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हमारी संस्कृति हमें बताती है, ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव’-माता, पिता एवं आचार्य (गुरू) ये देवता स्वरूप हैं। इसमें ‘सेवाव्रती देवो भव’ भी जोड़ना चाहिए। डॉ.अशोकराव कुकड़े ऐसे ही सेवाव्रती हैं, जिन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया है।

कुछ श्रेष्ठ लोगों के विषय में कहा जाता है कि ‘दूर के ढोल सुहावने।’ उनके बहुत पास नहीं जाना चाहिए। यदि उनके बहुत पास गए तो उनके पैरों में लगा कीचड़ दिखाई देने लगता है और हमारे मन मे उनकी जो प्रतिमा है उसमें खरोंच आ जाती है। पद्मभूषण डॉ. अशोकराव कुकडे इसके अपवाद हैं। श्रेष्ठ व्यक्ति कौन? तो वह जिसके पास जाने पर उसके श्रेष्ठ होने का अहसास हमें बिलकुल नहीं होता और वह हममें से ही एक हमें लगता है।

भगवान श्रीकृष्ण के विषय में कहा जाए तो वह विश्व संचालक, ब्रम्हांड का कर्ताधर्ता, परंतु मां यशोदा को वह अपना नटखट पुत्र लगता था। गायें चराने जाते समय उसके साथियों को वह उनके साथ खेलने वाला लगा। गोपियों को वह अपना सखा लगा तो भीष्म पितामह को तत्वज्ञ लगा। अर्जुन को वह अपना निकटस्थ मित्र लगा। कुरूक्षेत्र की युद्धभूमि में जब कृष्ण ने अपना विश्वरूप दिखाया तो अचंभित अर्जुन बोला, मैंने तुम्हें जाना ही नहीं, अपना साथी, मित्र समझ कर तुमसे बराबरी का व्यवहार किया, इसके लिए मुझे क्षमा करो। श्रेष्ठ व्यक्तियों का बड़प्पन उनके सबके साथ किए जाने वाले एक जैसे व्यवहार में ही है। डॉ. अशोकराव कुकडे इसके मूर्तिमंत उदाहरण हैं।

भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण अलंकरण से सम्मानित किया है। मेरे अनुसार यह उनके बड़प्पन का सम्मान न होकर लघुता का सम्मान है। यदि देखा जाए तो डॉ. अशोकराव कुकडे मेडिकल चिकित्सा में गोल्ड मेडल प्राप्त सफल सर्जन हैं। इस क्षेत्र में उनका ज्ञान बहुत अधिक है। केवल इतनी पूंजी पर वे स्वत: का सुपर स्पेशलिटी अस्पताल स्थापित कर सकते थे। संपत्ति का प्रवाह वे अपने घर की ओर मोड़ सकते थे। परंतु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया।

कुछ भी नहीं किया इसका अर्थ उन्होंने अस्पताल नहीं चलाया या सुपर स्पेशलिटी अस्पताल स्थापित नहीं किया ऐसा नहीं है। सन् 1960 में लातूर जैसे पिछड़े शहर में सामान्यों में सामान्य या पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के शब्दों में “आखिरी की पंक्ति में सबसे आखिर में खड़े” व्यक्ति को अपने डॉक्टरी ज्ञान का उपयोग हो, इसके लिए वे आए। नया शहर, अपरिचित लोग, साधन कम परंतु ध्येय से काम करने वाले 8-10 डॉक्टर लातूर आए। अड़चनों को पार कर उन्होंने कार्य प्रारंभ किया। बाद में उनकी इस ध्येय यात्रा को, “कथा एक ध्येय साधना की” इस पुस्तक में शब्दरूप मे पिरोया गया। पुस्तक को पढ़ने पर शरीर रोमांचित हो उठता है।

पुणे का सुखी जीवन छोड़ कर लातूर जाने का निर्णय एवं लातूर को ही कर्मभूमि बनाने का निर्णय रा.स्व.संघ की प्रेरणा से लिया गया निर्णय था। डॉ. हेडगेवार ने कहा था कि संपूर्ण हिन्दू समाज मेरा है, उनके सुख-दु:ख मेरे हैं, उनके गुणदोष मेरे हैं। समाज को निरोगी बनाने का काम मुझे ही करना है। संघ का यह सीधा-सादा-सरल तत्वज्ञान है। इसको जीना पड़ता है। बड़ी-बड़ी किताबें लिख कर या कई भाषण देने के बाद भी उसका उपयोग नहीं है। यह तत्वज्ञान अपने जीवन में कैसे उतारें इसका चलता-फिरता आदर्श याने डॉ. अशोकराव कुकडे। श्रीगुरूजी, (संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री मा.स.गोलवलकर) की पुस्तक “विचारधन” में “चलते-फिरते आदर्श बनें” शीर्षक से एक अध्याय है। श्री गुरूजी स्वत: चलते-बोलते आदर्श के परिपूर्ण रूप थे।

