सृष्टि का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसकी खिल्ली उड़ाई गई। उपहास उड़ाने वाले सब अंग्रेजी में बात करते हैं। ऐसे लोग आज तक आदम व मां हव्या के माता पिता की पहचान व नाम नहीं बता सके। कुरान भी बिना मां बाप के अमैथुनी सृष्टि को ही मानता है। और विकासवाद कब अमीवा के माता पिता की बात करता है।

13. ऋषि ने रामस्नेही मत को राण्ड स्नेही लिखा है। उन्होंने ‘चाँद’ पत्र का कारवाड़ अंक देखा ही नहीं। उसमें राम-स्नेही साधुओं के चित्र के नीचे के शब्द पढ़ेंगे तो ऋषि के साहस, वीरता व सत्यप्रेम को नमन करना पड़ेगा। महाराज लाइबल केस ही पढ़ लें। ऋषि की पीड़ा का पता चल जाएगा। सत्यार्थ-पर्यटन कीजिये तो?

14. ऋषि ने चौदहवें समुल्लास की पहली आयत की संख्या क्यों नहीं लिखी? यह आपत्ति करने वाले यह नहीं जानते कि यह आयत प्रत्येक सूरत के आरंभ में आती है और 114 बार कुरान में यह आयत दी गई है सो इसकी संख्या देने की आवश्यकता नहीं थी और देते भी तोे क्या देते? कैसे 114 पते देते?

15. सत्यार्थ-पर्यटन ऋषि ने करवा दिया। सारा संसार शेर,

बाघ, चीते, कछवे, सर्पों, चीलों की रक्षा, वृक्षों, नदियों व पर्वतों की रक्षा के लिए पृथ्वी-सम्मेलन, गोष्ठियां, महासम्मेलन व आंदोलन चला रहा है। यह ऋषि दयानंद के ‘सत्यार्थ प्रकाश’, गोकरुणानिधि की गोरक्षा की गुहार की दिग्विजय है। आओ! सत्य-पर्यटन के लिए वीर दल खड़ा करें। नए समाज का निर्माण करें।

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