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काकड़वाड़ी आर्य समाज मंदिर, जिसकी स्थापना महर्षि दयानंद जी के करकमलों से हुई, वह दर्शनीय एवं गौरव का स्थान है। आर्य समाज के लिए यह आर्य समाज मंदिर एक तीर्थ स्थान के रूप में रहेगा।

महर्षि दयानंद जी ने सर्वप्रथम आर्य समाज की स्थापना ता. 7 अप्रैल 1875 को इस आशा से की कि मुंबई से उनका कार्य व्यापक रूप ले सकेगा। आजकल भी राजनैतिक क्षेत्र में ऐसी मान्यता है कि कोई भी आंदोलन यदि मुंबई में सफल हो गया तो वह देश भर में व्यापक रूप ले लेगा। मुंबई में कार्य का आरंभ तो सुंदर हुआ परंतु व्यापक न हो पाया। कारण मुंबई में जिन लोगों ने इसे अपनाया था वे सुधारक अवश्य थे परंतु उनका प्रभाव आम जनता पर न पड़ सका। कारण मुंबई का प्रभाव गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक तथा सिंध पर था। अंग्रेजी राजकाज में मुंबई पश्चिमी भारत की राजधानी थी, परंतु सिंध को छोड़ कर यह सब प्रांत पुरातनवादी थे और अपने रूढ़िगत सिद्धांतों को कट्टरपन से पालते थे।
आर्य समाज का सब से अधिक प्रभाव पंजाब पर और उत्तर भारत में पड़ा। जब आर्य समाज ने व्यापक रूप ले लिया तब मुंबई के अंतर्गत गुजरात, सिंध, कर्नाटक और महाराष्ट्र थे। उस समय मुंबई प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा का कार्यक्षेत्र इन सब विभागों में था। मुंबई प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा के सबसे अधिक कार्य रूप पूछा जाए तो गुजरात में था और उसका मुख्य केन्द्र काकड़वाड़ी (मुंबई) आर्य समाज मंदिर में था जिसकी स्थापना महर्षि जी के फरकमलों से हुई थी।
काकड़वाड़ी आर्य समाज वर्षों तक वैदिक धर्म प्रचार का केन्द्र रहा और अब भी है। मुंबई प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा का दफ्तर यही है। आर्य प्रतिनिधि सभा के संन्यासी एवं महोपदेशक का विश्राम स्थान भी यही स्थल है। सभा के अधिकारी एवं आर्य समाज के पदाधिकारी प्राय: इसी समाज के नेता रहे।
उत्तर प्रदेश के उपदेशक एवं आर्य समाज के प्रमुख नेता या यात्री जब भी मुंबई आते उनका स्वागत एवं संस्कार इसी आर्य समाज में होता था। जिस समय गुजरात में डॉक्टर कल्याणदास जी का युग था उस समय आर्य समाज के प्रमुख कर्णधार पं. बालकृष्ण शर्मा, पं. द्विजेन्द्रनाथ, पं. मणिशंकर जी, श्री परघुभाई शर्मा आदि महानुभाव इसी समाज के साप्ताहिक सत्संगों में अमृत वर्षा करते थे। उस समय सार्वदेशिक सभा के संगठन में भी इसी प्रदेश का प्रतिनिधित्व मुंबई काकड़वाड़ी समाज के कर्णधार ही करते थे। डॉ. कल्याणदास जी के नेतृत्व का युग इसी समाज का स्वर्णयुग था। उस समय शेठ श्री शूरजी वल्लभदास, श्री रणछोड़ भवान लोटवाला, सेठ शीवदास चांपसी ठक्कर तथा ऐसे ही अनेक श्रेष्ठी इसी समाज के कर्णधार थे। पश्चिम भारत में काकड़वाड़ी आर्य समाज जिसकी स्थापना महर्षि ने स्वयं सन 1875 में की थी आज आर्य जगत के गौरव का स्थान है। इस स्थान से वर्षों तक आर्य समाज की प्रवृत्ति होती रही। जब-जब हिंदू-मुस्लिम दंगे होते थे अथवा इसी प्रदेश में कोई प्राकृतिक कष्ट आते थे उस समय इस आर्य समाज के कर्णधार हिंदू रक्षा का कार्य करते थे। बाढ़ एवं अकाल पीड़ितों की सहायता के केन्द्र खोल कर काम करते। रूढ़ीवाद की श्रृंखलाओं को तोड़ कर विवाह आदि कार्य करने वालों का भी यही समाज आश्रय स्थान था।
आर्य समाज के गौरवपूर्ण कार्यों का केन्द्र मुंबई में काकड़वाड़ी आर्य समाज का मंदिर रहा। समाज में अनाथ तथा दु:खी बालाओं की रक्षा हेतु यहां आर्य समाज के अंतर्गत आश्रम भी चलता रहा और अनेक कन्याओं का रक्षण विधर्मियों के इन्द्रजाल से किया गया। अब यह आश्रम वड़ोदरा स्थानांतरित किया गया है और वहां वड़ोदरा आर्यकुमार सभा के तत्वावधान में चल रहा है।
इसी प्रकार वैदिक विधि से विवाह कराने वालों के लिए काकड़वाड़ी का समाज मंदिर एक महत्वपूर्ण स्थान है जहां समाज सुधारक जनता बड़ी चाव से आर्य समाज की छत्रछाया में वैदिक विधि से विवाह संस्कार कराती है।
महर्षि के करकमलों द्वारा स्थापित काकड़वाड़ी समाज ने अपने जीवन काल में इतने महत्वपूर्ण कार्य किए हैं जो स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेंगे। समय-समय पर इसके अनेक कर्णधार, जिन्होंने इस समाज को गौरव प्रदान किया, उनके भी नाम इतिहास में अमर रहेंगे। काकड़वाड़ी आर्य समाज मंदिर, जिसकी स्थापना महर्षि के करकमलों से हुई, वह दर्शनीय एवं गौरव का स्थान है। समाज का एक मकान भाड़े पर भी चल रहा है जिससे समाज को कुछ आय हो जाती है। आर्य समाज के लिए काकड़वाड़ी आर्य समाज मंदिर एक तीर्थ स्थान के रूप में रहेगा और यहां से आगामी वर्षों में वैदिक धर्म प्रचार की प्रवृत्ति व्यापक रूप से होती रहे ऐसा आयोजन है।

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