उनके शब्दों में मंत्रों का सामर्थ्य था। डॉ. अशोकराव के मन पर एवं हृदय में इस प्रकार का संस्कार कब, कहां एवं कैसे हुआ यह मैं निश्चित रूप से नहीं कह सकता, परंतु हम सब ने उन्हें इस प्रकार जीवनयापन करते देखा है एवं उसका अनुभव किया है।
डॉ. अशोकराव के विषय में कटु शब्द बोलने वाला व्यक्ति शायद खोजने पर भी नहीं मिलेगा। तुकाराम महाराज कह गए हैं, ‘नम्र झाला भूता, तेणे कोंडिले अनंता।’ जो सब प्राणिमात्र के आगे नम्र है वह सदैव ईश्वर के सानिध्य में रहता है। भगवान को हम साक्षात नहीं देख सकते, परंतु पूर्णत: निस्वार्थ भाव से समाज सेवा करने वाले भगवान का स्वरूप ही होते हैं। हमारी संस्कृति हमें बताती है, ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव’-माता, पिता एवं आचार्य (गुरू) ये देवता स्वरूप हैं। इसमें ‘सेवाव्रती देवो भव’ भी जोड़ना चाहिए। स्वामी विवेकानंद ने ‘दरिद्रनारायण’ की सेवा का संदेश दिया। डॉ. अशोकराव कुकडे ने उसे अपने जीवन में उतारा।

उन्होंने एवं उनके सहकारियों ने सेवा भावना से प्रारंभ किए रूग्णालय का नाम भी ‘स्वामी विवेकानंद रुग्णालय’ है। रुग्णालय कुकडे जी की संपत्ति नहीं है, वह सार्वजनिक न्यास का है। इस न्यास के सेवक के रूप में कुकड़ेजी वहां कार्य करते हैं। विवेकानंद से लोग परिचित हैं। उनके नाम से यह रुग्णालय अच्छा चलेगा ऐसा कोई भी विचार इस नाम को देने के पीछे नहीं है। विवेकानंद रुग्णालय याने विवेकानंद को जीने का रुग्णालय। विवेकानंद सरीखे श्रेष्ठ पुरूषों को जिस प्रकार ग्रंथ रूप में जीवित रखा जा सकता है उसी प्रकार उनके विचारों पर प्रत्यक्ष अमल कर भी उन्हें जीवित रखा जा सकता है। परंतु यह दूसरा मार्ग अति कठिन है। इस मार्ग पर चलते समय हम स्वयं ही अपने मित्र एवं गुरू होते हैं। डॉ. अशोकराव कुकडे एवं उनके सहयोगियों ने इस मार्ग पर चलना शुरू किया। आज इस पगडंडी का विस्तार राजमार्ग के रूप में हो गया है। हजारों कदम डॉ. अशोकराव के कदमों पर चल रहे हैं एवं अपनी-अपनी क्षमतानुसार कार्य कर रहे हैं।

इस कठिन डगर पर उनकी जीवनसंगिनी डॉ. ज्योत्स्ना का योगदान भी बेजोड़ है। हमारी संस्कृति ने हमारे सामने अर्धनारी नटेश्वर की प्रतिमा रखी है। यह प्रतिमा यह बताती है कि मनुष्य जीवन याने स्त्री एवं पुरूष तत्व का समान मिश्रण है। एक के सिवाय दूसरे का अस्तित्व नहीं है और दूसरे के सिवाय पहले को सृष्टिचक्र में स्थान नहीं है। डॉ. अशोकराव एवं डॉ. ज्योत्स्नाताई याने अर्धनारी नटेश्वर का जीवंत रूप है।

डॉ. अशोकराव को पद्मभूषण सम्मान मिला, जब यह मुझे समाचार मिला, आनंद तरंगे मेरे मन में निर्माण हुईं। ईमानदारी से कहूं तो इस प्रकार की आनंद तरंगे मेरे मन में कभी उठी हों ऐसा मुझे याद नहीं आता है। यह केवल मेरे अकेले की अवस्था नहीं है, डॉ. अशोकराव के संपर्क में जो जो भी आया, वह इस आनंद सागर में डुबकी लगाकर निकला है। यह निर्मल एवं सात्विक आनंद डॉ. कुकडे ने अपने जीवनयज्ञ से निर्माण किया है। उनका अभिनंदन करूं यह मेरा अधिकार नहीं। मैं भी इस आनंद सागर में गोते लगाने की इच्छा रखता हूं।

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